तुम खिलना, लेकिन तुम्हीं जैसे!

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एक सूफी कहानी है कि एक सम्राट के महल पर एक अजनबी पक्षी आकर बैठ गया, जो उसने कभी नहीं देखा था. उनके देश में नहीं होता था, परदेशी था.

उसे बड़ी हैरानी हुई. वह बड़ा बेचैन हुआ. उसने पक्षी को पकड़वाया और कैंची उठा कर पंख काट दिए उसके, क्योंकि ऐसे पंख होने नहीं चाहिए. ऐसे पंख उसके देश में होते नहीं थे. इतने बड़े पंख! उसने देखे थे छोटे—छोटे पंखों वाले पक्षी.

उसने उसके पंख काट दिए. हालांकि वह उसकी सेवा कर रहा है. उसकी चोंच भी बड़ी लंबी थी, उसने उसकी चोंच भी कटवा दी. वह पक्षी चीख रहा है, चिल्ला रहा है; मगर राजा उसकी सेवा कर रहा है. वह यही सोच रहा है कि उसको ढंग पर ला रहा है.

यही हो रहा है. जब तुम किसी बच्चे को ढंग पर ला रहे हो, तुम कर क्या रहे हो? पंख काट रहे हो उसके कि तेरे पंख विवेकानंद जैसे नहीं हैं; तेरी चोंच बुद्ध जैसी नहीं है, तुझे हम काट—पीट कर बिलकुल ठीक बना देंगे….. पक्षी मर गया!

आदमी बेशर्म है, बच जाता है. सब तरह कट—पिट जाता है, फिर भी बच जाता है. सब तरफ से छांट देते हो उसको, उसकी सारी आत्मा नष्ट हो जाती है, फिर भी घिसटता रहता है.

परंपरा है क्या? एक कारागृह है! अतीत से आई हुई जंजीरें तुम्हें पहना दी जाती हैं. हालांकि पहनाने वाले कहते हैं कि ये आभूषण हैं. इस मंदिर जाओ, यह किताब पढ़ो, यह मंत्र जपो, इस तरह का तिलक लगाओ; कि तुम हिंदू हो, कि तुम मुसलमान, कि ब्राह्मण, कि शूद्र…. सब तुम्हें समझा दिया जाता है कि तुम कौन हो.

और तुम्हें जरा भी पता नहीं कि तुम कौन हो! और सब तुम्हें बता दिया गया है. असली सवाल तुमने पूछा ही नहीं मैं कौन हूं?

फूल खिलता है… स्वयं की ऊर्जा से. फूल खिलता है… निजता से. और ध्यान रखना : तुममें जो फूल खिलेगा, वह पहले कभी नहीं खिला था…. उस तरह का फूल. और फिर उस तरह का फूल दुबारा कभी नहीं खिलेगा. परमात्मा पुनरुक्ति करता ही नहीं.

तो तुम्हारे ऊपर एक बड़ी जिम्मेवारी है. परमात्मा ने तुम्हारे ऊपर बड़ा भरोसा किया है. तुम्हें एक बड़ी क्षमता दी है कि तुम खिलना. लेकिन तुम्हीं जैसे!

– ओशो
पग घुंघरू बांध, प्रवचन #10

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