हिन्दू वोटों का लालच तो दिखाओ, कुर्ते के ऊपर से जनेऊ पहनने लगेंगे सेकुलर नेता

गांधी की हत्या के बाद जब संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था तब संघ के अंदरखाने में एक बात बहुत ज़ोर-शोर से उठी थी कि संघ को भी राजनैतिक क्षेत्र में जाकर काम करना चाहिये. राजनीति दृष्टि संकुचित करती है और संघ का मूल दर्शन समग्र हिन्दू समाज को साथ लेकर चलने का था, इसलिये संघ में इस बात को लेकर एक राय नहीं बन रही थी.

संघ के पुराने लोग बताते हैं कि पूज्य गुरूजी तो इस विचार से ही इतने आहत हुए थे कि उन्होंने बाकी लोगों से कह दिया था कि जिसे राजनीति करनी है वो जाकर राजनीति करे, मैं पुनः पूज्य डॉक्टर साहब की तरह पांच बच्चों को लेकर शाखा लगाऊंगा.

खैर, जनसंघ बना और डॉ श्यामाप्रसाद मुख़र्जी जैसे प्रामाणिक लोग उसका काम देखने भेजे गये. गुरूजी ने जनसंघ के लिये कार्यकर्ता भेजे तो उन्हें स्पष्ट कहा कि राजनीति में आपकी भूमिका केवल नट की है, अपना अभिनय करो और वापस आ जाओ, उस किरदार से दिल न लगाने लग जाओ.

कम से कम श्यामाप्रसाद मुख़र्जी जैसे महात्मा ने इस भाव को राजनीति में भी जीवंत रखा. जनसंघ में होते हुए भी उनकी भावना समग्र हिन्दू समाज के लिये थी. एक बार किसी चुनाव के बारे में एक युवक ने उनसे पूछा कि इस चुनाव में हमारे कितने लोग जीत कर आ सकते हैं?

श्यामाप्रसाद जी के उससे पूछा, ये सवाल तुम जनसंघ के कार्यकर्ता के रूप में पूछ रहे हो या स्वयंसेवक के रूप में? युवक ने कहा, इससे क्या अंतर पड़ता है? इस पर डॉक्टर मुख़र्जी ने कहा, अगर ये प्रश्न जनसंघ के कार्यकर्ता के नाते पूछ रहे हो तो हमारे इतने आदमी जीत कर आने वाले हैं और अगर ये प्रश्न स्वयंसेवक के नाते पूछ रहे हो तो फिर जो भी जीत कर आयेंगे वो सब अपने हैं.

संघ का ये विचार शाश्वत था इसलिये जब इंदिरा ने इमरजेंसी के दौरान संघ पर प्रतिबंध लगाये थे और बाद में उन्हें प्रतिबंध हटाना पड़ा था तब उसके बाद स्वयंसेवकों में इंदिरा सरकार और कांग्रेस के खिलाफ बड़ा आक्रोश था जिसे शांत करते हुए तत्कालीन सरसंघचालक पूज्य बालासाहेब देवरस ने कहा था, “भूल जाओ और क्षमा करो, दांत के अंदर जीभ आ जाये तो इसे काटते नहीं है, ये सब अपने ही लोग हैं.”

बतौर हिन्दू हमारा विचार भी यही होना चाहिये. राजनैतिक बदला और द्वेष भाजपा वाले पालें तो शोभा देता है पर यही हम करें यह उचित नहीं है. संघ की आरम्भ से दृष्टि यही रही है कि जो हिन्दू अपने पक्ष में नहीं है उन्हें पक्ष में लायेंगे पर उनके लिये द्वेष नहीं पालेंगे, गाली नहीं देंगे. संघ की इस दृष्टि का ही सुफल था कि इंदिरा द्वारा थोपी इमरजेंसी के दौरान कई संघ कार्यकर्ताओं को कांग्रेस के नेताओं ने अपने घरों में शरण दी थी और संघ के प्रति विपक्षियों में भी सद्भावना थी.

ज़रा एक मिनट के लिये किसी दूसरी पार्टी का कार्यकर्ता बनकर सोचिये कि वो हमारे बारे में क्या कल्पना करता होगा. वो जानता है कि आप और हम उसे वोट नहीं ही देने वाले तो बतौर राजनैतिक पार्टी वो दूसरे खेमों से वोट का जुगाड़ करने लग जाता है जिसके नतीजे में तुष्टीकरण जैसे घातक विचार पनपते हैं पर प्रश्न ये भी है कि क्या हमने इन्हें कभी ये विश्वास दिलाया है कि तुम हिंदुत्व के विषय पर चलो हम तुम्हारे साथ हैं?

ईमानदारी से बताइए कि क्या कभी किसी गैर-भाजपा पार्टी के हिंदुत्व वाले अच्छे काम पर आपने उनकी पीठ थपथपाई है? भाजपा के अलावा किसी और पार्टी को जाकर हिन्दू वोटों की संगठित शक्ति का लोभ दिखाया है?

स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने कहा था कि हिन्दू वोट का लालच दिखाओ तो सेकुलर नेता कुर्ते के ऊपर से जनेऊ पहनने लगेंगे, आपने कितनी बार ये कोशिश की है? अभी कुछ दिल पहले की खबर है जब पिछली सरकार संघ प्रमुख मोहन भागवत को आतंकी सूची में डालने की तैयारी कर रही थी तब जिस शख्स ने खुलकर इसका विरोध किया था उसका नाम है ‘शरद यादव’. आपमें से किसने इस आदमी का अभिनन्दन किया?

आप मुझसे असहमत होइये या मुझे गाली दीजिये पर मेरी दृष्टि यही है, मैं भाजपा के लिये नहीं समग्र हिन्दू समाज के लिये सोचता हूँ इसलिये मैंने आज तक मेरी किसी लेख में किसी दूसरे राजनैतिक दल या नेताओं की आलोचना नहीं की, सिवाय उन चंद नेताओं के जिनका देशद्रोह साबित है.

वो समाज आपकी भाजपा को वोट भी नहीं देता और गाली भी देता है तब भी उसने आपकी भाजपा के गिर्द अपने कई लोग लगा रखे हैं जो इनसे अपने सारे काम करवा लेता है और आप मुंह देखते रह जाते हैं.

ज़फ़र सरेशवाला को कैसे-कैसे उपकृत किया गया है ये आपमें से कईयों को बेहतर मालूम है. इधर भाजपा भी आपका संज्ञान लेती तो बात समझ में आती पर वो तो आपको अपना ज़रखरीद गुलाम समझ कर आपको कुछ भी नहीं देती.

किसी दल विशेष का समर्थक बनने की बजाये सिर्फ हिन्दू बनकर सोचिये, हर पार्टी को अपने हितों के अनुरूप चलने को बाध्य करने की रणनीति बनाइये. क्षुद्र सोच हमारी ताकत को कितना कम और जड़ों को कितना खोखला कर चुकी है आपको इसका अंदाज़ भी नहीं है और जब तक ये बात समझ में आयेगी तब तक शायद बहुत देर हो जायेगी.

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