प्रहार जब हिंदुत्व पर हो तो कहाँ बंध जाते हैं क़ानून के लम्बे हाथ?

नरेश अग्रवाल के बयान पर कुछ न कर पाने की कुंठा और सनातन धर्म में ऐसे ऐसे बुद्धिजीवियों के होने से व्यथित हैं. एक चर्च के शीशे टूट जाते हैं तो पूरा इसाई जगत चिल्ला चिल्ला कर देश को सिर पर उठा लेता है. इसाई समुदाय को प्रधान सेवक आश्वस्त करते हैं कि उनके धर्म और धार्मिक आस्थाओं की रक्षा की जायेगी.

अक्टूबर 2015 में पंजाब को धार्मिक पुस्तक के अपमान के चलते कई दिनों के लिए बंधक बना दिया जाता है.

पैगम्बर के ऊपर एक टिप्पणी से उत्तर प्रदेश में कमलेश तिवारी को छह महीने जमानत नहीं मिलती.

ऐसा तो है नहीं कि भगवान राम के विषय में समाजवादी पार्टी के विचार पहले से मालूम नहीं थे. और ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ मुसलमानों के वोटों से इस पार्टी को हालिया विधानसभा चुनाव में में 47 सीटें मिल गई.

आज आप अकेले नरेश अग्रवाल को कटघरे में खड़ा नहीं कर सकते. उससे पहले बहुत से मिश्राओं, सिंहों, गुप्ताओं और यादवों को भी कटघरे में खड़ा करना होगा जो जरा से स्वार्थ में धर्म की धज्जियां उड़ाने वालों को वोट डाल कर आते हैं.

बाकी नरेश अग्रवाल को कोई थप्पड़ क्यों नहीं मारता, जूता क्यों नहीं मारता जान से क्यों नहीं मारता सब बेमानी बातें हैं, क्योंकि इन गुण्डों को सरकार ने तो जो सुरक्षा दी है वो अलग इनके पालतू गुण्डे इतने हैं कि आप अकेले इनकी परछाईं तक नहीं छू सकते.

और गलती से दूर से जूता फेंक भी दिया तो पूरी दुनिया चिल्लायेगी कि हिन्दू असहिष्णु हो गया है या आपको नसीहत दी जायेगी कि कानून अपने हाथ में क्यों लिया, कानून अपना काम कर रहा है. ये उस कानून के बारे में कहा जाता है जिसे 100 में से 90 बार हमने काम करते नहीं देखा खासतौर पर तब जब बात हिन्दुओं की आस्था की हो.

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