ये कारवाँ रुका क्यों है? बढ़े चलो, कि अभी काफ़ि‍ला-ए-इंक़लाब को आगे, बहुत आगे जाना है

शहादत थी हमारी इसलिए
कि आज़ादी का बढ़ता हुआ सफ़ीना
रुके न एक पल को
मगर ये क्या, ये अँधेरा?
ये कारवाँ रुका क्यों है?
बढ़े चलो,
कि अभी काफ़ि‍ला-ए-इंक़लाब को
आगे, बहुत आगे जाना है…

क्रान्तिकारी शिव वर्मा की पुस्तक ‘संस्मृतियाँ’ का एक अंश — चंद्रशेखर आजाद.

आज़ाद का जन्म 23 जुलाई, सन 1906 तदनुसार सावन सुदी दूज दिन सोमवार को मध्य प्रदेश में अलीराजपुर रियासत के भावरा ग्राम में हुआ था. उनके पिता का नाम पं. सीताराम तिवारी और माता का नाम श्रीमती जगरानी देवी था.

भावरा ग्राम पहले अलीराजपुर रियासत में था. देश की आज़ादी और रियासतों के विलयन के बाद वह मध्य भारत का अंश बना. फिर मध्य भारत और मध्य प्रदेश के विलयन के बाद वह मध्य प्रदेश में आ गया. इस समय वह झाबुआ जिले में है.

आज़ाद के पितामह उत्तर प्रदेश में जिला कानपुर में रहने वाले थे. पिता पं. सीताराम तिवारी का बचपन तथा यौवन के कुछ वर्ष उन्नाव जिले के बदरका गाँव में बीते. पं. सीताराम के पाँच पुत्र थे. प्रथम पुत्र सुखदेव का जन्म बदरका में हुआ था. बाक़ी चार का जन्म भावरा में हुआ. आज़ाद सबमें छोटे थे.

बचपन से ही पढ़ने-लिखने के बजाय तीर-कमान या बन्दूक़ चलाने में आज़ाद की रुचि अधिक थी. वे प्रायः स्कूल का बहाना लेकर घर से निकल जाते और रास्ते में अपने दोस्तों के साथ थानेदार-डाकू का खेल खेलते रहते या फिर तीर-कमान चलाने का अभ्यास करते और जानवरों का शिकार करते. आज़ाद की इन सब बातों से परेशान होकर उनके माता-पिता ने उन्हें काम से नौकरी में लगा देने की सोची. तहसील में नौकरी मिल भी गयी. लेकिन आज़ाद भला उस सबमें कब बँधने वाले थे. अवसर मिलते ही एक मोती बेचने वाले के साथ वे बम्बई चले गये. वहाँ उन्हें कुछ मज़दूरों की सहायता से जहाज़ों को रंगने वाले रंगसाज़ों की मदद करने का काम मिल गया और उन्हीं की सहायता से उनके साथ के लोगों की कोठरी में लेटने-भर की जगह भी मिल गयी. अपने बम्बई जीवन की चर्चा करते हुए उन्होंने वैशम्पायन से बतलाया कि शाम को वे मज़दूर उन्हें अपने साथ अपनी कोठरी पर ले गये. खाने को पूछा तो कह दिया खा चुका हूँ. दूसरा दिन मूँगफली-भेल आदि खाकर और पानी पीकर पार कर दिया. एक सप्ताह तक यही क्रम चलाने के बाद उन्होंने होटल की शरण ली.

बम्बई में आज़ाद के लिए सबसे कठिन समस्या थी रात बिताने की. मज़दूरों की उस छोटी कोठरी में जितने लोग एक साथ सोते थे उनकी श्वासों से वहाँ की हवा दूषित हो जाती थी, उस पर कोई-कोई लोग खँखार कर किसी कोने में थूक भी देते थे. सारी कोठरी में बीड़ी का धुआँ भरा रहता था. उसमें कोई खिड़की भी नहीं थी इसलिए बाहर की स्वच्छ हवा आदि का भी कोई रास्ता नहीं था. आज़ाद ऐसे घुटन भरे वातावरण में सोने के आदी नहीं थे. इसलिए काम से छूटने पर खा-पीकर वे सिनेमा में जा बैठते और कोठरी तभी जाते जब नींद रोकना असम्भव हो जाता.

आज़ाद के बम्बई के जीवन के बारे में वैशम्पायन ने लिखा है, “बम्बई में आज़ाद सप्ताह में एक बार स्नान करते थे. क्योंकि सवेरे पाँच बजे उठकर नहाने की सुविधा नहीं थी, पास में कपड़े भी इतने नहीं थे कि नित्य उन्हें धोकर सुखाते और बदलते, इसलिए वे रविवार को ही नहाते थे. उस दिन छुट्टी होती थी इसलिए देर तक सोते रहते. बाद में प्रातविधि से निवृत्त हो नाश्ता करते और उसके बाद घूमते हुए चोर बाज़ार जाते. वहाँ से एक हाफपैण्ट और कमीज़ खरीदकर साबुन-तेल लेते. फिर किसी जनपथ के नल पर बैठकर नहाते, पुराने कपड़े उतार फेंकते और उस दिन खरीदे कपड़े पहिन लेते. ये खरीदे कपड़े भी पुराने ही होते थे परन्तु धोबी के धुले होने के कारण सप्ताह भर चल जाते. फिर सिर में तेल डाल, पुराने कपड़े आदि आस-पास फेंक देते और किसी होटल में भोजन करने चल देते. इसके बाद सड़कों के चक्कर, चिड़ियाघर की सैर या किसी पार्क में पेड़ की छाँह में विश्राम. उसके बाद चौपाटी पर बैठकर समय बिताना और शाम होते ही फिर सिनेमा भवन में घुस जाना.

“धीरे-धीरे उन्हें बम्बई के उस यन्त्रवत जीवन से घृणा हो गयी. वे यह अनुभव करने लगे कि यदि उन्हें पेट भरने के लिए नौकरी या मज़दूरी ही करनी थी तो वह अलीराजपुर में मिल ही गयी थी. उसके लिए घर छोड़कर इतने कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता थी. तब एक रविवार को जब वे नहा-धोकर होटल में भोजन करने गये तो भोजन करते-करते उन्होंने बम्बई छोड़ने का निश्चय कर लिया. परन्तु घर वापस जाना नहीं था इसीलिए संस्कृत पढ़ने बनारस जाने का विचार किया.…

“होटल से भोजन करने के पश्चात उन्होंने सीधे रेलवे स्टेशन की राह पकड़ी. सामान तो घर से कुछ लेना नहीं था, जो कुछ था वह पास ही था. एक सप्ताह की कमाई भी जेब में थी. स्टेशन पर जानकारी प्राप्त कर बनारस की गाड़ी में बिना टिकट जा बैठे. बम्बई से जाते समय वे एक चीज़ अवश्य ले गये. और वह था मज़दूरों के जीवन का उनका अपना खुद का अनुभव. उनकी स्थिति से भी वे अच्छी तरह परिचित हो गये थे. क्रान्तिकारी जीवन में जब मज़दूरों की परिस्थिति के विषय में चर्चा चलती तो वे उस पर अधिकारपूर्वक बोलते थे. उसी प्रकार भावरा में वे आदिवासियों तथा किसानों के जीवन को भी निकट से देख चुके थे. इसीलिए किसान तथा मज़दूरों के राज की जब वे चर्चा करते तो उसमें उनकी सहानुभूति की झलक स्पष्ट दिखायी देती थी.”

बनारस में उन्नाव निवासी श्री शिवविनायक मिश्र से उनकी मुलाक़ात हुई और मिश्रजी की सहायता से उन्हें एक संस्कृत पाठशाला में प्रवेश भी मिल गया. इसके कुछ दिन बाद ही 1921 का असहयोग आन्दोलन आरम्भ हो गया और उसी में संस्कृत कॉलेज बनारस पर धरना देते हुए वे गिरफ्तार कर लिये गये. अदालत में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने बतलाया– “आज़ाद”. तभी से वे आज़ाद के नाम से पुकारे जो लगे.

इस केस में आज़ाद को 15 बेंतों की सज़ा हुई थी. बेंत लगाने के बाद उन्हें जेल से बाहर कर दिया गया. खून से लथपथ वे किसी तरह पैदल घिसटकर अपने स्थान पर पहुँचे. वहाँ सराय गोवर्धन में गौरीशंकर शास्त्री ने घाव ठीक होने तक उनकी ख़ूब सेवा की.

स्वस्थ हो जाने के बाद आज़ाद काशी विद्यापीठ में भर्ती हो गये. यह 1922 की बात है. यहीं पर उनका श्री मन्मथनाथ गुप्त तथा श्री प्रणवेश चटर्जी से परिचय हुआ. यह दोनों साथी पहले ही क्रान्तिकारी दल की सदस्यता प्राप्त कर चुके थे. प्रणवेश की निगाह आज़ाद पर पड़ी और उन्होंने धीरे-धीरे आज़ाद को भी दल का सदस्य बना लिया. और तब से जीवन के अन्त तक अडिग भाव के साथ वे सशस्त्र क्रान्ति के मार्ग पर लगातार आगे बढ़ते रहे.

आज़ाद एक साहसी और जोशीले नौजवान थे. उनके इन्हीं गुणों के कारण पार्टी द्वारा जहाँ कहीं भी ऐक्शन आयोजित होता तो उसमें आज़ाद को अवश्य भेजा जाता था.

…यह सही है कि हम लोग सशस्त्र क्रान्ति के रास्ते पर थे. लेकिन उस क्रान्ति का मुख्य उद्देश्य था मानव मात्र के लिए सुख और शान्ति का वातावरण तैयार करना. ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ हमारा उद्देश्य था और इस नाते मनुष्य मात्र के प्राणों से हमें गहरा मोह था. हम व्यवस्था के विरोधी थे, व्यक्तियों के नहीं. व्यक्तियों से हमारा टकराव उसी हद तक था जिस हद तक वे असमानता पर आधारित उस समय की सामाजिक अथवा राजनीतिक व्यवस्था के प्रतिनिधि बन कर आते थे. व्यक्तिगत खून-ख़राबा हमारा उद्देश्य नहीं था. फिर आज़ाद तो उन लोगों में थे जिन्हें मांस देखकर बेचारे बेगुनाह मासूम बकरे की शक्ल याद आने लगती थी.

और सच बात तो यह है कि जिसकी आँखों में सबके लिए आँसू नहीं और जिसके हृदय में सबके लिए प्यार नहीं वह शोषक और अत्याचारी से घृणा भी नहीं कर सकता – अन्त तक उससे जूझ भी नहीं सकता. हिंसा और अहिंसा एक ही चित्र के दो पहलू हैं जो समय और परिस्थिति के अनुसार अपना रूप बदलते रहते हैं. जो काम एक समय हिंसा जान पड़ता है वही बदली हुई परिस्थिति में अहिंसा बन जाता है. और जिस पर एक समय हम अहिंसा कहकर नाज करते हैं वही दूसरी हालात में हिंसा बन जाता है. आज़ाद में इस दोनों रूपों का ग़ज़ब का समन्वय था. और मैं समझता हूँ यहाँ पर वे हम सबसे बड़े थे.

आज़ाद संगीत प्रेमी थे. भगवानदास और विजय से वे प्रायः ही गाना सुनाने का अनुरोध करते रहते थे. एक बार रात के समय लगभग दस बजे एक साथी से मिलकर वे मेरे साथ अपने निवास स्थान पर वापस जा रहे थे. उस समय हम लोग कानपुर के तत्कालीन प्रमुख कांग्रेसी कार्यकर्ता श्री रामसिंह (अब स्वर्गीय) के यहाँ ठहरे थे. पुलिस के अवांछनीय लोगों की निगाह से बचने के ख़्याल से हम लोगों ने सड़क छोड़कर मूलगंज की एक गली का रास्ता पकड़ लिया. अभी हम कुछ ही क़दम आगे बढ़े होंगे कि ऊपर कोठे से किसी बाईजी ने ठुमरी की तान भरी. कमरे की खुली खिड़कियों से जाड़ों की रात के सन्नाटे को चीरकर गाने वाली का सुरीला स्वर हवा में तैरने लगा. पन्द्रह-बीस क़दम आगे निकल जाने पर आज़ाद ने मेरा हाथ दबाया, “यार, बहुत अच्छा गा रही है, दो मिनट सुन लो.” सचमुच सन्नाटे के उस वातावरण में गाने ने एक समां पैदा कर दिया था. गायिका अपने तन के भूखे किसी शुष्क सौदेबाज के सामने अपने जीवन की सारी वेदना उड़ेले जा रही थी और नीचे दो अजनबी उसकी कला का सौरभ बटोर रहे थे. थोड़ी देर में हमें अपनी स्थिति का ज्ञान हुआ तो इच्छा न रहते हुए भी हम वहाँ से चल दिये. गाने का स्वर दूर तक हमारा पीछा करता रहा.

संगीत एक जादू है, इस सत्य को देखकर भी उस दिन पहचान नहीं पाया था. आज सोचता हूँ जो कला आज़ाद जैसे सतत चौकसी और सतर्कता बरतने वाले व्यक्ति को भी थोड़ी देर के लिए अपनी स्थिति से गाफि़ल कर सकती है, शहर की बदनाम गली में बाँधकर खड़ा रख सकती है वह निश्चय ही सशक्त है, महान है.

लिखने-पढ़ने के मामले में आज़ाद की सीमाएँ थीं. उनके पास कॉलेज या स्कूल का अंग्रेज़ी सर्टिफिकेट नहीं था और उनकी शिक्षा हिन्दी तथा मामूली संस्कृत तक ही सीमित थी. लेकिन ज्ञान और बुद्धि का ठेका अंग्रेज़ी जानने वालों को ही मिला हो ऐसी बात तो नहीं है. यह सही है कि उस समय तक समाजवाद आदि पर भारत में बहुत थोड़ी पुस्तकें थीं और वे भी केवल अंग्रेज़ी में ही. आज़ाद स्वयं पढ़कर उन पुस्तकों का लाभ नहीं उठा सकते थे लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आज़ाद उस ज्ञान की जानकारी के प्रति उदासीन थे. सच तो यह है कि केन्द्र पर हम लोगों से पढ़ने-लिखने के लिए जितना आग्रह आज़ाद करते थे उतना और कोई नहीं करता था. वे प्रायः ही किसी न किसी को पकड़कर उससे सिद्धान्त सम्बन्धी अंग्रेज़ी की पुस्तकें पढ़वाते और हिन्दी में उसका अर्थ करवाकर समझने की कोशिश करते. कार्ल मार्क्स का ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ दूसरी बारी आदि से अन्त तक मैंने आज़ाद को सुनाते समय ही पढ़ा था.

भगतसिंह और सुखदेव के आ जाने पर सैद्धान्तिक प्रश्नों पर ख़ासतौर पर बहस छिड़ जाती थी. हमारा अन्तिम उद्देश्य क्या है, देश की आज़ादी से हमारा क्या मतलब है, भावी समाज कैसा होगा, श्रेणी रहित समाज का क्या अर्थ है, आधुनिक समाज के वर्ग संघर्ष में क्रान्तिकारियों की क्या भूमिका होनी चाहिए, राजसत्ता क्या है, कांग्रेस किस वर्ग की संस्था है, ईश्वर, धर्म आदि का जन्म कहाँ से हुआ आदि प्रश्नों पर बहस होती और आज़ाद उसमें खुलकर भाग लेते थे.

ईश्वर है या नहीं इस पर आज़ाद किसी निश्चित मत पर पहुँच पाये थे, यह कहना कठिन है. ईश्वर की सत्ता से इनकार करने वाले घोर नास्तिक भगतसिंह की दलीलों का विरोध उन्होंने कभी नहीं किया. अपनी ओर से न उन्होंने कभी ईश्वर की वकालत की और न उसके पीछे ही पड़े.

शोषण का अन्त, मानव मात्र की समानता की बात और श्रेणी-रहित समाज की कल्पना आदि समाजवाद की बातों ने उन्हें मुग्ध-सा कर लिया था. और समाजवाद की जिन बातों को जिस हद तक वे समझ पाये थे उतने को ही आज़ादी के ध्येय के साथ जीवन के सम्बल के रूप में उन्होंने पर्याप्त मान लिया था. वैज्ञानिक समाजवाद की बारीकियों को समझे बग़ैर भी वे अपने-आप को समाजवादी कहने में गौरव अनुभव करने लगे थे. यह बात आज़ाद ही नहीं, उस समय हम सब पर लागू थी. उस समय तक भगतसिंह और सुखदेव को छोड़कर और किसी ने न तो समाजवाद पर अधिक पढ़ा ही था और न मनन ही किया था. भगतसिंह और सुखदेव का ज्ञान भी हमारी तुलना में ही अधिक था. वैसे समाजवादी सिद्धान्त के हर पहलू को पूरे तौर पर वे भी नहीं समझ पाये थे. यह काम तो हमारे पकड़े जाने के बाद लाहौर जेल में सन 1929-30 में सम्पन्न हुआ. भगतसिंह की महानता इसमें थी कि वे अपने समय के दूसरे लोगों के मुक़ाबले राजनीतिक और सैद्धान्तिक सूझबूझ में काफ़ी आगे थे.

आज़ाद का समाजवाद की ओर आकर्षित होने का एक और भी कारण था. आज़ाद का जन्म एक बहुत ही निर्धन परिवार में हुआ था और अभाव की चुभन को व्यक्तिगत जीवन में उन्होंने अनुभव भी किया था. बचपन में भावरा तथा उसके इर्द-गिर्द के आदिवासियों और किसानों के जीवन को भी वे काफ़ी नज़दीक से देख चुके थे. बनारस जाने से पहले कुछ दिन बम्बई में उन्हें मज़दूरों के बीच रहने का अवसर मिला था. इसीलिए, जैसा कि वैशम्पायन ने लिखा है, किसानों तथा मज़दूरों के राज्य की जब वे चर्चा करते तो उसमें उनकी अनुभूति की झलक स्पष्ट दिखायी देती थी.

आज़ाद ने 1922 में क्रान्तिकारी दल में प्रवेश किया था. उसके बाद से काकोरी के सम्बन्ध में फरार होने तक उन पर दल के नेता पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल का काफ़ी प्रभाव था. बिस्मिल आर्यसमाजी थे. और आज़ाद पर भी उस समय आर्य समाज की काफ़ी छाप थी. लेकिन बाद में जब दल ने समाजवाद को लक्ष्य के रूप में अपनाया और आज़ाद ने उसमें मज़दूरों-किसानों के उज्ज्वल भविष्य की रूपरेखा पहचानी तो उन्हें नयी विचारधारा को अपनाने में देरी न लगी.

आज़ाद हमारे सेनापति ही नहीं थे. वे हमारे परिवार के अग्रज भी थे जिन्हें हर साथी की छोटी से छोटी आवश्यकता का ध्यान रहता था. मोहन (बी. के. दत्त) की दवाई नहीं आयी, हरीश (जयदेव) को कमीज़ की आवश्यकता है, रघुनाथ (राजगुरु) के पास जूता नहीं रहा, बच्चू (विजय) का स्वाथ्य ठीक नहीं है आदि उनकी रोज की चिन्ताएँ थीं.

दिल्ली में जब निश्चित रूप से यह फ़ैसला हो गया कि भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ही असेम्बली में बम फेंकने जायेंगे तो मुझे और जयदेव को छोड़कर बाक़ी सब साथियों को आदेश दिया गया कि वे दिल्ली से बाहर चले जायें. आज़ाद को झाँसी जाना था. जब वे चलने लगे तो मैं स्टेशन तक उनके साथ हो लिया. रास्ते में बोले, “प्रभात, अब कुछ ही दिनों में यह दोनों (उनका मतलब भगतसिंह और दत्त से था) देश की सम्पत्ति हो जायेंगे. तब हमारे पास इनकी याद भर रह जायेगी. तब तक के लिए मेहमान समझकर इनकी आराम-तक़लीफ़ का ध्यान रखना.” उस दिन रास्ते भर वे भगतसिंह और दत्त की ही बातें करते रहे. वे भगतसिंह को इस काम के लिए भेजने के पक्ष में नहीं थे. सुखदेव और भगतसिंह की जिद के सामने सिर झुका कर ही उन्होंने वह फैसला स्वीकार किया था, लेकिन अन्दर से भगतसिंह को खोने के विचार से वे दुखी थे.

आज़ाद के बारे में अधिकांश लोगों ने या तो कल्पना के सहारे लिखा है या फिर दूसरों से सुनी-सुनायी बातों को एक जगह बटोरकर रख दिया है. कुछ लोगों ने उन्हें जासूसी उपन्यास का नायक बना उनके चारों ओर तिलिस्म खड़ा करने की कोशिश की है. दूसरी ओर कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने अपने को ऊँचा दिखाने के ख़्याल से उन्हें निरा जाहिल साबित करने की कोशिश की है. फलस्वरूप उनके बारे में तरह-तरह की ऊलजुलूल धारणाएँ बन गयी हैं – उसमें मानव सुलभ कोमल भावनाओं का एकदम अभाव था, वे केवल अनुशासन का डण्डा चलाना जानते थे, वे क्रोधी एवं हठी थे, किसी को गोली से उड़ा देना उनके बायें हाथ का खेल था, उनके निकट न दूसरों के प्राणों का मूल्य था न अपने प्राणों का कोई मोह, उनमें राजनीतिक सूझ-बूझ नहीं के बराबर थी, उनका रुझान फासिस्टी था, पढ़ने-लिखे में उनकी पैदाइशी दुश्मनी थी आदि. कहना न होगा कि आज़ाद इनमें से कुछ भी न थे. और जाने-अनजाने उनके प्रति इस प्रकार की धारणाओं को प्रोत्साहन देकर लोगों ने उनके व्यक्तित्व के प्रति अन्याय ही किया है.

जिन लोगों ने उन्हें फासिस्ट कहा है उन्होंने उनकी चन्द ऊपरी खूबियों को ही देखा है. असली आज़ाद तथा उनके अन्दर हमेशा जगने वाले आदर्श को या तो उन्होंने समझा ही नहीं अथवा समझकर भी न समझने का प्रयत्न किया है. अहिंसा में अविश्वास, मध्य श्रेणी का आतंक, सेना की प्रधानता आदि फासिज़्म की ऊपरी बातें हैं. आज़ाद को भी अहिंसा में विश्वास न था, मध्य श्रेणी में उनका जन्म हुआ था और वह बचपन से ही फ़ौजी तबीयत के थे. लेकिन क्या इतने से ही उन्हें फासिस्ट का खि़ताब दिया जा सकता है? मेरी समझ में ऐसा करना आज़ाद और फासिज़्म दोनों के प्रति नासमझी का सबूत देना होगा. फासिज़्म का उद्देश्य है क्रान्ति के आगे बढ़ते हुए पहिये को पीछे की ओर खींचना, साम्राज्यवाद की शक्ति को मज़बूत करना तथा जन समुदाय को धोखा देकर पूँजीवाद को मरने से बचाना. आज़ाद अथवा उनकी संस्था के बारे में इनमें से एक बात भी नहीं कही जा सकती. वे तो साम्राज्यवाद के कट्टर शत्रु थे और पूँजीवादी समाज व्यवस्था को समाप्त कर समाजवाद की स्थापना उनके जीवन का उद्देश्य था.

आज़ाद के व्यक्तिगत जीवन के बारे में कुछ लोगों की धारणा है कि वे बड़े कठोर, अक्खड़ और हठी थे. यह बात भी ग़लत है. दल के अन्दर केन्द्रीय समिति के फ़ैसलों पर अपना फ़ैसला लादने की उन्होंने एक बार भी कोशिश नहीं की. हाँ, सेनापति के नाते काम के समय वे बड़ी सख़्ती से पेश आते थे और शायद इसी को बढ़ा-चढ़ाकर दिखलाने की कोशिश में लोगों ने उन्हें पत्थरदिल समझ लिया होगा. उन्हें अपने साथियों से बेहद प्यार था. उनका जीवन बड़ा ही सादा और उनकी अपनी निजी आवश्यकताएँ बहुत कम थीं. आज़ाद को अपनी माँ के प्रति कितना आदर और उनके लिए कितना मोह था इसका एक सजीव वर्णन श्री राजाराम शास्त्री ने अपनी पुस्तक में इस प्रकार प्रस्तुत किया है.

“काफ़ी देर तक हम लोग घूम चुके, तब एक जगह पता नहीं कोई पार्क था या खेत, हम सुस्ताने के लिए बैठ गये और बातचीत करने लगे. काफ़ी देर तक जब इधर-उधर की बातें हम लोग कर चुके, तब मैंने उनसे पूछा कि ‘कहो भाई आज़ाद, तुम देश में इधर-उधर घूम रहे हो, क्रान्तिकारी पार्टी में काम करते हो, हर समय पुलिस तुम्हारे पीछे पड़ी रहती है और तुम्हें भूमिगत जीवन व्यतीत करना पड़ता है. क्या तुम्हें कभी अपनी पूज्य माता जी की याद नहीं सताती? जब तुम्हें माँ की याद आती होगी, तब क्या करते हो’, बस, मेरा इतना कहना था कि आज़ाद का चेहरा एकदम बदल गया. वह दुखी हो उठे और उनकी आँखें छलछला आयीं, कण्ठ रुँध गया. वह कुछ देर तक चुप रहे, एक शब्द भी न बोल सके. फिर बोले कि भाई यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी कमज़ोरी है. और पुलिस मेरी इस कमज़ोरी को भली-भाँति जानती है. पुलिस जानती है कि जब मुझे माता जी की याद सतायेगी तो मैं उनके पास छिपकर जाने का अवश्य प्रयत्न करूँगा, तब उसे मुझे पकड़ने का अवसर हाथ लग जायेगा. इसलिए मैं माँ के पास जाता ही नहीं. अपनी मातृभूमि के कारण यदि मैं पकड़ा गया तो पार्टी का कितना बड़ा नुकसान हो जायेगा – कह नहीं सकता.”

“उन्होंने फिर कहा कि, ‘जब मुझे बहुत ज्यादा माता जी की याद सताने लगती है, तब मैं इस तरह उनकी पूजा करने लगता हूँ कि हे माँ, तू कभी न समझना कि तेरा बेटा तुझे भूल गया है, पर क्या करूँ माँ, मैं तुझ तक पहुँच नहीं पाता हूँ, क्षमा करना. …इस प्रकार धरती माता को माथा टेक कर अपनी माता जी की वन्दना कर लेता हूँ और आँसू बहाकर अपने दुखी मन को सान्त्वना दे लेता हूँ.’ इतना कहकर वह फिर चुप हो गये. मैं भी प्रभावित हो गया. आज़ाद को दुखी देखकर मैंने बातचीत का विषय बदल दिया.

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