सही कहते हैं वामिये यार, देखा है ऐसा कोई सिंह इन पचास वर्षों में एक भी?

मुझे कोई आपत्ति नहीं दिखती नरेश अग्रवाल की कही गई बात में!

जी बिल्कुल! आप ठीक पढ़ रहे हैं, उन्होंने जो कहा है उसमें कोई आपत्तिजनक बात नहीं है.

कारण ??

पहला भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है जहाँ “हिन्दुओं” के विरुद्ध कुछ भी बोलने की पूरी आजादी है जिसकी रक्षा के लिये सदैव भारतीय सेना, अर्धसैनिक बल, राजकीय पुलिस एवं आधी रात को कोर्ट तैयार रहती है.

दूसरा हमारा अकूत तत्वज्ञान जो कहता है कि मदिरा, सोमरस को ही कहा जाता है, और सोम की प्रतिष्ठा है कि उसमें आपको देवदर्शन हो जाये.

तीसरा जड़ और चेतन, कण -कण में ईश्वर स्वयं विद्यमान है तो जाहिर सी बात है कि मदिरा भी उसी के अंतर्गत आती होगी तब जबकि वह जड़ को चेतन और चेतन को जड़ कर देने की शक्ति रखती है.

चौथा नरेश जी ने अपने हृदय से अपने सत्य का वर्णन किया है ऐसे में गांधी जी के चार्टर के अनुसार भी सच बोलने का साहस करने वाले पर कैसी आपत्ति और हिन्दुओं जब तक वह तुम्हारे माता पिता, पुत्र -पुत्रियों तक को गाली दे दे तब भी तुम प्रतिकार मत करना और अहिंसा का तप जारी रखना, बुद्ध भी कहते थे कि गाली स्वीकार ना करो वह तुम्हारे भीतर आएगी ही नहीं, रिटर्न हो जाएगी.

पांचवा, हे हिन्दुओं! वो कौन सा तुम्हारे निजी खेतों में पुदीना बो गया जो व्यर्थ उत्तेजित होते हो, कल तुम्हें GST को समझने, 17वीं सेमिनार में जाना है, बच्चो की फीस भरनी है, नल लाइट के बिल जमा करवाने हैं, आदि इत्यादि, सो पहले अपने खेत संभालो क्यों फोकट की फौजदारी करना.

छटा यह कि आप लोग स्थितप्रज्ञ हो समझदार हो, बचपन से पढ़ते आये हो, “क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन के उत्पात”. वो नरेश अग्रवाल तो है ही तुच्छ. तुम तो बड़े हो, अपना बड़प्पन दिखाओ, क्षमा कर दो उस मूर्ख को.

क्या हुआ ????
गुस्सा आ रहा है ना यह सब पढ़कर?

पता है, लेकिन क्या करोगे गुस्सा होकर?

गाली गाली खेलोगे, परसों जिसे प्रशांत भूषण की अम्मा बता रहे थे, कल उसे आजम की अम्मा बताया आज नरेश अग्रवाल की जननी कह रहे हो. बस! और क्या कर सकते हो, किया भी क्या? प्रशांत भूषण का एक बाल भी बांका हुआ (बहुत से योद्धा तो अभी गूगल करेंगे कि प्रशांत भूषण ने क्या कहा था), आजम के कौन से गुर्दे छिल दिए भाई आपने?

बस ये आग जलाकर रखो, कहीं ना कहीं काम जरूर आएगी, क्या पता तुम्हारी एक्स्ट्रा कैलोरी ही बर्न कर दे.

सभी यहाँ आजकल चाणक्य है, बस चंद्रगुप्त के मिलने की देर है विश्वविजय फिर दूर ही कितनी है, सभी आजकल यहाँ कृष्ण है बात बात पर गीता प्रकट कर देते है बस अर्जुन का इंतजार है फिर महाभारत जीतना कौन सा मुश्किल काम है.

तो भाई हिन्दुओं! बेकार में अपना रक्तचाप मत बढ़ाओ, क्षमा करो और आगे बढ़ो, आगे कई अनुपम परीक्षाएं तुम्हारे धैर्य को नापने के लिए उत्सुक खड़ी है. क्या फर्क पड़ता है “विषहीन, विनीत, सरल” के द्वारा बेबसी में दी गई माफी भी तो माफी ही मानी जाती है और अगला खेद भी जता गया. वो तो दिनकर यूं ही कह गए तुम बेकार का लोड मत लो अपने दिमाग पर.

“क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो
उसका क्या जो विषहीन विनीत सरल हो।”

अभी देखो कई महापुरुष आएंगे तुम्हे समझाने की नरेश अग्रवाल ने मोदीजी के होते हुए सदन में जानबूझकर यह सब किया ताकि संदेश जाए हिन्दुओं तक कि तुम्हारा कटप्पा बंधा हुआ है राजधर्म से और है अन्य संख्यको देखो हमारा जिगरा के लोकतंत्र के मंदिर में खड़े होकर मैंने तुम्हारे शत्रुओं के आराध्यों को पानी पानी कर दिया, मोदीजी को राजधर्म से बद्ध धैर्य रखना ही पड़ता है, सभी भाजपाई सांसद भी भीष्म की तरह संविधान से बंधे हुए है. समझा करो यार कुछ.

फिर एक तरफ पाकिस्तान मोर्टरार दाग रहा है और एक तरफ चाइना तिब्बत में गोले तौल रहा है, अब मोदीजी देश संभाले या इनसे कुश्ती लड़े.

तो भाई धीमी धीमी आंच पर पक रहे भगवा मेंढकों !
आंच ज्यादा तो नहीं है ना, लगे तो जरा बता देना दो चार ट्रक पत्थर डलवा के अयोध्या में तुम्हारी पीड़ा और ताप थोड़ा कम कर देंगे.

“कौन कह गया बे यह कि भारत का नाम उस भरत के नाम पर पड़ा था जो सिंहो के जबड़े खोलकर दांत गिन लेता था?

सही कहते हैं वामिये कई बार यार, देखा है ऐसा कोई सिंह इन पचास वर्षों में एक भी?

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