माया का मायाजाल अपने अंतिम पड़ाव पर?

एक भारतीय जनता पार्टी द्वारा राम नाथ कोविंद के राष्ट्रपति प्रत्याशी बनाते ही मायावती के राजनीतिक जीवन में एक बड़े बदलाव की उम्मीद हम जैसे छोटे चीलों ने कर दी थी.

मायावती वो है, जिनपर कांशीराम और जगजीवन राम जैसे लोगों का हाथ था, मायावती वो भी है जो राजा साहब की बेटी बनी तो उम्र के हिसाब से जनता से उन्हें बहन भी बना दिया. सियासी घटनाक्रम में उनकी महत्ता किसी से छिपी हुई नहीं है. एक दौर में मायावती का मतलब दलित वर्ग होता था. वो दलितों की एनी बेसेंट कही जा सकती है.

2014 का लोकसभा चुनाव, उनके सफरनामे का काला अध्याय बनकर उभरा. मोदी लहर में सभी तो गए ही, लेकिन मायावती जिन्हें अपना पैतृक संपत्ति समझती थी वो भी चली गई.

ज्यादा दिन नहीं हुए जब दलित राजनीति के सबसे बड़े गढ़ उत्तर प्रदेश में बसपा सुप्रीमो मायावती को राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा झटका लगा था, फरवरी मार्च में हुए विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी 80 सीटों से सिमटकर मात्र 19 सीटों वाली पार्टी बनकर रह गई थीं.

यह उस झटके से भी बड़ा था जब लोकसभा चुनावों में उन्हें देशभर में एक भी सीट नहीं मिली थी. लेकिन तब मायावती के पास सब्र करने की एक बड़ी वजह ये थी कि कोई सीट न पाने के बावजूद भी उनकी बसपा वोटों के हिसाब से देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई थी. लेकिन विधानसभा चुनावों में लगे झटके ने उन्हें झकझोर कर रख दिया.

उन्‍हें अपने हाथ से पार्टी के सबसे बड़े वोट बैंक दलितों के खिसकने का डर सताने लगा था. जो शायद काफी हद तक उनसे छिटक भी गए थे, जिनके भाजपा के पाले में जाने का दावा किया जा रहा था. इसके अलावा भीम आर्मी जैसे छोटे संगठन भी बसपा के लिए चुनौती बन गए थे जिन्हें काफी कम समय में बहुत ज्यादा लोकप्रियता मिली. खासकर दलित युवाओं ने जिस कदर भीम आर्मी को हाथों हाथ लिया उसने भी मायावती की नींद उड़ाई हुई थी.

भाजपा, जुम्मन चचा के नजर में बनियों की पार्टी है और अगर ऐसा है तो भाजपा ने उसे सिद्ध भी किया है. आज राजनीति में दलित केंद्र में है, कारण है उनकी असाक्षरता. जब तक एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता अशिक्षित रहेगी, आप उसे छद्म लोकतंत्र ही कहेंगे.

भारत अब पूर्ण लोकतंत्र बनने की ओर अग्रसर है, सवर्ण और पिछड़ी जातियों में मानसिक जागरूकता देखा जा सकता है. वो अब नफा नुकसान समझने लगे है और ऐसे में 20 करोड़ की आबादी लिए दलित एक बड़ा पासा है.

पक्ष उन्हें नही बोलने दे रहा है, ये सीधा संकेत कांग्रेस के उस फैसले में है जिसमें भाजपा के दलित प्रत्याशी के विरोध में मायावती दलित ना बनकर मीरा कुमार बन गई. राज्यसभा में यू इस्तीफा देना एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है जिसे मायावती अच्छे से निभा भी रही है. अब आगे आने वाले समय में क्या होगा, ये बस मुग़लते की बातें है. चारा घोटाले के सज़ायाफ्ता लालू यादव और भाजपा ने अपने ख़ेमे में बुलाने के लिए संकेत दे दिए है.

और ये कहना गलत ना होगा कि मायावती वही है जो गेस्ट हाउस कांड से बचकर राजनीति में जिंदा है, तो उम्मीदत: अब मानसून सत्र न्यायाधीश के साथ साथ देश के राजनीति के लिए नया मोड़ लाएगा.

 

– यशवंत सिंह

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