ज़रूरत गौरक्षकों नसीहत देने की नहीं, कठोर गौरक्षा कानून लाने की है

गौरक्षकों के मुद्दे पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र व राज्य सरकारों से कहा कि वे किसी भी तरह की गुंडागर्दी को शह न दें. गौरक्षा के नाम पर हो रही हिंसक घटनाओं के मामले पर केन्द्र और राज्य सरकारों से चार हफ्ते में जवाब देने को कहा गया है.

देश के प्रधानसेवक ने भी 16 जुलाई को गौरक्षकों को चेतावनी देते हुए राज्य सरकारों को निर्देश देते हुए कहा कि इन गौरक्षकों के विरुद्ध सख्त कार्यवाई की जाये. इसी दौरान भाजपा शासित राज्यों गुजरात और झारखंड ने कोर्ट को बताया कि गौरक्षा के नाम पर हिंसा में शामिल लोगो पर सख्त कार्यवाई की गयी है.

योजना आयोग जो अब नीति आयोग के नाम से जाना जाता है उसकी रिपोर्ट के अनुसार 1947 मे देश में 1 अरब 21 करोड़ गायें थी. जो लगातार अवैध रूप से कत्लखानों में कटने और विषम परिस्थितियों के कारण घटकर वर्तमान में केवल 10 करोड़ रह गयी हैं.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने यह घोषणा की थी कि यदि उनकी सरकार बनी तो 11 मार्च को ही रात के 12 बजे से प्रदेश के सभी यांत्रिक कत्लखाने बंद कर दिये जाएंगे. वहां योगी सरकार ने सत्ता संभालते ही अवैध बूचड़खानों पर ताले डलवा भी दिये.

फिर भी कुछ विशेष इलाकों में आज भी चोरी छिपे पशुवध जारी है एक न्यूज चैनल ने अपने स्टिंग ऑपरेशन में इसका खुलासा किया था. प्रधानसेवक ने गत वर्ष भी गायों और गौरक्षकों को लेकर एक बयान दिया था जिसे लेकर बहुत विवाद हुआ था. उन्होने गौरक्षा के नाम पर हो रही गतिविधियों पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा था कि गाय को खतरा वध से नहीं प्लास्टिक से है.

तो जिन राज्यो में आपकी सरकारे 10- 10 या 15 -15 सालों से है वहां कितने प्लास्टिक कारखाने बन्द किये. मप्र में भी 1 मई 2017 से पॉलीथीन बेन होने के बाद भी हर जगह उसका उपयोग धड़ल्ले से और खुलेआम किया जा रहा है.

पिछले साल 28 फरवरी 2016 को दिल्ली के जंतर मंतर पर देश भर से लाखों लोग एकत्र हुए थे. उन्होंने प्रदर्शन कर गाय को राष्ट्रमाता घोषित करने की मांग की थी. पर सरकार ने इस प्रदर्शन को पूरी तरह नजर अंदाज कर चुप्पी साध ली थी. इस घटना से प्रेरित होकर गुजरात में एक ह्रदय विदारक घटना घटी थी. जिससे देश के सभी राष्ट्रीय न्यूज चैनल और प्रिंट मीडिया ने आंखे फेर ली और एक महान गौरक्षक के बलिदान को गुमनामी की खाई में धकेल दिया.

गुजरात के जसदण जिले के गढ़डिया गांव में रहने वाले हिंदाभाई भरवाड़ पूरे क्षेत्र में गौरक्षक के नाम से जाने जाते थे. वे अपने संगठन ‘गौरक्षक समिति’ और साथियों के सहयोग से राज्य में गायों को कत्लखाने से बचाने का अभियान चलाये हुए थे. उन्होंने केवल अपने एक जिले से ही 29 हजार से अधिक गायों को कत्लखानों में कटने से बचाया था. साथ ही वे राज्य में चल रहे सभी वैध अवैध कत्लखानों को बंद करने का आंदोलन भी चलाये हुए थे. बावजूद इसके पूरे राज्य में कत्लखाने धड़ल्ले से चल रहे थे. उनका आंदोलन पूरी तरह अहिंसक था. बावजूद इसके गुजरात सरकार और प्रशासन उनकी मांगो को लगातार टाले जा रहा था.

तब उन्होंने गाय को राष्ट्रमाता घोषित करने और पूरे राज्य में गोमांस की बिक्री को रोकने के लिये अपने साथियों के साथ राजकोट के कलेक्टर कार्यालय में आमरण अनशन शुरू कर दिया. किंतु प्रशासन की बेरूखी लगातार जारी रही. इससे व्यथित होकर उन्होंने गत वर्ष 17 मार्च 2016 गुरूवार को कलेक्टर कार्यालय परिसर में ही अपने आठ साथियों के साथ कीटनाशक जहर पी लिया. जिस समय यह घटना घटी वहां बड़ी संख्या में पुलिस बल भी तैनात था. जहर पीने के बाद जब उनकी तबीयत बिगड़ने लगी तो पुलिस ने उनको अस्पताल में भर्ती कराया किंतु उपचार के दौरान देर रात को हिंदाभाई भरवाड़ ने दम तोड़ दिया. जबकि उनके साथी कमलेश रबारी, दिनेश लोरिया, अमर धानिधारिया, रघवीर सिंह जड़ेजा, वाला मारू, विजय सिंधव और दीपक वाघेला जीवन और मौत से जूझते रहे. आज इस घटना को घटे पूरे डेढ़ साल बीत गये है.

दो साल पहले कर्नाटक में गौरक्षक प्रशांत पुजारी की भी शांतिदूतों ने खुलेआम तलवारों से गोदकर हत्या कर दी थी. इसी प्रकार आगरा में गौरक्षक अरूण माहौर भी शांतिप्रिय समुदाय के शिकार बनकर जान से हाथ धो बैठे थे. इन घटनाओं से साफ ज़ाहिर है कि गोहत्यारों में कानून का कोई खौफ नहीं. गोतस्करी लगातार जारी है.

सरकार और पुलिस पर गौरक्षकों को बिलकुल भरोसा नहीं रहा. तो अब उपाय क्या बचता है?

यही कि खुद ही गौरक्षा करें. अपनी जान जोखिम में डाले. खुद ही गायों कि निगरानी करे. क्योंकि सरकार के सहारे कितनी गौरक्षा हो रही है यह राजस्थान की सरकारी हिंगोनिया गौशालाशा के इतिहास से आप जान सकते हैं. जहां दो साल पहले सैकड़ों गायें कीचड़, गोबर के बीच भूख प्यास से तड़प-तड़पकर मर गयी थी. वहां वसुंधरा की सरकार है.

मप्र में भी गाय को राजकीय पशु बनाने के लिए डेढ़ दशक पूर्व आयोग का गठन किया था …आयोग ने क्या काम किया …
कोई नहीं जानता!
गाय आज तक मप्र में राजकीय पशु नहीं बन पायी और वो आयोग भी अब अस्तित्व में नहीं है …गाय आज भी सड़कों पर अनाथ और लावारिस की तरह भटक रही हैं.

गौरक्षा के नाम पर राजनीति आज भी जारी है. गायों की तस्करी, कत्ल और गौमांस की बिक्री हर राज्य में चाहे वहां किसी भी दल की सरकार हो खुलेआम या कहीं दबेछुपे चल रही है… जबकि गायों के नाम पर राजनीति करने वाले केन्द्र-राज्य और सरकार के बड़े बड़े पदों पर आसीन हो चुके हैं. है…किंतु गायें और गौरक्षक आज भी सड़को पर लावारिस घूम रहें हैं…गाये कभी भूख से तो कभी ठंड या पॉलीथीन खाकर मारी जा रही है…न तो कत्लखाने बंद हुऐ है न पॉलीथीन पर रोक लगी है…जब गुजरात मे गौरक्षा की यह स्थिति है तो देश के बाकि राज्यो मे क्या होगी इसका अंदाजा आप आसानी से लगा सकते है….

आज डेढ़ साल बाद हिंदाभाई को सभी लोग भूल चुके हैं. उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर न तो कहीं कोई श्रृद्धांजलि दी गयी न स्मरण न ट्वीट न कोई पोस्ट. यदि हिंदाभाई भी गायों का राजनीतिक उपयोग करना जानते तो वे आज न सिर्फ जीवित होते बल्कि किसी विधानसभा या संसद सदस्य के रूप मे सदन की शोभा बढ़ा रहे होते या उससे भी कहीं आगे होते!

यदि कठोर गौरक्षा कानून हो और गौहत्यारों में कानून /प्रशासन का भय हो तो गौरक्षकों को कानून अपने हाथ में लेने की ज़रूरत ही न पड़े. ज़रूरत गौरक्षकों को नसीहत देने की नहीं कठोर गौरक्षा कानून लागू करने की है.

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