हिन्दू धर्म – 1 : यहाँ किसी एक ‘गॉड’ की दादागिरी नहीं

यह बात मेरे दिल में बहुत दिनों से घुमड़ रही थी. पर इस जटिल बात को सरल शब्दों में कहने के लिए आवश्यक ज्ञान, धैर्य और समय के अभाव में अब तक कह नहीं पाया. मैं कोई पंडित नहीं हूँ. यह काम तो पंडितों का था. पर जब पंडित मौन बैठे हों तो डॉक्टरों तक को डॉक्टरी छोड़ कर बोलना पड़ जाता है.

इस लेख को लिखने की तात्कालिक प्रेरणा एक बहुत सारगर्भित पोस्ट से आई जिसकी तरफ़ मेरा ध्यान एक मित्र ने आकर्षित किया.

बात, जिसे हम सामान्य भाषा में हिन्दू धर्म कहते हैं, उसके होने से जुड़ी है. हिन्दू धर्म उस अर्थ में धर्म नहीं था जैसा आज बन गया सा लगता है. हमारे यहाँ सिर्फ धर्म था. उतना काफ़ी था. धर्म को किसी विशेषण की आवश्यकता नहीं थी. ये विशेषण कालांतर में पड़े आघातों की देन हैं.

यह धर्म वह था जिसे धारण करना था. यह हमारे अस्तित्व का अंग था. हमारा होना था. धर्म नहीं तो हम नहीं और हम नहीं तो धर्म नहीं. धर्म कोई गुसलखाना नहीं था जिसमें आप नहाएँ और नहा कर बाहर निकल आएँ. धर्म शाश्वत था. उसके आदि और अंत की रेखाएँ नहीं थीं. धर्म बहती नदी की तरह गतिमान और महासागर की तरह धीर गम्भीर था. धर्म काल और रस्म की मेड़ों मे बँधा गंदला तालाब नहीं था.

धर्म का ताना बाना हमारे बाहर भीतर की चीज़ों से बना था – सूरज चाँद, हवा पानी, नदी पहाड़, पेड़ पशु, नृत्य संगीत, रीति रिवाज, जन्म मृत्यु, घर परिवार, समाज. धर्म हमारे यहाँ सिर्फ पूजापाठ नहीं था. धर्म संगीत था, नृत्य था, काव्य था, स्थापत्य था, आरोग्यशास्त्र था – वह सब कुछ था जिससे जीवन बनता है.

यहाँ जीवन अखंड था, उसे टुकड़ों मे बाँटने और बाँट कर देखने का अभ्यास नहीं था. इस धर्म का कोई मैनुअल न था, कोई आखिरी किताब न थी, कोई scripture न थे. यहाँ लोक से शास्त्र था और शास्त्र से लोक. यह धर्म पारिजात के फूल की सुगंध की मानिंद हवाओं में घुला था. हम उसे देखते कम, सूँघते ज्यादा थे.

इस धर्म का कोई गॉडफ़ादर न था. serious और sinister गॉडफ़ादर. हमारे यहाँ किसी एक गॉड की दादागिरी नहीं थी – हमारे देवी देवता भगवत्ता के भिन्न भिन्न गुणों का प्रतिनिधित्व करते थे. कोई भी शख़्स देवता बन सकता था. और देवता कोई अलग नहीं थे, हमारे संग थे. हमारे सखा और प्रेमी थे. हम उनसे खेलते थे, रार करते थे, रूठते थे, मनाते थे, प्रेम करते थे.

कृष्ण के 108 नामों में से चौर भी एक नाम है, क्षत्रिय के लिए अपमानजनक विशेषण रणछोड़ से भी हमने कृष्ण को बुलाया. हमारे देवता जन्मते हैं, प्रेम और युद्ध करते हैं, राम की तरह पत्नी और भाई के विछोह में करुण विलाप करते हैं, कृष्ण की तरह एकाकी वन में एक आखेटी का तीर पाँव में लगने के कारण हुए रक्तस्राव से मर जाते हैं.

आपने देखा कृष्ण के विछोह में व्याकुल निरक्षर ग्रामीण गोपियों ने उन्हें धर्म सिखाने आए महापंडित उद्धव को कैसे लताड़ा? आपने देखा आज भी शिव विवाहोत्सव के नाटकों में ग्रामीण स्त्रियाँ कोहबर में शिव का क्या हाल करती हैं? कई क्षेत्रों में राम सीता के विवाह के क्षण को अशुभ मान कर उस समय विवाह नहीं किए जाते हैं.

वाल्मीकि रामायण में और लोक गीतों में सीता माता के दुख के लिए राम को कितने उलाहने दिए गए हैं. और इस बात में और राम की पूजा में, उनके हमारे नायक होने में, मर्यादा पुरुषोत्तम होने में किसी को विरोधाभास नहीं दिखा. जिस राम को लताड़ती हैं, उन्हीं का मनुहार करती हैं.

हमारा ईश्वर सीरियस और उदास नहीं है. वह लोक को अपनी मुरली की धुन से, अपने नृत्य से तंद्रिल कर देता है. हमारी परम्परा रोने की नहीं, उल्लास और उत्सव की परम्परा है. कृष्ण रास रचाते हैं, बाँसुरी की धुन से समस्त ब्रह्मांड को रस के सागर में डुबो देते हैं. शिव नटराज हैं, महानर्तक हैं. हुआ है कोई कृष्ण से ऊँचा प्रेमी? शिव से ऊँचा नर्तक? सरस्वती से ऊँचा वादक? दुर्गा से ऊँचा संहारक?

ये सारी चीज़ें अंतर्गुम्फित हैं, मकड़जाल की तरह इनका ताना-बाना है. एक के बिना दूसरे की गति नहीं. हमारे तथाकथित “धर्मग्रंथ” मूलतः महाकाव्य हैं. हमारे देवता मनुष्यों में विचरते हैं, उनकी तरह ही प्रेम और युद्ध करते हैं.

ऐसा धर्म जो हमारे अस्तित्व का अंग था, जिसके बिना हमारे होने की कल्पना नहीं थी, उसके बाहर भी कुछ है – इसका आभास हमें नहीं था. यह धर्म reductionist नहीं, all enveloping था.

इस लिए हमें इसका भान ही नहीं था कि हमें किसी को इस धर्म में “प्रवेश” कराना चाहिए. आधुनिक भाषा में कहूँ तो धर्म परिवर्तन करवाना चाहिए. हमारे लिए तो बस एक ही धर्म था जो शाश्वत और सर्वव्यापी था. इस धर्म के कोई नियम क़ानून न थे. इसका कोई code नहीं था. हर तरह के विचार इस एक विशाल बरगद की छांव में फल फूल सकते थे. विवाद और शास्त्रार्थ इस विशाल बरगद के नीचे ही होते थे.

एक मत से दूसरे में जाना या वापस लौटना कोई बड़ी बात न थी, एक सहज organic प्रक्रिया थी. यहां कोई बाहरी न था. इसीलिए यहाँ चार्वाक को ऋषि मानने या बुद्ध को भगवान मानने में कोई कठिनाई नहीं आई – सामान्य, सहज भाव से स्वीकार किया गया.

क्रमश:

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