देखो इन्हें ये ओस की बूँदें

किशोरावस्था अर्थात 12 से लेकर 18 साल तक की उम्र जिसके पहले एक बच्चे की देखभाल माता-पिता के हाथ में होती है. उसके बाद उम्र का वह दौर शुरू होता है, जिसमें वह कई बातों के लिए बड़ा हो चुका होता है और कुछ बातों के लिए अभी भी अपरिपक्व है. ऐसे में उसे ऐसी कई चीजों से उलझना पड़ता है, जहाँ वह खुद निश्चय नहीं कर पाता कि वह बड़ा हो चुका है या छोटा ही है. और यदि ऐसी परिस्थितियों में वो खुद को उलझा लेता है, तो उसका समय वहीं रुक जाता है. और उम्र का ये ऐसा पड़ाव है, जहाँ रुकने का मतलब है अव्यवस्था के जंगल में भटक जाना.

ऐसे में उसे सही राह दिखाने वाले होते हैं, उसके माता-पिता, शिक्षक और घर और बाहर के बड़े. लेकिन बड़े होने का तात्पर्य यह नहीं कि सिर्फ आदेश देना. जब बच्चा छोटा होता है, हम उसे हँसाने के लिए कई तरह की आवाजें निकालते हैं या कुछ उल्टी-सीधी हरकतें करते हैं, उसी तरह बच्चा जब किशोरावस्था में होता है, तब भी हमें उसे खुश रखने के लिए उसके स्तर पर आना होता है. उसके मानसिक स्तर पर आकर दुनिया को उसकी नज़र से देखना होता है और उसके सामने आ रही समस्याओं को उसके हिसाब से हल करना होता है.

किशोरावस्था की सबसे बड़ी विशेषता होती है कि इस उम्र में किशोर किसी भी बात की गहराई से समझने के बजाय सतही ज्ञान लेकर उसी पर विश्वास करने लगते हैं. इसलिए यह जानना बहुत ज़रूरी है कि कोई भी बात उसके दिमाग को किस तरह प्रभावित कर रही है और वह उसे किस नज़रिये से देख रहा है. यदि हमें ज़रा सा भी संशय हो तो उसे तुरंत ठीक तरह से समझाने की कोशिश करना चाहिए, वो भी उस भाषा और तरीके से जो उसके मानसिक स्तर की हो, बजाय जीवन की बड़ी बड़ी बातों और घटनाओं का उदाहरण देकर.

एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है किशोरों का रहन सहन और पहनावा, जिसको लेकर वे बड़ों से सबसे ज्यादा बहस करते हैं. जिसे हम या तो उनकी बदतमीजी या जनरेशन गैप का नाम देकर नज़रा अंदाज़ कर देते हैं. यह वह परिस्थिति है जहाँ बड़ों को अपना बड़प्पन दिखाना होता है, डाँट डपटकर या सख्ती से पेश आकर उन पर अंकुश लगाने से वे कई बार बाग़ी हो जाते हैं, क्योंकि इस उम्र में पहनावे को लेकर वो सबसे ज्यादा पज़ेसिव होते हैं. उनके लिए सुंदरता का पैमाना सिर्फ कपड़े और शरीर होता है. जो माता-पिता मन की सुंदरता की परिभाषा अपने बच्चों को सही तरीके से समझा पाते हैं उन्हें कभी भी बच्चों के पहनावे की शिकायतें नहीं आएगी.

वैसे भी उड़ती पतंग को ज्यादा कसकर पकड़े रखेंगे तो उसके कट जाने का डर ज्यादा होता है, उसे आसमान में उड़ाए रखने के लिए थोड़ी ढील देना भी जरूरी होता है. यहाँ बहुत ज़रूरी हो जाता है उन्हें संयम की परिभाषा सीखाना. और वह बच्चा सीखता है घर के स्वस्थ वातावरण से. यदि आप उसे घर के संस्कार, संस्कृति और प्रेमपूर्ण वातावरण का आदि बना देंगे तो बच्चा उस देहरी को पार करने की कोशिश कभी नहीं करेगा जिसे हम अति आधुनिकता कहते हैं. यहाँ आधुनिकता का मतलब हमें भी सीखना होगा कि आधुनिकता सिर्फ कपड़ों से ही नहीं वरन् विचारों से भी होती है.

जहाँ एक तरफ हम मीडिया या फिल्मों का प्रभाव समझकर बच्चों के आधुनिक हो जाने का डर पाल रहे होते हैं. वहीं दूसरी तरफ बच्चों के मस्तिष्क में भी आधुनिकता की एक नई परिभाषा विकसित हो रही होती है, जिसमें रिश्तों में पारदर्शिता, विचारों का आदान-प्रदान, रूढ़ीवादी परम्पराओं का तिरस्कार और ऐसी कई बातें सम्मिलित होती हैं, जिनको हम लक्ष्मण रेखा समझकर पार करने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं.

ऐसे में ही प्रश्नचिह्न लग जाता है उनके व्यवहार और रहन सहन पर. ऐसी परिस्थिति में एक महत्वपूर्ण पहल होती है स्वीकार की भावना. जो अच्छा है, अनुकूल है उसे स्वीकार करना और जो स्वीकार्य नहीं उसे खराब और घिनौना बताने के बजाय उसके दुष्परिणाम से उन्हें अवगत कराना. क्योंकि यदि वो आपके प्रतिकूल जाकर उनके बौधिक स्तर के अनुसार कोई कार्य कर भी लेते हैं, तो उनमें कोई गुनाह का भाव न आए इस बात का ख्याल रखना बहुत ज़रूरी है.

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