संस्कृति, संस्कृत, संस्कार

क्या विश्व में कोई और सभ्यता-संस्कृति है, जिस की मूल भाषा के शब्द ही उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण बन जाये? भारत भूमि पर विकसित हुई सनातन संस्कृति के अतिरिक्त कोई और नज़र नहीं आती. ऐसी संस्कृति जिसके अनगिनत शब्द और उनके शब्दार्थ ना केवल उसकी श्रेष्ठता के प्रमाण हैं बल्कि उसकी व्याख्या भी करते हैं. और उस संस्कृति का नाम सनातन, अर्थात सदा बना रहने वाला, आदि काल से अनंत तक, शाश्वत, अर्थात जो निरंतर है.

उसी सनातन के ये तीन शब्द संस्कृति, संस्कार, संस्कृत और इनके गहरे शब्दार्थ बहुत कुछ कहते हुए दिखते हैं. इतना कुछ कि सनातन जीवन सभ्यता के लिए कुछ और कहने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती. ये तीनों शब्द आपस में जुड़े, गुथे भी हुए हैं.

संस्कृति का शब्दार्थ है – उत्तम या उन्नत, बेहतर, परिष्कृत, सुधरी हुई स्थिति करना. समृद्ध करना. ‘संस्कृति’ शब्द संस्कृत भाषा के ‘कृ’ (करना) से बना है. इस से तीन शब्द बनते हैं ‘प्रकृति’ अर्थात मूल स्थिति में बने रहना, ‘संस्कृति’ अर्थात परिष्कृत करना और ‘विकृति’ अर्थात अवनति दुर्गति करना.

संक्षेप में कहें तो किसी को संस्कारित और परिष्कृत करना कि वो पहले से बेहतर बन सके, फलस्वरूप सुख, सुविधा, प्रशंसा और सम्मान आदि प्राप्त कर सके. मनुष्य स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है. यह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर की प्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता रहता है.

ऐसी प्रत्येक जीवन-पद्धति, रीति-रिवाज, रहन-सहन, आचार-विचार, जिससे मनुष्य बेहतर जीवन जी सके और अन्य जीव-पशुओं के मुकाबले में सामाजिक और सभ्य कहलाये, सभ्यता और संस्कृति को परिभाषित करते हैं.

अर्थात सनातन संस्कृति वो मानवीय जीवन शैली है जो आदिकाल से मनुष्य के जीवन को निरंतर उन्नत, विकसित कर रही है. और परिवर्तनशीलता उसका विशेष गुण है. जो परिवर्तनशील नहीं, वो विकसित नहीं हो सकता, निरंतर नहीं बना रह सकता.

इस संस्कृति को समाज में क्रियान्वित करने के लिए बनाये गए हैं ‘संस्कार’. संस्कार का अर्थ है व्यवस्थित करना, सजाना, सुधारना, शुद्ध करना, सफाई करना, मानवीय स्वभाव का परिष्कार. संस्कार के द्वारा हम मानव को संस्कृत करते हैं, उसके जीवन को व्यवस्थित करते हैं, बेहतर बनाते हैं.

संस्कार किया गया अर्थात परिष्कृत किया गया, निखारा गया. ऐसी समृद्ध सभ्यता जिसकी संस्कृति में जीवन के हर महत्वपूर्ण घटनाक्रम के लिए संस्कार हैं. यहां तक की गर्भाधान संस्कार भी है. जन्म से लेकर नामकरण संस्कार, अन्न प्राशन संस्कार, मुंडन संस्कार, विद्दारम्भ संस्कार,यज्ञोपवीत दीक्षा संस्कार से लेकर विवाह संस्कार और वानप्रस्थ संस्कार और अंत में अंत्येष्टि संस्कार और मरणोपरांत संस्कार.

जिस सभ्यता में इतने संस्कारों के द्वारा मानव को संस्कृत किया जाता हो, जिस जीवन संस्कृति में पग-पग पर आचरण की बात की जाती हों, वो सभ्यता कितनी संस्कृत होगी, उत्कृष्ट होगी, सभ्य होगी. जिस संस्कृति के संस्कार ही इतने व्यवस्थित और सुसंस्कृत है वो सभ्यता कितनी विकसित होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है.

संस्कृति का सम्बन्ध व्यक्ति और समाज में निहित संस्कारों से है; जो फिर मनुष्य के मन में निवास करते हैं. संस्कार संस्कृति बनाते हैं और संस्कृति से सभ्यता विकसित होती है. जैसे-जैसे हम संस्कृत होते जाते हैं वैसे-वैसे हम सभ्य होते जाते हैं. संस्कृति आत्मा है, सभ्यता शरीर. आत्मा शुद्ध होते ही व्यक्ति सज्जन और सभ्य हो जाता है और जहाँ वो सामूहिक रूप से रहता है वो समाज कहलाता है, एक मानवीय सभ्यता.

और जिस भाषा में उपरोक्त विचारों को, अनुभव को, चिंतन को संकलित किया गया और अगली पीढ़ी को सौंपा गया, अगर उसका नाम ही संस्कृत है तो फिर वो सभ्यता किस स्तर की विकसित होगी इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल होगा.

उस पर से सनातन सभ्यता आदिकाल की हो अर्थात प्राचीनतम हो और संस्कृत भाषा विश्व की सबसे पुरानी भाषा हो, यह तो सोने पर सुहागा हो गया. मतलब कि हमारे पूर्वज कितने पहले ही सुसंस्कृत हो चुके थे. इसलिए आर्य कहलाये. आर्य अर्थात श्रेष्ठ.

आदिकाल से एक ऐसी सभ्यता जिसकी संस्कृति निरंतर संस्कृत होती चली गई, जिसके संस्कार संस्कृत में रचे गए अर्थात वो हर काल में अपने समय की श्रेष्ठ सभ्यता रही होगी. उसके साथ फिर क्या और कैसे हुआ होगा कि हम आज यहां हैं, इस स्थिति में हैं. यह भी कम आश्चर्य का विषय नहीं.

असल में अति हर चीज की बुरी है. सुख-सुविधा आत्ममुग्ध कर देती है. ऐसे में व्यक्ति संघर्ष करना भूल जाता है. वैभव हमारी आंखे चुंधिया देते हैं. विकास अपने साथ कई बीमारियां भी लाता है. आपसी हित टकराने लगते हैं. और अधिक की चाहत में आपस में हिस्सेदारी को लेकर प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है.

और फिर जैसे कि शहर में एक अकेला सेठ कभी सुरक्षित नहीं. ठीक उसी तरह वही हुआ इस सभ्यता के साथ, जो किसी गरीब मोहल्ले में रहने वाले किसी रईस के साथ एक ना एक दिन होता है.

हम पर निरंतर बाहरी हमले हुए. जबकि हमने कभी किसी पर नहीं किये क्योंकि हमें ऐसा करने की जरूरत ही नहीं थी, हमें कहीं और जाने की आवश्यकता ही नहीं थी. उलटे दुनिया को जो कुछ चाहिए था वो सब यहां हमारे पास था.

दुनिया के सारे लुटेरे, भिखमंगे, डाकू, जंगली, बर्बर, असामाजिक इस भूमि पर आते रहे और आक्रमण भी करते रहे. हमारे पास इतना था कि हमने देने में कभी कंजूसी नहीं की. मगर लोभ की कोई सीमा नहीं, लालच में बाहर से कईओं ने आकर हम पर राज किया. और हम गुलाम बने.

इसके बाद हमारे संस्कारों, संस्कृति, संस्कृत की निरंतरता में रुकावट आयी. बाहर से आये शासक को यह कैसे बर्दाश्त होता कि जिस पर वो राज कर रहा है वो उससे बेहतर हो. मगर यही उसकी भूल थी, वो ईर्ष्या में अंधा हुआ और नफरत में उसने मानव समाज के अनमोल अनुभव जिससे वो भी लाभन्वित होता रहा था उसे ही बर्बाद करने की ठानी.

निष्पक्ष हो कर देखें तो इसे उसकी मूर्खता ही कहा जाएगा. मगर वो चूँकि शासक था और श्रेष्ठ दिखने के चक्कर में उसने अपनी लाइन बड़ी करने की जगह हमारी छोटी करनी शुरू की. उसने इसके लिए सबसे पहले हमारी संस्कृत भाषा पर निशाना साधा. अपनी भाषा से दूर होते ही हम अपने ग्रंथों, विचारों और चिंतन से दूर हो गए. हमारी जड़े कमजोर हुईं. ऐसे में पेड़ का कमजोर होना स्वभाविक था.

मुगलों के पास तो पीछे अपने मूल स्थान पर अपनी कोई विशिष्ट संस्कृति नहीं थी मगर अंग्रेजों के पास फिर भी कुछ-कुछ अपना धीरे-धीरे विकसित हो रहा था. अंगरेजी शासन के अंत तक आते-आते उन्होंने हमारे ही ज्ञान को यहां से ले जाकर रिसाइकल करके वापस भेजना शुरू किया. आज भी हम हमारे ही ज्ञान को विदेशी भाषा में अनुवादित होकर पढ़ रहे हैं. इसके अनेक उदाहरण आसानी से देखे जा सकते हैं.

बहरहाल इस गुलामी के लम्बे कालखंड में भी हम बचे रहे क्योंकि हमारे साथ हमारे संस्कार थे. मुग़ल और अंग्रेज, दोनों के शासन काल में अगर हमारी संस्कृति बची रही तो उसका एकमात्र कारण था हमारे जीवन से, समाज से, परिवार से, विचार में, चिंतन में सदियों से चले आ रहे संस्कारों का बचा रहना.

मगर अब उस पर भी वार हो रहा है. हम अपने संस्कारो से दूर किये जा रहे हैं. हम राजनैतिक रूप से ज़रूर स्वतंत्र हो गए हैं मगर अब भी हम पर धर्म परिवर्तन गिरोह की नज़रें हैं. वे पूरी तरह सक्रिय हैं हमारे संस्कारों से हमें दूर करने के लिए.

पहले संस्कृत, अब संस्कार से दूर होते ही हम अपनी संस्कृति से दूर हो जाएंगे और एक कटे हुए वृक्ष के समान रह जाएंगे, जिसमें फिर कोई जीवन नहीं. हमारे मृत होते ही विश्व से सभी प्राचीन सभ्यता का अंत हो जाएगा.

और यही आज के दोनों बड़े धर्म चाहते हैं जिससे वे अपना एकछत्र राज कायम कर सके. यह दीगर बात है कि इससे उन्हें क्या प्राप्त होगा उन्हें खुद नहीं पता, सिवाय इसके कि वो अपने धर्म के मानने वालो को यह झूठ बता सके कि मानव सभ्यता उनसे ही शुरू हुई थी.

बहरहाल हमारे जीवन में अब प्रमुख संस्कार जैसे विवाह और मरणोपरांत संस्कार आदि ही कुछ बचे हैं वो भी दिखावे के लिए. सब कुछ लगभग समाप्त है. जब संस्कृत नहीं रही, संस्कार नहीं बचेंगे तो फिर सनातन संस्कृति कैसे बची रह सकती है. वो धीरे-धीरे हमारे ही हाथों खत्म की जा रही है.

एक समृद्ध सुसंस्कृत सभ्यता कैसे नष्ट होती है हम उसके ज़िंदा प्रमाण हैं. दुःख इस बात का है कि इसके साथ ही हजारों साल के जीवन मूल्य, ज्ञान, चिंतन, दर्शन, अध्यात्म सब कुछ खत्म हो जाएगा. और हम सब जंगली, कबीलाई, उछृंकल उच्छृंखल जीवन शैली को अपनाने के लिए मजबूर हो जायेंगे.

अब भी समझ सको तो समझो कि कुछ तो विशिष्ट होगा हमारी संस्कृति, संस्कृत और संस्कारों में, जो पूरे विश्व से लोग यहां लगातार आते रहे. वो क्या विशेष था जो उन्हें आकर्षित करता था, उसे ही बचाने की जरूरत है. अगर बचा सको तो बचा लो. वरना आने वाली मानव की पीढ़ियों के लिए मानव का इतिहास सिर्फ और सिर्फ ईसा के बाद से माना जाएगा.

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