कटु सत्य यह है कि हम और आप ही हैं नरेश अग्रवाल

पुष्कर अवस्थी : नरेश अग्रवाल ने जो कहा वो ठीक कहा क्योंकि वह ज्यादातर उन लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो हिन्दू सिर्फ नाम से है, हिन्दू हैं नहीं. मुझे नरेश के विरोध में कुछ भी नहीं कहना है क्योंकि हिन्दू को खुद अपनी मंजिल का ही पता नहीं है.

इसका कारण यह है कि स्वघोषित हिन्दू ज्ञान की बौछार कर सकता है, वह पुरातन काल की गर्वमयी यश गाथा का गुणगान कर सकता है या फिर सिर्फ खुद के संचय की सोच सकता है. लेकिन नरेश अग्रवाल जैसे लोगों को मालूम है कि वह अपने हिन्दू वोटरों को इस की इजाजत देकर उनको बेइज्जत कर सकता है.

कटु सत्य यह है कि नरेश अग्रवाल हम और आप ही हैं क्योंकि हम भी जिंदा हैं और उसी के भरोसे वह भी ज़िंदा रहेगा.

आनंद राजाध्यक्ष : नरेश अग्रवाल पर एक ही बात कहनी है. SGPC का नाम तो आप ने सुना ही होगा? शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमिटी यह उसका पूरा नाम है. उनकी याद नरेश अग्रवाल को लेकर क्यों, बता रहा हूँ.

बरनाला थे या बादल या दोनों, अभी exact याद नहीं, लेकिन मुख्यमंत्री थे जब SGPC ने इनको गुनहगार ठहरा कर सज़ा फरमाई थी. स्वर्ण मदिर में आने वाले सभी भक्तों के जूते साफ करने की, एक दिन की सज़ा.

और इन्होने न सज़ा को कोर्ट में चैलेंज किया था, न उसकी अवमानना की थी. बाकी वो सज़ा किस ‘गुनाह’ के लिए थी, वो बात भी विवादित हो सकती थी लेकिन इन्होने ऐसा कुछ नहीं किया, शांति से सज़ा भुगत ली और माफी भी मांग ली थी.

नरेश अग्रवाल को लेकर अग्रवाल समाज ऐसा कुछ कदम उठाए तो बात समझ में आए. बाकी फेसबुक पर बहिष्कार की घोषणाएँ… चलिये, आप ने किया बहिष्कार और हमने मान लिया. वैसे भी सदन में सभी ने उनकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का सम्मान ही किया है, आप के साथ हम भी करेंगे.

ध्यान विनय : नरेश अग्रवाल ने तो जो कहा सो कहा, अपने संस्कार दिखाए, अपने कुल-परिवार-पूर्वजों का परिचय दिया… ठीक? अब सवाल उठ रहा है कि हिन्दू कैसे इसका प्रतिकार करें, कैसे इसे दण्डित करें.

तो जान लीजिए कि नहीं कर सकेंगे. करना होता तो पहली कार्रवाई इसके अपने समाज से हो गई होती. इसके ज़िले, प्रदेश और फिर देश की अग्रवाल सभा ने इसे बिरादरी बाहर कर दिया होता.

अब शेष हिन्दू समाज की बात… तो जो ठेकेदार, दुकानदार हैं हिन्दू समाज के, उन्होंने क्या किया? करना तो दूर, कुछ कहा भी? ये सारे बाबा, बापू, प्रवचन देती साध्वियां अपनी ज़ुबान क्यों सिले बैठे हैं.

हिन्दुओं के पैसों से अपनी आजीविका चला रहे टीवी पर दिखने वाले ये, धर्मभीरू प्रजा के शोषक, किस लोभ अथवा भय से मौन धारण किये हुए हैं?

क्या 24 घंटे बीत जाने के बाद भी इनकी तरफ से या हिन्दू हितों के तथाकथित रक्षकों की ओर से किसी आन्दोलन की घोषणा हुई?

नहीं न… तो चलिए उसी लोकोक्ति से जी बहलाया जाए कि हाथी चलता जाता है, कुत्ते भौंकते ही रहते हैं… सलामत रहो नरेश अग्रवाल, शोर करते रहो… शायद कभी किसी की नींद खुल जाए.

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