1जी 2जी 3जी 4जी, नहीं जी, नहीं जी, नहीं जी, अब तो बस यही ‘जी’वन है जी

मुफ़्त मे मौत भी नहीं मिलती,
उसके लिये भी जीना पड़ता है,

ऐसे में बाजार में क्या कुछ मुफ़्त मिल सकता है?
वो भी कलयुग में?
नहीं नहीं नहीं.

फिर भी हम टूट पड़ते हैं,
घंटों क़तार में खड़े रहते हैं,
एक के साथ एक की स्कीम में.
फिर चाहे उस पहले एक की भी ज़रूरत ना हो.

फिर भी हम कहलाते हैं
प्रकृति के श्रेष्ठ जीव,
आधुनिक काल,
सभ्य समाज,
विकसित सभ्यता,
और उसमें रहने वाले,
पढ़े लिखे लोग.

अब देखो ना,
हमको अपनो से बात करने के लिये भी चाहिये,
1जी 2जी 3जी 4जी,
क्या यह कहीं जाकर रुकेगा जी?
नहीं जी… नहीं… जी… नहीं जी…
अब तो बस यही “जी”वन है जी.

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