ये नाज़ुक दौर, जहां भारत के ही कुछ लोगों ने लगा रखी है भारत की कीमत

बाकी सब मुद्दे गौण है सिवाय चीन से भारत के संभावित अल्पकालीन युद्ध के. भारत और चीन के बीच जो भी होगा वह हफ्ते-दस दिन का होगा और उसमें कोई न्यूकिलर हथियार नहीं चलेंगे.

मेरे आंकलन के अनुसार यह युद्ध जहां चीन की जरूरत बनता जा रहा है, वहीं यह युद्ध भारत के विपक्ष (कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस, तृणमूल कांग्रेस और वामपंथियों) की भी ‘मोदी विहीन भारत’ की अंतिम आशा है.

आज चीन अपनी पुरानी नीति के अनुसार मनोवैज्ञानिक युद्ध की शुरुआत कर चुका है और वह कांग्रेस और वामपंथियों के नरेटिव को ही अपनी मीडिया से प्रचारित कर रहा है.

आज उसके पाले हुये लोग उसी की ज़बान को अपने अखबारों और टीवी पर बोल रहे है. यह सब इसलिये हो रहा है ताकि मोदी की सरकार, भारतीय जनता की हुंकार सुन कर अपना संयम तोड़ दे और समय से पहले लड़ने की भूल कर बैठे.

सोनिया गांधी परिवार को यह अच्छी तरह मालूम है कि आज के हालात में वह न मोदी को सत्ता में दोबारा आने से रोक सकते हैं और न ही खुद अगले चुनाव में अपनी वापसी कर सकते है.

विश्व की नज़रों में भारत में मुसलमानों और गाय को लेकर हो रहे उपद्रव को, कांग्रेसी-वामी गिरोह द्वारा अराजकता बना कर पेश करने की योजना को फलीभूत होते न देख कर अब उनके पास एक ही चारा बचता है कि भारत का युद्ध हो और मोदी के नेतृत्व में भारत हार जाए.

उनका पहला प्रयास, कश्मीर में पाकिस्तान से था लेकिन उसमें असफल होने के बाद चीन ही उनकी आखिरी आशा है. आज चीन को भारत के हर इस्लामिक जिहादी मुसलमान, पाकिस्तान से शांति समर्थक राजनैतिज्ञों, सेक्युलर हिंदुओं और वामपंथियों का पूरा समर्थन प्राप्त है.

आज भारत भी लड़खड़ाया हुआ है. भारत के विपक्ष और चीन के पास आज से बेहतर कोई समय नहीं है जब वह मोदी जी को और भारत को घुटने पर ला सकते है.

क्या यह होगा? इस पर बात कुछ रुक कर ही करूँगा.

मैं पूरी ईमानदारी से एक बात जरूर कहूंगा कि हम राष्ट्रवादी लोग जितना अपने को मज़बूत समझते या भारतीय सेना की अजेयता को समझते है, हम उतने है नहीं.

सही बात तो यह है कि हम बड़े नाज़ुक दौर में है जहां भारत की कीमत भारत के ही लोगों ने लगा रक्खी है. मुझे इस विषय पर कहना तो बहुत कुछ है लेकिन कहने की इच्छा भी नहीं हो रही है क्योंकि भैंस के आगे बीन बजाने का ही माहौल बना हुआ है.

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