मंहगाई से परेशान होने के लिए क्या सिर्फ टैक्स पेयर ही है!

सरकार फल-सब्जी संरक्षण के नाम पर एक कोल्ड स्टोरेज को 8 डिजिट तक की सब्सिडी देती है. उधर आलू किसानों को भी खुले हाथ से लोन देती है… और जब लॉस होता दीखता है तो भाड़ा सब्सिडी आदि भी देती है… फसली ऋण भी माफ़ करती है.

1999 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा शीतगृह (कोल्ड स्टोरेज) निर्माण पर घोषित सब्सिडी नीति के कारण शीतगृहों की संख्या 20 गुने से भी ज्यादा हो गयी… लेकिन आज भी ऑफ़ सीज़न पर 4 रुपये का टमाटर 100 रुपये, 15 का सेब 150 रुपये और 6 की मटर 120 रूपए तक बिक जाती है…

और उधर आलू किसान अपने लिए दया की भीख मांगते नजर आते हैं… उनको सब्सिडी दर सब्सिडी चाहिए.

क्या सरकार शीतगृहों को सब्सिडी देते समय शीतगृह स्वामी को बाध्य नहीं कर सकती कि वो अपने शीतगृह की कुल क्षमता का एक छोटा चैम्बर फल और सब्जी के लिए बनाये…

और जब भी कोई फल या सब्जी में मंदी हो उसमें उक्त शीतगृह स्वामी येनकेन प्रकारेण उक्त उत्पाद का स्टॉक करे…

और हर समय तमाम सुविधाएं पाने वाले किसानों को क्या सरकार बाध्य नहीं कर सकती कि ऋण और सब्सिडी पाने वाले किसान अपने खेतों पर फलदार पेड़ और खेती के एक कोने में ऑफ सीज़न की सब्जी अनिवार्य रूप से लगाएं…

क्या मंहगाई से परेशान होने के लिए केवल अपनी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा सरकार को देने वाला टैक्स पेयर ही रह गया है…

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