गतिरोध का हासिल भाग-1 : पाकिस्तान को छोड़ ज़्यादातर एशियाई देश इससे खुश

डोकलाम में जारी गतिरोध को दो महीने होने जा रहे हैं और टनों कागज़ काले किए जा चुके हैं. इन काले कागज़ों पर निगाह डाल लेने के बाद कुछ चीजें स्पष्ट हैं. पहला कि यह विवाद भूटानी क्षेत्र को लेकर है. सीधे भारत से इसका कोई लेना देना नहीं है. पर भूटान से संधि के तहत उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी है और इसलिए हम चीन के सामने खड़े हैं.

चीन की प्रतिक्रिया ऐसी क्यों है जैसे उसे मिर्गी के दौरे पड़ रहे हों? वो इसलिए कि उसे इसकी कतई उम्मीद नहीं थी. चीन पिछले कुछ सालों से गीदड़ भभकियों और सैन्य ताकत के इस्तेमाल की धमकी देकर अतिक्रमण करने के खेल का महारथी हो गया था. यहां तक कि जिन इलाकों में चीन ने दावे ठोक रखे हैं, उन कथित विवादित क्षेत्रों में अमेरिका भी दखल देने से बचता रहा है.

चीन इसका इतना आदी हो गया था कि कि डोकलाम उसके लिए किसी सदमे से कम नहीं है. विवादित क्षेत्रों में जब अमेरिका ने दखल देने की जुर्रत नहीं तो भारत की क्या औकात!

गीदड़ भभकियों का डेसिबल रोजाना बढ़ता जा रहा है. भारत चुपचाप लेकिन दृढ़ है कि सेना नहीं हटेगी. चीन की मुसीबत यह है कि अगर भारत नहीं हटा तो उसकी नाक कट जाएगी.

क्या हो सकता है आगे

पहला यह हो सकता है कि वे बर्फ पड़ने का इंतजार करें और अगले साल स्थित फिर जस की तस हो जाए. दूसरे यह कि चीन अपने हिस्से में स्थायी ढांचे का निर्माण कर ले और बड़ी तादाद में सेना तैनात कर ले. ऐसे में भारत को भी यही करना पड़ेगा. फिर गतिरोध स्थायी स्थिति बन जाएगा. कोई दिक्कत नहीं है इसमें अगर वे फिर चिकेंस नेक की तरफ जाने वाले इलाके में सड़क बनाने की कोशिश नहीं करें तो.

तीसरे यह कि वे सीमा पर जहां मजबूत हैं वहां तेजी से हमला करें. यह चुंबी वैली या डोकलाम में नहीं होगा, अरुणाचल में भी कम संभावना है. पर लद्दाख सेक्टर में वे मज़बूत हैं. भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान इस आशंका को लेकर सतर्क है और इसके लिए तैयार है.

चौथे, अगर नहीं तो फिर वह पाकिस्तान, श्रीलंका व बांग्लादेश में पैठ और बढ़ा कर भारत को घेरने की कोशिश कर सकता है. हिंद महासागर में नौसैनिक गतिविधियां बढ़ा सकता है. जैसे भी हो भारत पर दबाव बनाएगा. या डोकलाम से हटने के एवज में वन बेल्ट एंड वन रोड (OBOR) परियोजना में शामिल होने की शर्त भी रख सकता है.

चीनी ऑटिज्म

चीनी कभी मान ही नहीं सकते कि वे गलत हैं. एक विचारक तो चीनियों की इस प्रवृत्ति को चीनी ऑटिज्म की संज्ञा दे चुके हैं. भारत के साथ भी उनका यही रवैया है. उनका अटल विश्वास है कि भारत दोयम दर्जे की ताकत है, उसे इस बात को स्वीकार उसी के अनुसार व्यवहार करना चाहिए. उनके लिए यह सोचना नितांत तार्किक है कि भारत उस देश से कैसे बैर मोल ले सकता है जिसकी अर्थव्यवस्था चीन से पांच गुना कम है और सैन्य ताकत भी कई गुना कम है. पर वे इस बात से अंजान हैं कि भारतीय खुद को चीन के बराबर का ही नहीं बल्कि उनसे श्रेष्ठतर समझते हैं. एक गहन विश्वास है इस देश में कि आज नहीं तो कल हम चीन को पीछे छोड़ देंगे. चीन ने कभी इस तथ्य का संज्ञान नहीं लिया.

नुकसान चीन का ही

लेकिन क्या होगा अगर एक छोटा सा युद्ध हो गया और चीनी इस छोटे से युद्ध में भारत को सबक नहीं सिखा पाए तो. यह चाइनीज़ ड्रीम के लिए बेहद करारा झटका होगा जो माने बैठा है कि एशिया हमारे बाप का माल ही तो है. पड़ोसी देशों को धमकाने और उनसे विवाद खड़ा करने के मामले में चीन का बायोडाटा काफी विस्तृत हो चुका है. धमकियों की कूटनीति से जुटाई गई जमा पूंजी अगर लुट गई तो बहुत से देश हैं जो उन पर हंसने को तैयार बैठे हैं.

हो सकता है कि गतिरोध महीनों तक खिंचे या एक छोटा सा युद्ध भी हो जाए. दोनों में ही हमसे ज्यादा नुकसान चीन का है. अगर गतिरोध जारी रहा और चीन ने भारत को सबक नहीं सिखाया तो धमकियों का खोखलापन उजागर हो जाएगा. सबक सिखाने की कोशिश अगर उल्टी पड़ गई तो फिर चीन मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा. ऐसे में युद्ध विकराल रूप ले सकता है. फिर यह हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक में लड़ा जाएगा.

आखिर में इस गतिरोध का नतीजा यह निकलेगा कि चीन को यह समझ में आएगा कि जैसे दुनिया चीन के उदय को मैनेज कर रही है उसी तरह अब उसे भारत के उदय को भी मैनेज करना होगा. यानी भारत की चिंताओं को खारिज नहीं किया जा सकता, उसे तवज्जो देनी पड़ेगी. चीन फिलहाल तो इसके लिए तैयार नहीं दिखता. पर डोकलाम के बाद सोचने की नौबत जरूर आ गई है.

पाकिस्तान को छोड़ दें तो ज्यादातर एशियाई देश इस गतिरोध से खुश हैं. यह वैसे ही है जैसे मुहल्ले का कोई लड़का किसी गुंडे का कॉलर पकड़ ले तो सब खुश होते हैं. हिम्मत कर डट जाना और आंख में आंख डाल कर देखना, यह हासिल है डोकलाम का. एशिया के चौधरी साहब इस धृष्टता से सन्न हैं.

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