भगवद्गीता ठीक से नहीं पढ़ी? प्रकृति का अनिवार्य नियम है परिवर्तन

किसी ज़माने में इंसान भी जानवरों जैसा ही था. शब्दों के जरिये संवाद नहीं कर सकता था, एक-दो किस्म की ध्वनियाँ निकालता, इशारों से काम चलाता. फिर धीरे-धीरे इशारे बेहतर होने लगे और बार-बार जिन चीज़ों की जरूरत होती उनके लिए ख़ास शब्द बने. शायद खतरों से आगाह करने, पानी और भोजन के लिए सबसे पहले शब्द गढ़े गए होंगे. इशारों से आगे बढ़कर इसी तरह कभी संवाद का नया रूप बात-चीत शुरू हुआ होगा.

धीरे-धीरे जैसे-जैसे कबीलों की जानकारी बढ़ने लगी तो उसे अगली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने की ज़रूरत भी समझ में आई होगी. फिर दीवारों पर भित्ति चित्र बनने लगे. जैसे-जैसे पीढ़ियाँ गुज़री ये भी एक ख़ास रूप लेने लगे, पहले शब्द चित्र और फिर उसी से अक्षर बने होंगे. जब लिपियाँ विकसित हो गयीं तो उन्हें पत्थरों पर उकेरा गया, धीरे-धीरे इन्हीं ने कागज़ पर किताबों की शक्ल ले ली.

संवाद के इस बदलते रूप में लोगों को परिवर्तन से दिक्कत भी होती रही है. बोलने के बदले लिखने से कैसी दिक्कत होती है वो आप व्यापारियों या अन्य कई पेशे में जुटे लोगों से बात करते समय सुन सकते हैं. जब कोई व्यापारी कहता है कि वो बिना पढ़े लिखे ही कई एम.बी.ए. घुमाता है, या कोई मिस्त्री कहे कि वो बिना पढ़े-लिखे ही इंजिनियर से ज्यादा जानता है तो ठीक यही बदलाव से परहेज की मानसिकता दिखती है.

संवाद को फिर दूर तक पहुँचाने के लिए जब टेलीफ़ोन, माइक जैसे यंत्र भी बने तो लोगों को फिर उनसे दिक्कत होने लगी. एक मशहूर बहुराष्ट्रीय कंपनी, आई.बी.एम. के मुखिया को जब टेलीफोन के बारे में बताया गया था तो उनका सवाल था कि भला लोग एक जगह से दूसरी जगह फोन क्यों करना चाहेंगे? इसी कंपनी के प्रबंधकों को बाद में कैलकुलेटर से आगे, एक्सेल जैसी स्प्रेडशीट की जरूरत भी समझ में नहीं आई थी. इस वजह से आज दुनिया में एक माइक्रोसॉफ्ट नाम की कंपनी भी होती है.

अख़बारों से आगे बढ़कर जब रेडियो और टेलीविजन जैसे ब्रॉडकास्ट के माध्यम आये थे, तो कई लोगों को इनका उपयोग भी समझ नहीं आया था. रुढ़िवादियों ने फिर पूछा कि इनका क्या होगा? ऐसे रुढ़िवादियों के 15-20 साल के बच्चों से ये जरूर पूछना चाहिए कि तीजनबाई कौन है? पीपल के नीचे बैठे उन महानुभाव को ये नाम पता है, किस्मत से लोकपरम्परा के कलाकार जो बदलते संचार माध्यमों के साथ नहीं बदले उनमें से कई ख़त्म हो चले हैं.

ये बिलकुल वैसा ही है जैसे बोलियों के विकास के साथ इशारों वाली सभ्यताओं का ख़त्म होना. उसके बाद फिर लेखन के विकास पर सिर्फ बोलियों तक सीमित रही जनजातियों का पतन. फिर जैसे-जैसे टीवी, अख़बार, इन्टरनेट इत्यादि का विकास हुआ, इन्हें ना अपनाने वाले सिकुड़ते-सिमटते रहे.

अब कई लोगों को सोशल मीडिया से दिक्कत होती है. उन्हें लगता है कि इसकी कोई उपयोगिता नहीं होती. किस्मत से वो अगली ही पीढ़ी को फोन के बदले भी व्हाट्स-एप्प और चैटिंग का इस्तेमाल फ़ोन से ज्यादा करते देखते हैं.

क्राउड फंडिंग जैसे नाम तो उन्होंने शायद सुने नहीं हैं, उनके जरिये आज भारत में सड़कें भी बन चुकी हैं. जी हाँ, उत्तर-पूर्व भारत में पीपल्स रोड, सोशल मीडिया के जरिये जुटाए फण्ड से बना है. इस से स्कूलों के लिए, अनाथालयों और फिल्मों के लिए भी फंडिंग हो चुकी है. अन्ना हजारे का, निर्भया मामले का, और भी कई आंदोलनों का आयोजन सोशल मीडिया के जरिये ही हुआ है. दंगे की स्थिति में आज भारत के किसी शहर में फ़ोन और आवागमन पर कर्फ्यू के साथ ही इन्टरनेट भी बंद किया जाता है.

201 मिलियन सिर्फ फेसबुक इस्तेमाल करने वालों के होने पर भी जब कई लोगों को लगता है कि सोशल मीडिया किसी काम का नहीं, केवल मनोरंजन है तो दो बातें बिलकुल पक्की हो जाती हैं. एक तो उन्हें किसी ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिखाया नहीं, इसलिए वो इसे चलाना नहीं जानते. दूसरे कि उन्होंने भगवद्गीता भी ठीक से नहीं पढ़ी. परिवर्तन प्रकृति का अनिवार्य नियम है, वो ये भी भूल गए हैं.

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