भारत के साथ छलावे का पर्दाफाश – 2

पिछले लेख में बात उठाई थी इतिहास को विकृत कर के shame game के तहत शर्म के बोझ तले हिंदुओं के आत्मसम्मान को दबाने की. अब राजा राम मोहन रॉय के उठाए मुद्दों पर जरा बात करें.

1 सतीप्रथा का अंत, जिसके लिए वे सब से अधिक जाने जाते हैं हैं – वे और William Bentinck

2 Rigidity of Caste System जाति व्यवस्था की कठोरता

3 Polygamy बहुपत्नीत्व

4 Child Marriages बाल विवाह

सती प्रथा को ले कर बचपन की कथाएँ जो याद हैं वे दिल दहला देने वाली थी. विधवा स्त्री को बोझ मानकर चिता में धकेला जाता था, क्या होता है उसे यह समझ न आए इसलिए नशीले पदार्थ खिलाये पिलाये जाते थे और फिर भी अगर आग से वो भागने की वो कोशिश करे तो लम्बी-लम्बी लकड़ियों से उसे अंदर वापस धकेला जाता था.

उसकी चीखें न सुनाई दें इसलिए ढ़ोल नगाड़े आदि वाद्य ज़ोर शोर से बजाए जाते थे. चित्र भी थे – फोटो नहीं, 20 वी सदी के किसी चित्रकार ने कल्पना से बनाए कृष्ण धवल चित्र. और ऐसी दक़ियानूसी प्रथा से – भारत की – हिन्दू स्त्रियों को मुक्ति दिलाने वाले, उनके तारणहार, भारत माता के सपूत राजा राम मोहन रॉय.

यही पढ़ा था मैंने. और मेरी पढ़ाई कान्वेंट की नहीं है. वहाँ और क्या पढ़ाया जाता होगा, पता नहीं.

[भारत के साथ छलावे का पर्दाफाश – 1]

आज सोचता हूँ, क्या उन दिनों विधवाएँ होती ही नहीं थी? पति मर गया तो सीधा इसको भी साथ में pack कर के जला देते थे क्या? क्या सिर्फ राजघरानों में विधवाओं को जीने का अधिकार था? क्या सभी विधवाओं को सती होना जरूरी था ?

समाज के इतिहास के प्रति अपने पूर्वजों की उदासीनता पर गुस्सा आता है इस वक़्त कि जो बात तर्क से विसंगत तो लगती है लेकिन विश्वसनीय तथ्यों के अभाव में हम निरुत्तर हैं.

यह तो यूं हुआ कि किसी सफ़ेद बाल, झुर्रियों से भरे और कमर में दोहरे हो कर, लकड़ी के ही बल मुश्किल से चल पाने वाले किसी वृद्ध को, कोई रेल्वे का टीसी, आयु प्रमाणपत्र के बगैर सीनियर सिटिज़न मानने से इंकार कर दें और वो बेचारा बुजुर्ग कुछ न कह सके.

क्या सती होने के उस समाज को या उस घर को कोई सामाजिक प्रतिष्ठा, लाभ इत्यादि मिलते थे? क्या उनको महत्व मिलता था? क्योंकि जहां तक दिख रहा है, ऐसे ही चीजों को ध्वस्त करने का जेताओं का स्वभाव रहा है. खैर, सती का मैं समर्थक तो नहीं हूँ, लेकिन यहाँ कुछ बातें अनुत्तरित लगती तो है.

जाति व्यवस्था (Caste System) को देखते हैं कि अंग्रेजों ने इसमें पाया कि समाज को एक साथ बांधने वाली कोई बात है तो यह है. इसका विध्वंस हिन्दू समाज के विध्वंस की कुंजी है, अत: इसको कैसे भी कर के ध्वस्त करना है.

उस वक़्त उन्होने क्या प्रयत्न किए और उन्हें कितनी सफलता मिली यह मुझे जानकारी नहीं है, लेकिन सालों बाद उन्होने जो किया उसका वर्णन इस चुट्कुले में आप को मिल जाएगा, सुनिए:

खिलौने के दुकान में एक बौराई हुई माता घुस आई. नजर किसी को ढूंढ रही थी. एक सेल्समन पर जा टिकी. गुस्से से लगभग पाँव पटकती वो उसके सामने जा खड़ी हुई और शेल्फ में रखे एक खिलौने के तरफ निर्देश करते उसे पूछा – आप ने ही वो खिलौना मुझे बेचा था न कल? यही कहा था ना कि ये टूट नहीं सकता?

भौचक्के सेल्समन ने पूछा – हां, लेकिन कहना क्या चाहती हैं आप? क्या आप के बच्चे ने उसे भी तोड़ दिया?

“नहीं”, औरत ने जवाब दिया, लेकिन उसे लेकर अपने बाकी सारे खिलौने चकनाचूर कर दिये उसने!

जातियाँ तो तोड़ नहीं सके, उल्टा तो और पुख्ता कर दी और सभी समस्याओं के लिए उस पर ही आरोप लगाकर समाज को ही तोड़ डाला गदाघात से! क्या नहीं?

बहुपत्नीत्व की बात करें. एक से अधिक विवाह किसके बस की बात थी?

ज़मींदार, रियासत वाले ही होंगे. अब यहाँ एक बात सोचते हैं. यह सत्ताधारी वर्ग में विवाह अक्सर घरानों के गठबंधन के लिए होते थे, आज भी उसी कारण से होते हैं, बस एक ही हो पाता है वो बात अलग है. तो गठबंधन से पॉलिटिकल ताकत बढ़ती है अगर… कैसे बर्दाश्त हो? प्रथा की निंदा करो, समाज की निंदा करो, शर्म के बोझ में बढ़ोत्तरी करो…

बाल विवाह – क्या कुछ किया भी इन्होने या इनके बाद भी किसी ने? 1980 के दशक में मुझे याद है, इंडिया टुडे ने, राजस्थान में कोई मुहूर्त को लेकर हजारों बालविवाह हुए थे, उस पर कवर स्टोरी की थी. याने होते-होते यह सभी कुरीतियाँ समाप्त की तो हिंदुओं ने ही.

तो अंग्रेजों ने कुछ खत्म किया भी या नहीं? जवाब हाँ ही है, लेकिन ऐसा क्या खत्म किया इन्होने?

हिन्दू समाज! हिन्दू समाज को खत्म किया अंग्रेजों ने!

सुधारने के लिए सिर्फ हिन्दू ही मिले इनको? भारत के सत्ताधीश थे ये, भारत के मुसलमान किसी और ग्रह पर तो नहीं बस रहे थे न.

अश्वं नैव गजं नैव व्याघ्रं नैव च नैव च।
अजापुत्रं बलिं दद्यात् देवो दुर्बलघातकः॥

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