नज़र रखिये, शत्रु बॉर्डर पर ही नहीं, कभी कभी घर में भी होता है

मेरे समेत कईयों को लगा है कि एकेडमिक स्तर पर भारत के साथ बहुत जबरदस्त धोखा हुआ है.

जो शब्दावली लाइफ को चलाने के लिए होती है वो निर्लज्ज रूप से भारत की तो नहीं है. मुझे खुद पहला झटका यहीं फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर मिला था. मैं हैरान रह गया था. शब्दों की और परिभाषाओं की अपनी कीमत होती है और अपने आप में जीवन लिए होती है.

मैं बचपन से अब तक पैदा होकर बड़ा हुआ, जीवन कुछ ऐसा रहा कि सामान्य जीवन से तो नाता भारत में इतना नहीं रहा. पर मैं तो था. भारत आता जाता भी था, बात करता भी रहा और भी बहुत कुछ क्रियाकलाप देखता रहा पर एकेडमिक नैरेशन में देश को किस दिशा में घसीट कर एकही तरीके से सोचने पर मजबूर किया जा रहा है, वो पता नहीं था.

पता क्या नहीं था, जो मैं देख भुगत के बड़ा हुआ हूँ उसका तो कोई हिस्सा ही नहीं है. ये बात देखकर हैरान था. टोटल कंफ्यूसिंग माहौल एकेडमिक स्तर पर पिछले सत्तर साल में भारत में बना दिया गया है. सामाजिक टकराव की स्थिति ऐसे ही नहीं आ जाती. जीवन से भरे भारत को मृत बनाकर उसमें विदेशी नरेशन के प्राण फूंकने का जो काम चला है वो टकराव की स्थिति लाता ही. कोई आश्चर्य भी क्या हो. जो था, उसका संवर्धन विदेशी नजरिया क्या कर सकता है, उसके पास तो रिप्लेस करने का ही ऑप्शन बचता है. वरना खुद ही खत्म न हो जाएगा?

वामपंथी नरेशन ने बेवकूफी करके सरकारी संरक्षण की सहायता से ऐसा खींचा है कि आने वाली नस्लें ही नष्ट करने का पूर्ण प्रबंध कर दिया है. जो चाहते हैं वो तो हो नहीं पायेगा क्योंकि चंगु मंगू करके पड़ोसी भी निगलने को तैयार बैठे हैं. दुखदायी बात तो ये है कि भारत जिन गुणों से सर्वाइव करता आया उन्हीं को इन घर के बैठे गद्दारों ने नष्ट करने का प्रयास किया है.

क्या संविधान में कहीं लिखा है कि राजनीति का नरेशन वामपंथी और दक्षिणपंथी ही होगा? भारतपंथी कहाँ है? खींसे निपोर कर और कोई उचित प्रबंध या शब्द न होने पर जो धन धान्य और सुखी जीवन वाले अहंकार से युक्त प्रोफेसर और कुछ रिपोर्टर्स बैठे हैं, उनके पास भी जवाब नहीं होगा.

अंग्रेजों का काल तो ठीक लगता है. पता था कि दुश्मन कौन है. पर सत्तर साल ही लगता है गुलामी के डेढ़ सौ साल पर भारी पड़ गए, जहां मुसीबत तो दिखती है पर शत्रु ही समाज में बैठा है. वो भी फैल कर, यहीं खाता कमाता है और विदेशी उल्टी से पूरी गंध मचाता है.

रोमेंटिक बातें हो गयी हैं. अब समाधान की तरफ.

• उन लोगो को चेताईये जो हिटलर आदि की बात करते हैं और उसका उपयोग करने को उकसाते हैं. ये झामियों के प्रिय कारनामे हैं.

• जिसे धर्म शब्द का संधान नहीं और हिन्दू धर्म और मुस्लिम धर्म आदि के नाम से पुकारता है तो वाट लगी है. झामी को तो कहां समझ आएगा. पर जो भारत से प्यार करता है कम से कम धर्म और मजहब का भेद समझे.

• दक्षिणपंथ खोपड़ी में ठूंस दिया गया है. इससे जान छुडाईये, ये वामपंथी का उल्टा शब्द है जिसे थोपा गया है. अपना शब्द बनाइये. वरना दक्षिणपंथ तो पूरे संसार का नरेशन है. बोल्ड अक्षरों में, “आप संसार से अलग हैं परिवेश में”

• जिसने वर्ग थ्योरी और फ़्यूडल आदि शब्द पकड़ लिए हैं, गौर से देखियेगा, ये अभारतीय नरेशन है, खुद मानसिक गुलाम हैं, दूसरों को भी बनाने के चक्कर में रहते हैं.

बहुत है लिखने को, बस ध्यान रखिये, ये नरेशन काफी काम की चीज है. फेसबुक पर भी काफी मित्र लगातार लिख रहे हैं, उनकी वाल भी देखते रहिये. बाकी नज़र रखिये. शत्रु बॉर्डर पर ही नहीं होता, कभी कभी घर में भी होता है.

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