नास्तिकिस्लाम : वामपंथ और इस्लाम में मूलभूत फर्क नहीं

पंचतंत्र की गंगदत्त मेंढक की कहानी मेरी पसंदीदा कहानी है. अपनों से ही बैर रखने वाला गंगदत्त अपनों को ही खत्म करने प्रियदर्शन नाम के साँप को कुएं में बुला लाता है. साँप उसके शत्रु तो खत्म कर ही देता है लेकिन तत्पश्चात वहाँ से जाने से इनकार देता है.

गंगदत्त उसे जाने को कहता है लेकिन साँप फ़ूत्कार कर मना कर देता है – ‘अब मैं नहीं जानेवाला। तू मुझे लाया था, अब तू ही मेरे खाने का इंतजाम कर.’ गंगदत्त उसे समझाने की कोशिश करता है, कड़वी बातें भी सुनाता है लेकिन साँप फ़ूत्कारता है तब वो चुप हो जाता है.

आखिर मजबूरी में गंगदत्त को उसे अपने परिजनों को भी खाने की इजाज़त देनी पड़ती है और होते-होते अकेला गंगदत्त ही रह जाता है. तब ‘और मेंढक लाता हूँ’ कह कर गंगदत्त जन बचा कर भाग जाता है.

हिंदुस्तान में इस्लाम के हरे साँप को न्योता देनेवाला पहला गंगदत्त कौन था यह आज मायने नहीं रखता। ऐसे कई गंगदत्त समय-समय पर अवतीर्ण हुए और अपने-अपने कुएं में इस्लामी प्रियदर्शनों को ले गए. कुछ भाग पाये, कुछ को उनके ही बुलाये हुए प्रियदर्शन खा गए. आज बात करते हैं वामपंथी गंगदत्त जमात की.

आज सभी गैर इस्लामी मुल्कों में वहाँ के वामी ही मुसलमानों के समर्थक हैं. यूरोप, अमेरिका के मुसलमान कुछ भी उत्पात करें, उनके समर्थन में वहाँ के वामपंथी ही खड़े हो जाते हैं और बहुमती गैर मुस्लिम समाज को असहिष्णु होने की गालियां देते हैं.

Useful Idiots यह शब्द लेनिन के हैं, लेकिन गैर इस्लामी लोकतान्त्रिक मुल्कों में वामपंथी ही मुसलमानों के लिए सब से बड़े useful idiots साबित हो रहे हैं. अपने ही देशबांधवों का सभी तरह से नुकसान कर रहे हैं, इस्लाम का साँप अपने देश में पाल पोस कर बड़ा करके. भारत में भी भी आप देखें वामी विचारधारा के जन्मना हिन्दू गंगदत्त ही अपने हिन्दू देशबांधवों को प्रियदर्शनों का भक्ष्य बना रहे हैं.

वैसे मजे की बात यह है कि इस्लाम को ले कर वामी वाकई useful idiots ही साबित हुए हैं. जितना समर्थन और संरक्षण वामियों ने इस्लाम को दिया है, इस्लाम हमेशा उनका अहसानफरामोश (कृतघ्न) ही रहा है. ईरान में जब अमेरिका के समर्थन से रेज़ा शाह पहलवी का राज था तो वहाँ Tudeh Party के नाम से सब से प्रभावी विरोधी वामी ही थे. उनके दमन के लिए शाह ने Evin जेल बनाया था.

आखिर खोमेनी की इस्लामी रेवोल्यूशनरी पार्टी और तुदेह पार्टी, दोनों के प्रयत्न सफल हुए और शाह को जाना पड़ा. वैसे सनद रहे कि शाह को उखाड़ना खोमेनी के बस की बात नहीं थी, लेकिन तुदेह पार्टी ने खोमेनी को क्रांति का चेहरा बनाया और उसने फायदा उठाया.

शाह के पदच्युत होने तक तक इस्लामी रेवोल्यूशनरी पार्टी ने कभी तुदेह का विरोध नहीं किया था, लेकिन शाह के जाते ही तुरंत खोमेनी ने सत्ता छीन ली. शाह के लोगों से पहले वामियों को ही क्रूरता से निपटाया.

Evin जेल की क्षमता कई गुना बढ़ाई. वहाँ के कैदी कौन थे इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि Evin Prison को Evin University कहा जाता था. यह इतने बुद्धिजीवी तथा विद्यार्थी कौन होंगे यह आप अंदाजा लगा सकते हैं.

Assadollah Lajevardi नाम के जेल प्रमुख बहुत ही कुख्यात रहे. कैदियों पर अत्याचारों के साथ साथ महिलाओं पर बलात्कार में भी उनकी कीर्ति थी. कठोर इस्लामी कानून पालने वाली ईरानी सत्ता को इनकी वहशीयत से कभी आपत्ति नहीं हुई. आखिर उनकी भी हत्या ही हुई.

उसी तरह कम्युनिस्ट देशों में भी इस्लाम को पहचान कर उससे उसी तरह का व्यवहार किया जाता है. रशिया में चेचेन्या के विद्रोही मुस्लिमों का क्रूरता से ही दमन किया गया. चाइना भी अपने मुसलमानों के साथ जो कर रहा है वो देख कर यहाँ काफी लोगों के कलेजे को ठंडक पहुँच रही है.

लेकिन हम बात अपनी करें. एक दिन तो आयेगा जब गंगदत्त, प्रियदर्शन को गरियाएगा. लेकिन उस दिन कुआं साफ चुका होगा इसलिए तब तक इंतज़ार करना हमारे लिए उचित नहीं.

वैसे वामी होते क्या हैं? विद्वान होते हैं, और विपन्नता से बचने के लिए बिकाऊ होते हैं. देशप्रेम उनमें होता नहीं और देशद्रोह से कतराते नहीं. हमें यह देखना है कि वे बिकाऊ हैं लेकिन विद्वान भी हैं.

अब अगर विद्वान हैं तो उन्हें इतनी तो समझ होगी ही कि जब तक इस्लाम सत्ता में नहीं आता, तब तक ही वे सुरक्षित हैं, और उनको सुरक्षा हिन्दू ही देते हैं. बंगाल में तृणमूल की आड़ में इस्लाम की हुकूमत आई तो उसके सब से अधिक भुक्तभोगी वहाँ के वामपंथी ही हैं. वामपंथियों को इतना तो समझना ही चाहिए कि उनकी जिंदा रहने की गारंटी हिन्दू ही देता है.

मान लीजिये ये अपनी सेवाएँ हिन्दू हित में समर्पित करें. वैसे जो अधिनायकवाद (hegemony) ये सीखते-सिखाते हैं, इस्लाम की वही तो नींव है. Hegemony is always prophetable! ज़हर का काट ज़हर ही होता है, अल्लाह और मुहमद को अलग करें तो वामपंथ और इस्लाम में मूलभूत फर्क नहीं है. इसीलिए तो वामपंथ को मैं नास्तिकिस्लाम ही कहता हूँ.

चर्चा, वाद विवाद और प्रचार तंत्र में भी इनके अनुभव का लाभ उठाया जा सकता है. वैसे भी हिन्दुत्ववादियों को ऐसे मंजे खिलाड़ी कई जगहों पर बहुत काम आ सकते हैं.

बस एक कल्पना कीजिये, और मजे लीजिये – प्रकाश कारत, सीताराम येचूरी और डी राजा जैसे लोग खाकी निक्कर में खड़े रहकर “नमस्ते सदा…” गा रहे हैं – हँसना मना नहीं है स्वास्थ्य के लिए हँसना भी चाहिए.

वैसे भाजपा को भी ये वामी दीमक की तरह चाटे जा रहे हैं ऐसा लगने लगा है. काँग्रेस में नेहरू के रूप में जो Fabian वामी घुन लग गया उससे काँग्रेस का वामीकरण बहुत जल्दी हो गया था, स्वतन्त्रता के भी पहले.

आज काँग्रेस के पास जो भी विचारक हैं या विचारक कहलाने वाले लोग हैं, कौन वामी विचार का नहीं है? काँग्रेस को तो अपना चुनाव चिह्न दाहिने हाथ से बायाँ हाथ कर लेना चाहिए. काम तो सभी बाएँ हाथ वाले ही करते हैं लेकिन वो अलग बात है. अब चुनावों के लिए भाजपा ने जो काँग्रेस घास अपने यहाँ लाकर लगाया है; देखना है क्या होता है.

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