संघ या मोदी सरकार को किसी प्लांटेड बुद्धिजीवी की ज़रूरत नहीं

किसी राष्ट्रवादी को झूठ फैलाने का काम नहीं करना होता है, ना ही उसे परसेप्शन बनाना है. वे तो ऋषि कर्म कर रहे हैं, जहां सिर्फ धर्म काम करता है कोई स्वार्थ नहीं.

यह सच है कि मोदी सरकार अपनी विचारधारा के बुद्ध‍िजीवियों के ‘तुष्टिकरण’ के मामले में ना केवल फेल है बल्कि निष्क्रिय भी है. और तो और, यह उनके एजेंडे में भी नहीं. यह भी सच है कि सांस्कृतिक, साहित्यिक और शिक्षण संस्थानों पर अब भी वामपंथियों का ही कब्जा है. जिन्हे राष्ट्र और अवाम में कोई विशेष दिलचस्पी नहीं, और वे सब आज भी अपने-अपने आका के एजेंडे पर ही काम कर रहे हैं.

इन सब के कारण राष्ट्रवादी और स्वतंत्र बुद्धिजीवियों में बेचैनी है, कहीं-कहीं आक्रोश भी. क्योंकि अपनी सरकार के आने के बाद वे भी कहीं किसी पद की शोभा बढ़ाएंगे, ऐसी उम्मीद पाले बैठे थे. अपेक्षा मानवीय स्वभाव है और अगर वो पूरी ना हो तो एक सामान्य व्यक्ति जो कुछ करता है वो सब राष्ट्रवादी लेखक आजकल कर रहे हैं. लिख रहे हैं, चीख रहे हैं, किसी नाराज ज़िद्दी बच्चे की तरह जमीन पर लोट रहे हैं.

ऐसे ही एक राष्ट्रवादी लेखक का एक लेख सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिला. जिसमें यही था कि अपने बुद्ध‍िजीवियों का ‘तुष्ट‍िकरण’ क्यों जरूरी है. उनके मतानुसार इसके द्वारा अपने पक्ष में एक ‘इंटेलेक्चुअल नैरेटिव’ तैयार होता है. ये ‘पर्सेप्शन-बिल्ड‍िंग’ का काम करता है. और इसके द्वारा चुनाव जीते-हारे जाते हैं.

हम कितने नासमझ हैं और तर्को और तथ्यों को कितनी जल्दी अपने पक्ष में करके लिख देते हैं, मगर सच छिपता नहीं. मैं अपने मित्र से पूछना चाहूंगा कि 2014 के चुनाव के समय किसकी सरकार थी. और सरकार के पक्ष में परसेप्शन बनाने वाले वामपंथी गिरोह के होने के बाद भी वे अपने आका को चुनाव नहीं जितवा पाए.

और जिन्होंने 2014 जीता उनका ‘इंटेलेक्चुअल नैरेटिव’ तो आज भी नहीं है ऐसा हम स्वयं मान रहे हैं फिर भी वे प्रचंड बहुमत से जीते थे. और अगर मेरे मित्र बिहार के चुनाव की हार सिर्फ इस परसेप्शन के कारण मानते हैं कि ‘छप्पन चोरों’ ने एक साथ इनाम लौटा दिए थे तो वे फिर बिहार के चुनावी गणित से वाकिफ नहीं.

और फिर अगर नाज़ियों को ‘प्रोपगंडा’ का महत्व मालूम था, हिटलर का प्रचार मंत्री योसेफ़ गोयबल्स ‘प्रोपगंडा’ की दुनिया का जीनियस था, फिर भी हिटलर द्वितीय विश्वयुद्ध कैसे हार गया. मित्र, आपके मतानुसार तो हिटलर को जीतना चाहिए था मगर वो तो परसेप्शन की लड़ाई भी बुरी तरह हार गया.

संक्षिप्त में कहना हो तो यही कहूंगा कि ये तथाकथित दरबारी बौद्धिक लोगों के द्वारा बनाया गया परसेप्शन, रेत की दीवार की तरह है जिसे तथ्य और तर्क का एक बच्चा भी धराशायी कर देता है. विशेष कर जनता इस झूठ को ज्यादा दिन नहीं चलने देती. इसलिए अपने बौद्धिकों को झूठ गढ़ने का बढ़ावा देने के सीमित और अस्थायी लाभ ही हैं.

वैसे भी, जितना मैं जान पाया हूँ, आरआरएस की यह नीति नहीं. वहां ऐसा कोई प्रयोजन नहीं किया जाता. ऐसा क्यों है, इस पर फिर कभी विस्तार से लिखूंगा. चूँकि मोदी सरकार की जड़े आरआरएस में है तो यहां भी ऐसा कुछ ना होने पर कोई आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए.

बहरहाल मेरे इस लेख का असली मकसद उपरोक्त विवेचना नहीं थी, बल्कि मुझे उपरोक्त लेख के लेखक के अहं ने लिखने के लिए मजबूर किया. अध्ययन और ज्ञान व्यक्ति को इंटेलेक्ट ग्रेस देता है, ऐसा माना भी जाता है. मगर अक्सर देखा गया है कि ज़रा सी प्रसिद्धि व्यक्ति को घमंड में डुबो देती है. फिर चाहे वो राष्ट्रवादी ही क्यों ना हो.

अभी-अभी शिखर पर सुशोभित, नए-नए चक्रवर्ती सम्राट अपने ही तरफ के बड़े-बड़े योद्धाओं को सिरे से ख़ारिज करते नजर आये तो पढ़ कर पीड़ा हुई. मोदी सरकार ने दो चार ही सही, जिस किसी को भी नियुक्त किया है वो अपनों की निगाह में भी मज़ाक के पात्र बना दिए जाएं, यह देख कर दुःख हुआ.

यह कैसी बौद्धिकता है, यह कैसी राष्ट्रवादिता है, और यह कैसी मानवता है. यह तो मठाधीश के गुण हैं, जहां शीर्ष पर बैठा अपने पैमाने खुद तय करता है. क्या बौद्धिकता का पैमाना उपरोक्त लेख लिखने वाले से तय होगा?

दीनानाथ बत्रा, ‘पांचजन्य’ के पूर्व संपादक, ए. सूर्यप्रकाश, गजेंदर चौहान, पहलाज निहलानी, विवेक देबरॉय सब की योग्यता पर प्रश्नचिह्न के ऐसे शब्द बाण चलाये गए, कि ऐसे तो किसी विरोधी ने भी नहीं चलाये होंगे.

और जब यह लिखा गया कि ‘केंद्र सरकार ने विभिन्न राज्यों में जिन मुख्यमंत्रियों को तैनात किया है, उनका शैक्षणिक स्तर क्या है, इस पर मैं टिप्पणी नहीं करूंगा‘, यह पढ़ कर मुख्य लेख लिखने वाले की बौद्धिक क्षमता पर ही सवालिया निशान लगाने का मन किया, फिर चाहे वो आजकल मेरे अपने ही राष्ट्रवादियों में खूब हिट हो रहे हों.

अब तक के एक से एक सफल राजनेताओं की शैक्षणिक योग्यता क्या रही है, क्या किसी से छिपी है. उस पर से गांधी परिवार की तो यहां बात ही नहीं की जा रही.

और फिर थिंक टैंक के नाम पर जिन वामपंथी बौद्धिक जन की वंदना लेख में की गई, फिर चाहे वो अरूंधती रॉय, हर्ष मंदर, अरुणा रॉय हों या फिर रामचंद्र गुहा और शिव विश्वनाथन, ये सब भी खाली बर्तन ही हैं जो सिर्फ शोर मचाते हैं. दो पल ठहर कर कोई इनसे ढंग से दो बात कर ले तो इन्हें तीसरे तर्क और तथ्य पर धराशायी कर सकता है. इनके लिए किसी को शंकराचार्य बनने की जरूरत नहीं.

लेख का सबसे तकलीफदायक कथन था, भक्तजन पर टिप्पणी. यह बेहद आपत्तिजनक है. मित्र, ये जो आप के हिसाब से ‘सूचनाहीन भक्तजन‘ हैं, इन्होंने ही इन बड़े-बड़े महारथियों को धूल चटा रखी है, और आप को शायद यह गलतफहमी हो गई कि इनका किला आप के क्लिष्ट शब्द बाणों से धाराशायी हुआ है.

यह गलतफहमी ही यह दिखलाती है कि अहम् कितना सर चढ़ कर बोल रहा है. उतर जाइये जल्दी से अन्यथा शिखर से गिरने पर चोट ज्यादा लगती है.

और अंत में एक छोटी सी बात, राष्ट्रवादी को क्यों नहीं तुष्टिकरण करना चहिये? क्योंकि किसी राष्ट्रवादी को झूठ फैलाने का काम नहीं करना होता है, ना ही उसे परसेप्शन बनाना है. वे तो ऋषि कर्म कर रहे हैं, जहां सिर्फ धर्म काम करता है कोई स्वार्थ नहीं.

वैसे भी संघ हो या मोदी सरकार, वो अपना सन्देश लोगों तक पहुंचाने में अब तक सफल रहे हैं, इसलिए उन्हें किसी प्लांटेड बुद्धिजीवी की जरूरत नहीं. और जो स्वतः राष्ट्रवादी लेखक है, वो कभी स्वयं प्लांट होना नहीं चाहेगा. और फिर ऐसा होने पर एक राष्ट्रवादी और एक वामपंथी में फर्क ही क्या रह जाएगा. जब तक कोई नि:स्वार्थ लिख रहा है तब तक ही वो राष्ट्रवादी है.

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