तुम्हें पता ही नहीं कि कब सुअर की तरह पखाना खाते, उसमें लोटते, उसकी बदबू ढोते फिरने लगे हो

सुबह-सुबह का वक्त था, शंकर चले जा रहे थे कि सहसा सामने एक डोम आ गया. शंकर का मन वितृष्णा से भर उठा. शिव-शिव शिव-शिव का जाप करते शंकर ने रोषपूर्वक डोम से कहा “सामने से हट, नराधम! ब्रह्ममुहूर्त में छूकर भ्रष्ट करेगा, क्या?”

डोम न रास्ते से हटा, न ही विचलित हुआ. उसने शंकर को भरपूर मुस्कुराहट से देखते हुए प्रश्न किया, “तुम किसके स्पर्श से भ्रष्ट होगे? पंच तत्व से बना यह चोला जो तुम्हारा है, वो मेरा है, यह तो बस एक माध्यम है, जिस पर किसी का अधिकार नहीं, न मेरा न तुम्हारा! या फिर इस चोले में बसी आत्मा के स्पर्श से भ्रष्ट होगे, जो चिरंतन है, जो उसी परम का अंश है जिस परम का अंश तुम्हारी आत्मा है.”

डोम वही था, हरेक दिन वाला. शंकर भी वही थे. हर दिन की तरह वाली सुबह थी. हर दिन वाला ही रास्ता था, पर बस पल भर में सब कुछ बदल गया. शंकर के अराध्य शिव थे, शिव-शिव का जाप शंकर को अनिवर्चनीय सुख देता था, शिवालय में उठती सुगंध शंकर की आत्मा में एकाकार हो जाती और अपने आराध्य शिव में आत्मलीन शंकर की आँखों से प्रेमाश्रु झरने लगते थे.

सहसा ही, शंकर के लिए वह डोम साक्षात ‘गुरुर देवो महेश्वर:’ था. डोम के शरीर से उठती बदबू की वजह से, अपने उत्तरीय से अपनी नाक ढके शंकर के हाथों से उत्तरीय छूट गया और डोम उनके लिए साक्षात शिव की तरह था, शंकर तत्काल उस डोम के चरणों में लोट गए. उनकी आँखों से झरते प्रेमाश्रु वही थे, जो शिव के लिए होते थे.

शंकर के शंकर से आदि शंकराचार्य बनने का माध्यम एक डोम था.

ऐसा नहीं है कि एक आदमी जो है, वह क्या है और क्यों है, इसकी यह अकेली कहानी हो. हमारे लोक जीवन में ऐसे लोकाचार की भरमार है जो हमारी मनीषा से बार-बार सवाल करते हैं “तुम किससे नफरत करते हो? सुअर से या उस गंदगी से, उस परिवेश से जिसे सुअर खाता है, जिसमें लोटता है और उस बजबजाती बदबू में आपादमस्तक डूबा उसे फैलाता है.”

सुअर जिस गंदगी में रहता है, उससे वितृष्णा सहज है, मानवीय भी पर सुअर से नफरत हो तो यह एक रोग है, एक तरह की एलर्जी, और इसका इलाज जरूरी है, इसका अर्थ है, तुम्हारी मानसिक दशा सही नहीं, तुम्हें इलाज की ज़रूरत है.

वैष्णव ब्राम्हणों के जिस समुदाय का मैं हिस्सा हूँ, उसमें होली से जुड़ा एक लोकाचार है, जो होली से जुड़ा है. होली की शुरुआत होलिका दहन से होती है, वह होलिका जो एक औरत थी, औरत अर्थात मातृत्व का प्रतीक, पर मातृत्व का अर्थ तो वात्सल्य है पर इस औरत के कर्म देखो, यह एक बालक को जलाने का यत्न साधती नजर आती है, अपने कर्मों से यह मानुषी से राक्षसी बन चुकी है और इसका दहन समाज के हित में है. तो होलिका दहन होता है.

होलिका दहन में, जीत का उल्लास है पर एक नारी के दहन की पीड़ा भी है. भारतीय सभ्यता पाश्चात्य सभ्यता की तरह विजेता के यशोगान का एकालाप नहीं करती, यही वजह है कि भारतीय लोकमानस के मर्यादा पुरुषोत्तम राम, रावण को मारकर खुश हैं, तो एक महान पंडित अपनी आखिरी साँसें गिन रहा है, यह सोचकर दुखी भी हैं, लोकपक्ष की मर्यादा में सीता का परित्याग करते हैं तो उसके परिष्कार में जल समाधि भी ले लेते हैं.

पांडव विजेता हुए, पर उस विजय में विजय का उल्लास कम, गुरू, बंधु-बांधवों की हत्या की ग्लानि अधिक थी, तो विजेता होकर भी वो राजसुख नहीं भोगते और हिमालय को चले जाते हैं.

तो होलिका दहन का उल्लास है, पर नारी की हत्या हुई इस पाप का बोध भी है. और होली की शरुआत होलिका के दहन की राख उड़ा के होती है, उस राख के साथ हमारे वैष्णव समुदाय का एक बटुक एक स्त्रीहंता समुदाय का हिस्सा होने का पाप लिए लौटता है, होलिका दहन से शुरू होली में, हमारे समुदाय के वैष्णव बटुक के लिए यह जरूरी है, कि वह जब तक एक डोम से गले न मिले तब तक एक स्त्रीहंता समुदाय का हिस्सा होने और उसका उल्लास मनाने के पाप से उसे मुक्ति नही मिलती.

तुम स्वयं कुछ नहीं हो, तुम जो धारण करते हो तुम्हारा वही अस्तित्व है, तुम्हारी धारणाएँ तुम्हारी सर्जना करती हैं, तुम्हारे कर्म तुम्हें गढ़ते हैं, तो नफरत की वजह सुअर नहीं, वह विष्ठा है, जिसे सुअर खाता है, जिसमें लोटता है, जिसकी बदबू लिए घूमता है. सुअर जिस गंदगी में है, उससे वितृष्णा सही है, पर सुअर से घिन आने लगे तो तुम भी एक सुअर हो और तुम्हारे भीतर बैठे विचार पखाने से मलिन हैं.

तुम एक पूरे समुदाय से नफरत पाल बैठे हो, माना वह समुदाय ब्राम्हण है और तुमने उसे सुअर मान लिया. उसे अपमानित कर सको तो तुमने सुअरों को जनेऊ पहनाने का अभियान चला दिया. तुम किससे नफरत कर रहे हो? तुम्हारे नफरत के प्रतिमान कैसे हैं? सुअर या उसकी गंदगी? सुअर को घृणित मानकर तुम बताते हो कि तुम्हारे स्वयं के भीतर कितनी ज़्यादा बजबजाती नस्लीय नफरत भरी हुई है.

तुम्हारी नफरत किससे है? सिर्फ किसी के ब्राम्हण होने से? तब तो तुम्हें उस ब्राम्हणी से भी नफरत होगी जिसनें भीमराव अंबेडकर से शादी की थी. ब्राम्हणों को सुअर के रूपक में रखते तुम्हें ये चेहरे दिखे या नहीं, क्या इनसे भी तुम्हारे भीतर वैसी ही नफरत है?

एक सुअर को तुम जनेऊ पहनाते हो, तो तुम साबित करते हो, तुम्हारी नफरत किसी सामुदायिक बुराई से नहीं किसी समुदाय से है और ऐसा करते तुम एक समुदाय से नफरत करने की उसी मानसिकता को स्वयं लादे हो, जिसकी वजह से तुम एक समुदाय को चिह्नित कर रहे हो.

तुम सुअर से नफरत पाले बैठे हो, ऊसे जनेऊ पहनाते रहोगे और तुम्हें पता ही नहीं सुअर कब बदल गए और तुम कब सुअर की तरह पखाना खाते, पखाने में लोटते, पखाने की बदबू ढोते फिरने लगे हो.

– कश्यप किशोर मिश्र

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