सरकारें बदलने भर से सत्ता के चाल-चरित्र नहीं बदलते

कल महेशपुर प्रखण्ड(झारखण्ड) के एक मध्य विद्यालय में जाने का अवसर मिला. विद्यालय का नाम जान-बूझकर नहीं दे रहा हूँ. कक्षा 1 से कक्षा 8 तक का शिक्षण होता है. कुल छात्र 468 और शिक्षक मात्र 4 जिनमें 2 स्थायी और 2 पैरा शिक्षक. शिक्षा की गुणवत्ता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है.

प्रधानाध्यापक रिपोर्ट बनाने और भेजने में ही व्यस्त रहते हैं. किसी तरह अध्यापन हेतु समय निकालते हैं. मध्याह्न भोजन से उनका कोई लेना-देना नहीं क्योंकि उसकी व्यवस्था गाँव की स्थानीय समिति करती है लेकिन 1 बजे तक मध्याह्न भोजन करनेवाले छात्रों की रिपोर्ट एसएमएस द्वारा राज्य सरकार को प्रतिदिन प्रेषित करने का दायित्व प्रधानाध्यापक का ही है.

भोजन की गुणवत्ता भी उन्हें ही सुनिश्चित करनी है. वहीं ज्ञात हुआ कि एक स्वाद पंजी भी है जिसमें बने भोजन को कोई एक शिक्षक सर्वप्रथम ग्रहणकर गुणवत्ता सम्बन्धी अपनी टिप्पणी उसमें अंकित करेंगे.

ख़ैर, बात शिक्षा की गुणवत्ता की हो रही थी. एक शिक्षक पर अधिकतम 30 छात्र होने चाहिये, यहाँ स्वयं अनुमान लगा लें. 8 कक्षायें हैं तो न्यूनतम 8 शिक्षक तो होने ही चाहिये, अभी कुछ कक्षाओं के 2 सेक्शन की बात छोड़ दीजिये. शिक्षकों के अभाव में गुणवत्ता की कल्पना ही व्यर्थ है.

ख़ैर, 8वीं कक्षा में छात्रों के बीच गया. स्वयं को पढ़ाने से रोक नहीं पाया. बच्चों को पढ़ाना मुझे सदा भाता रहा है.विज्ञान में ‘विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव’ पढ़ाया और उसके बाद जीवविज्ञान में ‘किशोरावस्था की ओर’ पढ़ाया.

पढ़ने की ललक देखिये कि 1 बजे मध्याह्न भोजन का समय हो जाने पर भी बच्चे पढ़ाने की ज़िद कर रहे थे. मैंने उनकी बात मानी और लगभग डेढ़ घंटे तक पढ़ाया. अनिर्वचनीय सुख की प्राप्ति. कुछ छात्र-छात्राओं की मेधा देखकर मैं आश्चर्यचकित था. यदि समुचित अध्यापन हो तो ये सभी बहुत अच्छा कर सकते हैं.

सरकारें बदलने भर से सत्ता के चाल-चरित्र नहीं बदलते. शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में हो रहे क्षरण-स्खलन के लिये उच्चाधिकारी जिम्मेवार हैं जो अपने कर्तव्यों के निर्वहन में असफल सिद्ध होते रहे हैं.

– Dr Ajit Pandey

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