क्यों भटक रहा है भारतवर्ष?

हम जिस देश मे रहते हैं, कभी उस भारत देश के बारे में सोचते हैं, चिंतन करते हैं. कितना प्यारा था ये देश. कितने प्यारे थे इनके दिल. एक समय था कि जब इस भारत की भूमि को ऋषियों-मुनियों साधु-सन्यासियों की भूमि कहा जाता था. वेद, उपनिषद, गीता पुराण सब इसी भूमि से उपजे हैं. समय ऐसा आया कि भारत देश ही नहीं पूरा विश्व ही एक लंबी बीमारी से ग्रसित होता चला गया.

प्रश्न उठता है कि ये बीमारी है क्या? इस बीमारी को हम देख नहीं सकते. ये बहुत ही कुशल तरीके से होती जा रही है. हमारी अनंत इच्छाएं, अहंकार को मजबूत करने के लिए दिखावटीवन, दूसरों के प्रति ईर्ष्या, सिर्फ अपने बारे में सोचना, ये सब हमें दिनप्रतिदिन उर्ध्व की जगह नीचे की तरफ ले जा रही है.

हम इतना बाहरी तल पर जीने लगे हैं कि अपने अन्तःकरण को ही भूल गए हैं. हम अपनी जड़ को ही भूल गए हैं. अब प्रश्न फिर उठेगा कि जड़ क्या है. जड़ जो हम सब देख सकते हैं जिन माता पिता ने हमें जन्म दिया. जिस माँ की कोख में हम रहे. क्या यही है जड़? हाँ सामान्यतः भौतिक तल पर तो बिल्कुल ठीक है लेकिन आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने चले तो हम पाएंगे कि आखिर माता-पिता के भी माता-पिता थे. उनके भी माता-पिता थे. ये सिलसिला लगातार चलता रहेगा. यदि हम गहराई में जाये तो पाएंगे कि कुछ इसके अलावा भी है जिसके नेतृत्व में हम सब, ये पूरी दुनिया काम कर रही है.

सामान्यतः दुनिया वाले उसे भगवान कहते हैं. कोई उसे अल्लाह कहता है. कोई उसे जीसस क्राइस्ट कहता है. कोई उसे गुरु कहता है. कोई उसे आत्मा कहता है. कोई उसे शून्य कहता है. जिसने जो जाना वह कहता है.

हम सबको आध्यात्मिक तल पर सोचना ही पड़ेगा. प्रकृति के रहस्य को समझना ही पड़ेगा. अपने हृदय के अन्तःकरण में झांकना ही होगा. तभी हम उस असलियत को समझ पाएंगे और स्वयं अनुभव कर पायेंगे कि आखिर हमारी जड़ कहाँ है. हम कहाँ से आते हैं कहाँ चले जाते हैं. ये सब अनूठे प्रश्न है, जो हमें ध्यान की उच्च अवस्था में ही प्राप्त हो सकते हैं.

समाज की दिशा और दशा बदलने के लिए इस पृथ्वी माता पर रह रहे सभी मानवजन को एक प्रेम के बंधन में बांधने के लिये सर्वप्रथम भौतिक सम्पदा के साथ साथ आध्यात्मिक सम्पदा की भी आवश्यकता पड़ेगी. आज हमारा समाज आध्यात्मिक विरासत से विलुप्त होता जा रहा है.

इसका सबसे बड़ा कारण है कि हम अपने आपसे विलुप्त होते जा रहे हैं. एक बार पुनः कहेंगे कि हमारी इच्छाएं अनंत है. हमारे लक्ष्य बड़े हैं. लेकिन इन सबको पाने के लिए हमारे अन्तःकरण में कोई शांति नहीं है. हर समय विचारों की होड़ हमारे अन्तःकरण में है. और अपने से ज्यादा दूसरों से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं.

अपनी सकारात्मक ऊर्जा दूसरों में खराब कर रहे हैं. प्रकृति का अद्भुत दृश्य हमेशा हमारे आंखों के सामने रहता है. समय-समय पर प्रकृति हमें अहसास कराती रहती है कि हम मानव अपने पथ से भटक गए हैं. आज समाज दिन प्रतिदिन आगे बढ़ रहा है. हम सभी आगे बढ़ने की होड़ में इतने आगे आ रहे है कि हम सही गलत भूल गए हैं. क्या सही है क्या गलत है इसको भूलते जा रहे हैं.

अपनी जड़ों को भूल रहे हैं. मनुष्य की मनुष्यता समाप्त हो रही है. लोग कहीं न कहीं भटक रहे हैं. अपने रास्ते पर कुछ ही लोग है जो सही से चल रहे हैं. बाकी जिसको जहाँ मौका मिल रहा है, वह अपने लोभ लालच से गलत कामों की तरफ चले जा रहे हैं. ये लोभ लालच मनुष्य के अंदर कहाँ से आ रहा है. शायद हम सब जानते हैं. आज जो भी गलत काम कर रहे हैं और समाज को दिन प्रतिदिन नीचे की तरफ गिरा रहे हैं वह सन्तुलित समाज कभी नहीं हो सकते.

इन सबका कारण जो हमें लगता है कहीं न कहीं लोगों का अध्यात्म से दूर जाना. लोग अपने आपसे दूर होते चले जा रहे हैं. जब हम आध्यात्मिक होते हैं तो अपने आप एक जागरूक मनुष्य की भूमिका निभाने लगते हैं. आज हम में से अधिकतर लोगों के अधिकतर निर्णय मन के द्वारा होते हैं. जो कहीं न कहीं आगे चलकर गलत होते हैं. हृदय से निर्णय लेना आ गया तो स्वयं के लिए तो ठीक है पूरे समाज के लिए भी ठीक होता है. ये तभी सम्भव है जब हम आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सोचने लगते हैं. तभी हम समाज के एक जागरूक नागरिक बन सकते हैं.

जब हम एक जागरूक नागरिक बनते हैं तो समाज में चारो तरफ अच्छे काम होते हैं. सकारत्मक ऊर्जा का ही संचार होता है. एक जागरूक नागरिक कभी अपने आपमें सीमित नहीं हो सकता. उसकी सोच पूरी मानवता के लिये होती है. सभी में अपने भाई बहन देखेगा. सभी के लिये प्रेम भाव आयेगा.

सार ये है कि आध्यात्मिकता एक सकारात्मक दृष्टिकोण देती है. दृष्टिकोण से हमारा चित्त जागरूक होता है. जब चित्त जागरूक होता है तो हम समाज को सकारात्मक नजरिये से देखते हैं. जब हम समाज को सकारात्मक नजरिये से देखने लगते हैं तो जो जरूरी है वही होता है. एक जागरूक आध्यात्मिक नागरिक हर पहलू पर चाहे वह सामाजिक चिंतन, आर्थिक चिंतन, राजनीतिज्ञ चिंतन, आध्यात्मिक चिन्तन कुछ भी हो सभी पर अपनी नजर रखता है.

कर्म की प्रधानता के प्रति निष्ठा से सजग, समर्पित रहते हुए परिवार और राष्ट्र हित में सहभाग करते हुए जीवन लक्ष्य पर अग्रसित रहना चाहिए. जिन क्षेत्रों में जागरूकता की आवश्यकता होती है उनको चिन्हित करते हुए उस पर अमल करते हुए दायित्व निर्वहन करता है. आज हमारे समाज ने विज्ञान को भी बहुत तवज्जो दी है. और मिलनी भी चाहिए. विज्ञान कितने लोगों को कितने ग्रह पर भेज चुका है. विज्ञान बाहरी तल पर ही खोज करता रहता है. विज्ञान ने भी बहुत सारी अनूठी खोजे की है जैसे पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण होता है. अध्यात्म ये कहता है कि कोई खोज करे या न करे जो है वह तो रहेगा ही. लेकिन अध्यात्म स्वयं के अंदर की खोज करता है. हमे लगता है कि अपने आपको जानना ही सबसे बड़ी खोज है. इससे बड़ी खोज शायद ही इस पूरी पृथ्वी पर कोई और होगी.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY