इन्हें ये डर था कि कहीं जाग न उठे बिहार

नरेंद्र मोदी के सत्तासीन होने के बाद भारत के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए जिनमें राष्ट्रवादी शक्तियों की विजय हुई. कश्मीर से केरल और मणिपुर से राजस्थान तक चुनाव हुये. यहाँ तक कि भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर-प्रदेश में भी चुनाव हुये.

इन चुनावों में विपक्ष का सारा जोर इस बात पर था कि राष्ट्रवादी ताकतें सत्ता में न आ सके. इन चुनावों में एक चुनाव 2015 के आखिर में हुआ बिहार का चुनाव भी था पर ये चुनाव बाकी सब चुनावों से कई मायनों में अलग था.

ये अलग इसलिये था कि क्योंकि इस चुनाव से पहले तमाम विपक्षी दल कसम खाकर बैठ गये थे कि इस चुनाव में भाजपा को सत्ता में नहीं आने देना है. इस चुनाव में उन पार्टियों के बीच भी गठजोड़ हो गये जिनका आपस में विचारधारा और महत्वाकांक्षा से लेकर हर स्तर पर मतभेद था.

चुनाव से पूर्व बीफ के नाम पर हत्या का षड्यंत्र रचा गया और पुरस्कार वापस करने की नौटंकी भी हुई. दुनिया भर में घृणा और दुष्प्रचार का भयंकर खेल खेला गया और अंतत: भाजपा पराजित हो गई.

बिहार लोकसभा सीट के मामले में उत्तर प्रदेश से करीब-करीब आधा है, यहाँ न कोई उद्योग-धंधा है, न महानगर और न ही कारोबार की अधिक संभावनायें पर तब भी बिहार में भाजपा की पराजय हो इसके लिये सबसे अधिक कु-चक्र रचे गये. सवाल है कि आखिर बिहार में भाजपा के विजय से आखिर इन्हें इतना डर क्यों था?

इसका उत्तर मिलेगा विनायक दामोदर सावरकर की लिखी किताबों में. विनायक दामोदर सावरकर की उज्जवल कृतियों में एक ‘भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ है’ भी है. मोपला और गोमान्तक की तरह सावरकर की यह कृति भी जागृति का पांचजन्य शंख है.

पांचजन्य शंख इसलिये क्योंकि जहाँ बाकी के इतिहासकारों का हेतु हमें सिर्फ ये बताना और हममें लज्जा का संचार करना रहता है कि तुम्हारा इतिहास केवल अंतहीन पराजय और अपमान का रहा है वहीं सावरकर का ये ग्रन्थ हमें हमारे गौरवशाली अतीत, हमारे महान पूर्वज और तमाम विस्मृत राष्ट्र-नायकों के साथ जोड़ते हुये हममें सकारात्मक उर्जा का संचार करता है.

सावरकर ने इस ग्रन्थ में भारत के इतिहास के उस कालपक्ष का निरूपण किया है जो सिकंदर के भारत आक्रमण से शुरू होता है और ब्रिटिश साम्राज्य की दासता से मुक्ति पर खत्म होता है. लगभग तेईस सौ सालों के इस कालखंड से विनायक ने छः घटनाओं को भारत के इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ के रूप में चुना है.

ऊपर वाले प्रश्न के जवाब में मैंने लिखा था कि इसका उत्तर विनायक दामोदर सावरकर की लिखी किताबों में मिलेगा. ऐसा लिखने की वजह ये है कि लगभग तेईस सौ सालों के कालखंड से विनायक ने जिन छः घटनाओं को भारत के इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ के रूप में चुना है उनमें कम से कम प्रथम चार स्वर्णिम पृष्ठ अकेले बिहार से संबद्ध है.

विनायक ने प्रथम स्वर्णिम पृष्ठ के रूप में रूप में सम्राट चंद्रगुप्त की यवनों पर प्राप्त विजय को रखा है वहीं द्वितीय स्वर्णिम पृष्ठ के रूप में उन्होंने सम्राट पुष्यमित्र शुंग के स्वर्णिम कालखंड को चुना है. विनायक के स्वर्णिम पृष्ठों की तीसरी और चौथी सूची में भी बिहार ही है जहाँ क्रमशः सम्राट चन्द्रगुप्त, सम्राट विक्रमादित्य, सम्राट कुमारगुप्त और सम्राट स्कंदगुप्त बैठे हैं जो पाटलिपुत्र में बैठकर सारे भारत को यवन आक्रमणों से अभय का एहसास दिला रहे थे.

इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठों में चार अपने नाम रखने वाले बिहार से विपक्षियों को ये डर इसीलिए था कि कहीं बिहार और बिहारी फिर से जाग न जायें. उन्हें डर था कि अगर ये जग गये तो फिर भारत की सीमा का संकुचन नहीं विस्तार होगा, उन्हें डर था कि अगर ये जग गये तो किसी शत्रु की लालची आँख भारत भूमि की ओर उठने से पहले सौ बार सोचेगी, उन्हें डर था कि इनका जागरण कहीं भारत भूमि में आर्य चाणक्य, समुद्रगुप्त, आर्यभट्ट या गुरु गोविंद सिंह न पैदा कर दे, उनको ये भी डर था कि बिहार का जागरण अपनी बेटियां देने की बजाय शत्रु सेल्यूकस की बिटिया ब्याह लाने वाला चन्द्रगुप्त न पैदा कर दे.

खैर, अतीत का गौरव-गान तब तक निरर्थक है जब तक वर्तमान उसके अनुरूप न हो इसलिये ये दायित्व बिहार का भी है कि अपने अतीत-गौरव को बनाये रखे और तुच्छ आकांक्षाओं के चलते अपने पूर्वजों द्वारा अर्जित यश पर ग्रहण न लगने दें.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY