ज़्यादा खेल भावना न दिखाएं, यह क्रिकेट मैच नहीं हमारी अस्तित्व रक्षा का संघर्ष है

पिछले रविवार को क्रिकेट खेलने गया था. फ्रेंडली मैच था… दोनों टीमें देसी थीं. तो बैटिंग टीम ही अंपायरिंग कर रही थी. हमारी टीम की बुरी हालत थी. हम 120 रनों से हार रहे थे. मैं अंपायरिंग कर रहा था. आखिरी विकेट बैटिंग कर रहा था. एक एलबीडब्ल्यू की अपील हुई. मिडिल स्टंप पर बॉल थी, घुटने के ठीक ऊपर लगी. मैंने आउट दे दिया.

ग्राउंड से बाहर आया तो नॉन-स्ट्राइकर ने, जिसे बैटिंग नहीं मिली, शिकायत की… “तुम्हें वह एलबीडबल्यू नहीं देना चाहिए था.” मैंने कहा, “इसे इनकार करना थोड़ा कठिन था… बिल्कुल प्लंब था.”

उसने कहा… “तो क्या हुआ? मेरी बॉल पर उनके अंपायर ने भी नहीं दिया था.”

मैंने कहा – “मुझे ईमानदारी का कोई कीड़ा नहीं है. अगर आउट नहीं देने से हम मैच जीत रहे होते तो मैं दे भी देता. पर लास्ट विकेट पर, जब आप 120 रनों से हार रहे हों, गलत निर्णय देने का क्या फायदा.”

खैर, मेरे खिलाड़ी हल्के से नाराज रहे… अपनी टीम का बंदा अंपायर हो तो उससे अपेक्षाएं होती ही हैं…

कुछ ऐसी ही अपेक्षा मुझे मोदी से है… आप प्रधानमंत्री बन गए हो… समस्त देश की प्रजा आपकी प्रजा है… रूल बुक कहती है कि आपके लिए सभी एक समान होने चाहिए. आप सोचते हो, कुछ भी हो जाये आपको न्यूट्रल दिखना है… कम से कम हिंदुओं के पक्ष में पक्षपात करते तो नहीं दिखना है.

हमारा कहना है – आप दो बातें भूल रहे हैं. जब उनकी बारी थी तो उन्होंने एलबीडबल्यू क्या, बोल्ड आउट भी नहीं दिया. स्कोर बोर्ड पर एक की जगह चार रन लिखे…उनके अंपायर नहीं 13 प्लेयर थे. उनका अंपायर शकूर राणा था और आप अंपायर धोतीवाला बने हुए हो…

उन्होंने हमारे आदरणीय मोहन भागवत को आतंकी घोषित करने का इंतज़ाम कर लिया और आप ओवैसी से एक सवाल नहीं पूछ सकते… वह अपने पंद्रह मिनट का इंतज़ार कर रहा है और आप सारे दिन बैठे सोच रहे हैं कि रूल बुक क्या कहती है…

दूसरी, ज्यादा बड़ी बात यह है कि यह एक फ्रेंडली मैच नहीं है… यह क्रिकेट का मैच ही नहीं है… यह हमारी अस्तित्व रक्षा का संघर्ष है. इसमें स्पोर्ट्समैन स्पिरिट (खेल भावना) दिखाने की गुंजाइश नहीं है. आप न्यूट्रल अंपायर नहीं हैं, आप हमारी टीम में हैं. देश हिंदुओं का है, आप हिंदुओं के प्रधानमंत्री हैं… भाड़ में गया राजधर्म, चूल्हे में गया संविधान…

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