भारत के साथ छलावे का पर्दाफाश – 1

सती प्रथा क्या होती थी? नहीं, मैं जवाब नहीं मांग रहा आप से, शायद इस विषय में जितना मैं जानता हूँ आप भी उतना ही जानते हैं. ‘एक कुप्रथा थी जिसे राजा राम मोहन रॉय और तत्कालीन गवर्नर जनरल विलियम बेंटिंक ने समाप्त करवाई.’ यही है ना?

सवाल यह है कि क्या यह सच है? क्या यही सच है? क्या सती वाकई कुप्रथा थी या नहीं? सच तो यह है कि मुझे भी पता नहीं कि हकीकत क्या थी. लेकिन सच यह भी है कि मैं और आप, वही स्वीकार करने को मजबूर हैं जो अंग्रेजों ने हमें बताया है.

दुनिया का सब से दीर्घ इतिहास हमारा है, लेकिन हम उसके प्रलेखन (documentation) को ले कर बहुत ही उदासीन रहे हैं. और हमारे पूर्वजों की इस त्रुटि की कीमत हम से आक्रांताओं ने वसूली है जो इतिहास का शस्त्र के तौर पर उपयोग करना जानते थे.

राजा राम मोहन रॉय के बारे में पढ़ते हुए यह वाक्य मिले विकिपीडिया पर : Rammohan Roy’s experience working with the British government taught him that Hindu traditions were often not credible or respected by western standards and this no doubt affected his religious reforms. He wanted to legitimize Hindu traditions to his European acquaintances by proving that “superstitious practices which deform the Hindu religion have nothing to do with the pure spirit of its dictates!”

The “superstitious practices” Rammohan Roy objected included sati, caste rigidity, polygamy and child marriages. These practices were often the reasons British officials claimed moral superiority over the Indian nation. Rammohan Roy’s ideas of religion actively sought to create a fair and just society by implementing humanitarian practices similar to Christian ideals and thus legitimize Hinduism in the modern world.

क्या मतलब है इन वाक्यों का? मुझे इनमें एक अनकहा सच दिख रहा है कि राजा राम मोहन रॉय अपने मूल हिन्दू धर्म को ले कर लज्जित थे. अब ये वाकई धार्मिक परम्पराओं को ले कर लज्जा थी या अंग्रेजों से स्वीकृत होने के लिए कुछ भी कर गुजरने की तैयारी, इसका आज हम मूल्यांकन नहीं कर सकते क्योंकि हमारे पास कोई अन्य version मौजूद ही नहीं है. लेकिन एक बात का भारत के माथे पे दाग लगाया जाता है कि तुम लोगों में इतनी सारी कुरीतियाँ थी जो हमारे कारण ही खत्म हुई हैं.

ये शर्मिंदा करने का खेल है (Shame Game) तथा समाज विघटन का भी है जिसे आगे खेला गया. दो शब्द नोट करिए – caste rigidity. याने हिन्दू विघटन का यह खेल तभी से चालू है जिसके लिए अंग्रेज़ हमेशा कोई स्थानीय मोहरा इस्तेमाल करते थे.

1857 के समर के सभी विप्लवियों को ढूंढ-ढूंढ कर मारा अंग्रेजों ने. उसके बाद यह खेल फिर से चालू हुआ. अचानक कहाँ से, जातिवाद इतना असह्य रूप से बड़ा हो गया जो इसके पहले इतिहास में नहीं था? नीची से नीची मानी गई जातियों के लोग भी ऊंचे से ऊंचे जाति के राजाओं के लिए खुशी से जान न्योछावर क्यों करते थे? उनके लिए अकृत्रिम निष्ठा क्यों थी?

हिन्दू परंपरा में जातिवाद, ब्राह्मणवाद ये शब्द कभी थे ही नहीं. दलित भी नहीं था कहीं. यह “वाद” प्रत्यय तो सीधे सीधे “ism” का भाषांतर है – casteism से जातिवाद, Brahmanism से ब्राह्मणवाद. ये दोनों शब्द कहाँ हैं हिन्दू परंपरा में? नहीं हैं तो कहाँ से आए, किसने घुसाया इन्हें हमारे मनों में?

जिस रूप में ‘दल हित चिंतक’ उन्हें परोसते हैं वे मनु तो 1931 के आसपास पैदा किए गए. पढ़ी भी है मनुस्मृति किसी ने या अंग्रेजों का सिखाया हुआ शर्म का खेल ही बेशर्मी से खेला जा रहा है? भारत में कब और किस राजा के राज्य में लागू थी मनुस्मृति? कहाँ लिखी है पिघलते सीसे की बात?

क्यूँ बैठता नहीं कोई भी ‘दल हित चिंतक’ किसी भी हिन्दू विद्वान के साथ श्लोक दर श्लोक शास्त्रार्थ के लिए?

अंग्रेजों की हमेशा एक स्टाइल रही. नीच कर्म हमेशा स्थानीय लोगों के ही हाथों करवाते थे. विभीषण राम को ढूंढते आ गए थे, अंग्रेज़ सब से पहले विभीषण ढूंढ लेते. लीपा जाने वाला गोबर इनका, लेकिन लीपने के लिए आदमी लोकल.

खैर, अभी इतिहास सामने आ रहा है. हिंदुस्तान के द्रोही जो झूठ को सच बतलाते घूमते थे, अब उनसे भी सवाल किए जा रहे हैं और सब के सामने सच खुल रहा है कि ये विदेशियों के हाथों बिके लोग हैं. दर्द सिर्फ उस बात का है कि इनके पूर्ववर्ती यही काम कर के भी इतने महान बनाए गए कि उनकी पोल खोल समाज के लिए पीड़ादायक होगी. लेकिन फिर भी, यह भी जरूरी होगा.

Aatish Taseer एक प्रसिद्ध लेखक हैं और बहुत ही सुंदर लिखते हैं. संस्कृत के भी गहरे अभ्यासक हैं. उनका एक वाक्य मुझे हमेशा विचलित कर जाता है : जो लोग अपने इतिहास का अध्ययन नहीं करते वो उसे विकृत रूप में प्रस्तुत करने वालों से छले जाने के लिए अभिशप्त हैं.

When you don’t study your past, you expose yourself to people distorting it.

लेख ज़रा अलग सा है, सब की रुचि का विषय नहीं है, लेकिन उम्मीद करता हूँ कि आप की रुचि निर्माण होगी क्योंकि इस विषय पर आगे काफी कुछ लिखना है कि भारत के साथ क्या फ्रॉड हुआ है.

भारत के साथ छलावे का पर्दाफाश – 2

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