हे हिन्दुओं! अब फुटबाल बनना बंद कीजिये समय बहुत कम है

श्रीराम ने जैसे ही प्रत्यंचा को खींचा और एक भीषण तड़ितसम शब्द के साथ शिव धनुष ठीक मध्य से टूट गया. उस भीषण ध्वनि को सुनकर महेंद्रगिरि पर्वत पर तपस्यारत परशुराम जी सीधे ध्वनि की दिशा में मिथिला नरेश जनक के दरबार मे आ पहुंचे.

टूटे हुए धनुष को देख क्रोध से भरे परशुराम जी कहने लगे कि कौन है जिसने यह दुस्साहस किया है सामने आए अन्यथा सभी का वध कर दूंगा.

लक्ष्मण – परशुराम संवाद होता है, अतिउग्र हुए भृगुवंशी परशुराम जी के करारोहित फरसे के वार को तैयार हाथों को मर्यादा पुरुषोत्तम, राजीवलोचन, मृदुभाषी रघुकुलभूषण भगवान श्रीराम अपनी शीतलक वाणी से स्थिर कर देते हैं और आगे क्रोधित, अथाह शक्ति सम्पन्न ब्राह्मण को कैसे अपने वश में किया जाता है, प्रसन्नतापूर्वक् उस युक्ति का सदुपयोग करते हुए उन्हें अपने परमविग्रह का सांकेतिक दर्शन करवा देते हैं.

उनके श्री धनुष को छूते ही स्वतः प्रक्षेपित होता देख प्रभु को पहचान अपने क्रोधपूर्ण दुर्व्यवहार से व्यथित परशुराम जी अपने से वय में छोटे क्षत्रिय कुमारों से क्षमा मांगते हुए, उनकी स्तुति करते हुए प्रायश्चित हेतु वनगमन कर जाते है.

कथा सबने सुनी है, गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस प्रसंग को अत्यंत प्रभावी विधि से प्रस्तुत किया है.

विचार कीजिये कि आखिर यह अनुपम संवाद इतना महत्वपूर्ण क्यों है और क्या संदेश आप इस घटना से ग्रहण करते हैं?

संवाद के मध्य लक्षमण जी कहते हैं कि हमने बचपन में ऐसे कई धनुष खेल खेल में तोड़ दिए आखिर इस एक पुराने से धनुष से आपको इतनी प्रीति क्यों है?

क्रोधित परशुराम जी कहते हैं कि यह मेरे आराध्य महादेव शंकर का दिव्य धनुष है, बालक ! तू इसकी अन्य सामान्य धनुषों से कैसे तुलना कर सकता है?

क्या अब आप कुछ समझे?

यह प्रतीकों की लड़ाई है, आपके धर्म के अस्तित्व की लड़ाई है, आपके धर्म को भी कुछ भौतिक स्तंभों की आवश्यकता पड़ती ही है और यह अपरिहार्य सत्य है.

अपने आराध्य महादेव का धनुष तोड़ने वाले को दंडित करने सीधे जनक के दरबार में प्रविष्ट महर्षि स्वयं साक्षात परब्रह्म से भी भिड़ने को प्रस्तुत हो जाते हैं.

मैं आज धन्य मानता हूं स्वयं को कि मुझे उन परमवीर परशुराम का वंशज कहा जाता है, जिन्होंने अपने धर्म के प्रतीकों के सम्मानार्थ, अपने आराध्य के सम्मानार्थ साक्षात वीरोत्तम भगवान श्रीराम एवं शेषावतार को चुनौती देने का सामर्थ्य रखा.

कल एक गाजरघास के बीज ने 100 करोड़ हिन्दुओ के मान्य आराध्य, परमात्मा श्रीराम, आदर्श शक्तिस्वरूपा जानकी एवं जन जन के इष्ट हनुमान जी के विषय मे अनुचित शब्दों का प्रयोग किया और आज फिर से संसद में गर्व से खड़ा होकर अपने विशेषाधिकार का उपयोग करके हिन्दुओं को मुँह चिढ़ा रहा है.

निराशा है कि अब ना तो परशुराम के कोटिअंश के समान ही कोई तेजस्वी ब्राह्मण है और ना ही राम, लक्ष्मण, कृष्ण, अर्जुन, भीष्म जैसे क्षत्रिय, ना ही गली गली में हनुमान जी के अथाह उपासक जो इस अपमान का प्रतिशोध लेने को व्याकुल हो.

चारों पूज्यनीय शंकराचार्य अपनी अपनी धार्मिक प्रयोगशाला में करोड़ों हिन्दुओं को सीधे मोक्ष प्रदान करने के महामंत्र की खोज के भागीरथी प्रयासों में लगे हुए है.

कभी कभार कुम्भ के समय अपने अपने प्रोटोकॉल के लिए अपेक्षित आदर्श भवन के नाम पर भृकुटि तानते हुए अवश्य दिखाई पड़ जाते हैं, लेकिन आज सनातन पर आए इस संकट की घड़ी में किसी भी हिन्दू द्वारा उनकी तरफ आशा की दृष्टि से ना देखना अपने आप मे सब कुछ स्पष्ट कर देता है.

निश्चित ही इस समय सनातन धर्म प्रभावी नेतृत्व की भीषण कमी से जूझ रहा है, ऐसे में शंकराचार्यों को अब यह दारोमदार अपने समर्थ कन्धों पर उठाना चाहिए. सनातन धर्म के मताबलम्बियों को यथाशीघ्र ऐसे ही किसी स्थायी नेतृत्व का चयन एवं शरणस्थ होना चाहिए.

राजनीतिक दलों और संगठनों के भरोसे उनकी स्थितियां अब सुधरने वाली नहीं है, वे लोकतंत्र के विकारों एवं सत्ता के अधीन है. याद रखिये आप की हालत उस फुटबॉल की तरह है जिसे आपका पक्ष भी लतियाता है और विपक्षी पक्ष भी, अंतर मात्र इतना है कि अपने पक्ष की लात खाकर “गोलपोस्ट” में पहुंचकर आप बस पीड़ा के अनुभव की तीव्रता को कम करने का प्रयास करते हैं और आपके शत्रु उस ट्राफी की तरह है जिसे जो भी जीतता है उठा कर चूम लेता है, और आप बस खेल भावना को ही रोते रह जाते हो.

इसलिए हे हिन्दुओं ! अब फुटबाल बनना बंद कीजिये समय बहुत कम है.

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