आशु उवाच : आप खुद तय करें, दिमाग़ की सफाई या इज़्ज़त का कचरा!

“हम क्या हैं?” का पता दुनिया को “हमारे पास- क्या है?” से चलता है.

फूलों को इकट्ठा करने वाले को हम फूलवाला कहते हैं, तो रद्दी बटोरने वाले को हम रद्दी वाला कहते हैं. दूध बेचने वाले को दूध वाला कहा जाता है तो कचरा इकट्ठा करने वाले को कचरा वाला माना जाता है.

अमूमन- हम जिस चीज़ को चाहते हैं या जिसमें हमारी रुचि होती है उसे हम इकट्ठा करने लगते हैं. आगे चलकर हमारा संग्रह ही हमारी शख़्सियत हो जाता है.

यही नियम हमारी मानसिकता पर भी लागू होता है, यदि ईर्ष्या में हमारी रुचि है तो हम उसे इकट्ठा करते हैं, लोग हमें ईर्ष्यालु कहते हैं, क्रोध एकत्र करें तो क्रोधी, लोभ पास में हो तो लोभी, झूठ में रुचि हो तो कालांतर में हम झूठे कहलाएँगे, प्रेम पास में हो तो प्रेमी, दया इकट्ठी हो तो दयालु.

विकारों का संग्रह हमें विकारी बना देता है तो विचारों का संग्रह विचारवान बना देता है. सत्य में आस्था हमें सत्यवादी बनाएगी तो गप्प में आस्था हमें गप्पी बना देगी.

संसार हमें नहीं हमारी रुचि को मान देता है. इसलिए सजग रहते हुए हमें चाहिए की जिस बात में हमारी रुचि नहीं है उसे हम बिलकुल इकट्ठा ना करें. सोचके देखिए यदि कपड़े की दुकान में कचरा भरा हो, या कचरे की दुकान में कपड़ा भरा हो तो उस दुकान का क्या हश्र होगा?

इसलिए यदि विचार में हमारी रुचि है तो विकारी को बिलकुल भी प्रश्रय नहीं देना चाहिए. अन्यथा हम विचारवान होते हुए भी विकारवान के नाम से जाने जाएँगे.

हमारा घर कितना ही साफ़ सुथरा क्यों ना हो फिर भी हम नियम से रोज़ झाड़ू पोंछा लगा के उसे साफ़ करते हैं, इसलिए हर विचारवान व्यक्ति यह जानता है की विकार नंगी आँखों से ना दिखाई देने वाली महीन धूल के जैसे होते हैं जो हवा के साथ हमारे घर में प्रवेश कर जाते हैं. कबाड़ी कितना ही संपत्तिवान क्यों ना हो उसकी रुचि कबाड़ एकत्र करने में ही रहती है.

किसी भी व्यक्ति का आंकलन उसकी सम्पत्ति से नहीं उसके संग्रह से, उसकी प्रशस्ति से नहीं उसकी प्रवृत्ति से करना अधिक कल्याणकारी होता है.

– आशुतोष राणा

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