जो खुद पानी होकर घुल गए, उनको नहीं होता बारिश का इंतज़ार

कुएं पर अगर छोटा सा गिलास लेकर पहुँच जाएँ तो क्या होगा? बिलकुल वही होता है जो “गाइड” फिल्म के राजू गाइड के साथ हुआ था. आप कुएं में बाल्टी डालकर पूरी भरी बाल्टी तो निकाल लेंगे, लेकिन उतने पानी को जब गिलास में डालने की कोशिश करेंगे तो चौथाई लीटर ही पानी ले पाएंगे. बाकी सारा तो छोटे गिलास में भर ना पाने के कारण इधर उधर बह जायेगा. बहते और इधर उधर जाते देखने के अलावा कुछ नहीं कर सकते.

राजू गाइड भी ऐसा ही कोई छोटा सा बर्तन लिए, किसी अज्ञात से कस्बे का नौजवान था. वो नर्तकी के अगाध प्रेम में तो है लेकिन उसके पास पात्र छोटा सा है. छोटी पात्रता के कारण जब प्रेम इधर उधर छलकता है तो वो हैरान परेशान भी हो जाता है. बाकी सब से छीन-झपट के जब वो नृत्यांगना को अपने लिए सीमित कर लेना चाहता है तो फिर उसके नतीजे भी वैसे ही निकलते हैं.

कुएँ से लगातार पानी नहीं निकाला जा रहा हो तो वो उतना मीठा भी नहीं रहेगा. ठहरे हुए पानी में अब वो स्वाद नहीं रह जाता. पानी पर आधारित कुछ कविताएँ पढ़कर एक दिन हम भी कुछ सवालों के जवाब ढूँढने निकले. परंपरागत नारीवादी अवधारणाओं के मुताबिक जहाँ पुरुष का ध्यान शरीर पर होता है, स्त्री मन में बसी रहना चाहती है. तो हमने सोचा बारिश की बूंदों जैसा शरीर पर से बहना क्या सिर्फ प्रेमी की तमन्ना होती होगी? या प्रेमिका भी बहती बूंदों को स्पर्श जैसा महसूस करती होगी?

“गाइड” फिल्म ख़त्म होती है तो राजू की पात्रता बड़ी नहीं, विशाल हो गई होती है. अब प्यासा कुएँ पर नहीं कुआँ ही प्यासे के पास आता है. एक एक कर के अपने जेवर गिराती जाती नर्तकी, लौट के तो आती है, लेकिन अब तक राजू गाइड कुछ और हो चुका होता है. हम भी शायद सवाल गलत जगहों पर पूछ रहे थे. प्रेम में स्पर्श महसूस करने वालों को बारिश होने और भीगने का इन्तजार भी नहीं करना पड़ता. रोटियां बेलते हुए पीठ से बहता पसीना भी स्पर्श जैसा गुदगुदा जाता है.

पहले से पहचाना स्पर्श नहीं था, छू जाने पर पता ही नहीं चला होगा. प्रेम शायद नदिया से दरिया, दरिया से सागर हो जाने जैसी चीज़ है. जो खुद ही पानी होकर घुल गए हैं, उनके लिए बारिश के इंतजार का मतलब नहीं रह जाता.

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