महबूबा में तो रब देख सकते हैं, पर देश में माँ नहीं!

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बंकिम के आनंदमठ में भवानन्द नाम के संन्यासी द्वारा गाया गया वंदे मातरम् वो अमर गीत है जिसने हमारे स्वाधीनता संग्राम की आधारशिला रखी. हमारे कई क्रांतिकारी वंदे-मातरम् गाते हुए फांसी के तख्ते पर झूल गए थे. पर कुछ लोग हमेशा वंदे मातरम् गाने को लेकर विरोध करते रहते हैं. उन्हें वंदे मातरम् गाना हमेशा मज़हब विरुद्ध कृत्य लगा. ऐसे लोग “तुझमें रब दिखता है यारा मैं क्या करूं” जैसे गाने सुनते हुए अपनी महबूबा में तो रब देख सकते है पर अपने देश में माँ नहीं देख सकते.

हर देश की अपनी सभ्यता दृष्टि होती है, अपना सांस्कृतिक दृष्टिकोण होता है, जिस कारण उसके व्यवहार, दृष्टिकोण और प्रतीकों में वो चीज आ ही जाती है. वंदेमातरम् के संदर्भ में भी यही बात है. इस अमर गीत के पदों में मातृभूमि की दुर्गा रूप में स्तुति की गई है.

30 दिसंबर 1939 की एक घटना है. महर्षि अरविंद अपने कुछ शिष्यों के साथ बैठे हुये थे, तभी उनके कुछ शिष्यों ने उनसे वंदेमातरम को लेकर उठने वाले विवाद की चर्चा की और कहा कि मुस्लिमों के विरोध के बाद इसके कुछ पद को निकालने की बात चल रही है क्योंकि इस गाने में हिंदू देवी की बात कही गई है जो मुसलमानों को अप्रिय है. महर्षि अरविंद ने इसपर टिप्पणी करते हुये कहा कि यह कोई धार्मिक गान नहीं है, अपितु राष्ट्रीय गान है अतः राष्ट्रीयता के भारतीय स्वरुप में स्वभावतः इसमें हिंदू दृष्टि ही रहेगी.

महर्षि अरविंद के ये शब्द भारत और हिन्दू का संबंध स्थापित कर देती है. इसी बात को उनके बाद दूसरे शब्दों में स्वातंत्र्यवीर सावरकर और पूज्य गुरूजी गोलवलकर ने भी कहा था.

स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने कहा था कि भारत हिन्दू राष्ट्र इसलिये नहीं है क्योंकि यहाँ हिन्दू बहुसंख्यक हैं बल्कि ये हिन्दू राष्ट्र इसलिये है क्योंकि इस भारत की चिंता करने वाला सिर्फ हिन्दू है.

गुरूजी ने इसी बात को थोड़ा विस्तार देते हुए कहा कि भारत हिन्दू राष्ट्र इसलिये नहीं है क्योंकि मैं ऐसा कहता हूँ, ये हिन्दू राष्ट्र इसलिये है क्योंकि ये शास्त्रसिद्ध, इतिहाससिद्ध, अनुभवसिद्ध और व्यवहारसिद्ध, चारों है.

खैर, ऊपर महर्षि अरविंद ने जो बात कही थी उसकी सार्थकता दूसरे परिप्रेक्ष्यों में देखने से भी साबित है. ये केवल वंदेमातरम् के साथ नहीं है. दुनिया के प्रायः हर इस्लामी मुल्क के राष्ट्रगीत में वहां की संस्कृति और दृष्टि स्पष्ट परिलक्षित होती है.

माँ शब्द में अधिकतम श्रद्धा का भाव होता है, हमने अपने मुल्क को माँ कहकर इसके प्रति अपनी श्रद्धा निवेदित की तो पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश के राष्ट्रगान की शुरुआत इस तरह से हुई है, “आमार सोना बांग्लादेश, आमी तोमार भालो बासी” अर्थात ‘मेरे प्यारे बांग्लादेश, मैं तुझसे प्यार करता हूँ. इस गीत में चार बार देश के लिये माँ शब्द का प्रयोग हुआ है. बांग्लाभूमि का इस गीत में मानवीय निरुपण हुआ है.

बांग्लादेश मुस्लिम बहुल मुल्क है मगर आज तक किसी ने भी इस बात पर आपत्ति नहीं उठाई कि मुल्क के लिये माँ शब्द क्यों इस्तेमाल हो रहा है या हमारे राष्ट्रगान में मुल्क का मानवीय निरुपण क्यों हुआ है.

अगर यही बात है फिर तो वंदेमातरम् न गाने वाले भारतीय मुसलमानों को बांग्लादेशियों पर भी कुफ्र का फतवा लगाना चाहिये, अरब, ओमान, कुवैत, जोर्डन आदि मुल्कों के मुसलमानों को भी काफिर धोषित कर देना चाहिये. फिर तो इन्हें मिस्र पर भी कुफ्र का फतवा लगाना चाहिये क्योंकि उन्होंनें भी अपने राष्ट्रगान में मिस्र को माँ कहकर पुकारा है.

हर मुल्क अपनी सभ्यता, संस्कृति, अतीत, गौरवशाली विरासत और अपने मुल्क को ईश्वर द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक देनों का उल्लेख अपने राष्ट्रगान में करता है. आप कभी अरब का राष्ट्रगान और उसके ध्वज को देखिये, वहां इस्लाम कम अरब राष्ट्रवाद अधिक परिलक्षित होता है.

एक सच्चा देशभक्त अपने देश की नदियाँ, पर्वत, भाषा-बोली सबसे मोहब्बत करता है और वंदे मातरम् इन तमाम भावों को खुद में समेटे हुये है. इस गाने से परहेज़ मुल्क में आपसी वैमनस्यता को बढ़ावा देगा, इसे न गाने के तर्क में शिर्क और तौहीद की बातें बताना बेमानी हैं.

वंदे मातरम् गाइए और खुद को इस महान देश की संतति में शुमार करिये, वर्ना सिर्फ “किसी के बाप का हिन्दोस्तां थोड़े है” जैसे धमकाने वाले शे’र आपको इस देश की संतति कहलाने का हक़ नहीं देते.

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