सुना है लोकतांत्रिक राजवंश को फिर पसंद नहीं आई कोई फिल्म

फ़िल्मों की खबर लाने-छापने वालों को कई बार पत्तरकार लोग, पत्तरकारों में गिनते ही नहीं हैं. इसकी बड़ी वजह ये भी होती है कि बॉलीवुड की ख़बरों में से ज्यादातर ख़बरें गल्प होती हैं. मतलब उनका कोई सबूत-गवाह नहीं होता, उनको गॉसिप कहा जाता है.

ऐसे ही बिना सबूत गवाह वाले किस्सों में से एक होता है आर.डी.बर्मन के संगीतकार बनने का किस्सा. कुछ लोग कहते हैं कि महमूद को अपनी फिल्म के लिए संगीतकार चाहिए था, लेकिन उनका बजट बिलकुल कौड़ियों वाला था. उसके अलावा वो नए फ़िल्मकार थे तो इस वजह से भी लोग ज्यादा नहीं पूछते थे. ऐसे में वो पहुँच गए एस.डी. बर्मन के पास.

बड़े संगीतकार महोदय महमूद को फ़िल्मी कलाकार के तौर पर पहचानते तो थे, लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया कि वो नए फ़िल्मकार के साथ काम नहीं कर सकते. अगले दिन महमूद फिर पहुँच गए उनके घर. देखते ही उन्होंने पूछा भाई तुम्हें तो कल ही मना कर दिया था, फिर आज कैसे? तो महमूद बोले, बाप नहीं तो बेटा ही सही, मैं पंचम (आर.डी. बर्मन) को साइन करने आया हूँ!

[बुज़ुर्गवार पहचान ही नहीं पा रहे कि पीड़ित कौन है और शोषक कौन]

कहानी कितनी सच्ची है ये तो पता नहीं मगर आर.डी. बर्मन की बतौर संगीतकार पहली फिल्म महमूद की ही थी. समय बीतने के साथ राहुल देव बर्मन ने गुलज़ार के साथ मिलकर कई फिल्मों के लिए अच्छे गीत बनाए. सन 1972 में आई ‘परिचय’ फिल्म के गानों, मुसाफिर हूँ यारों या बीती ना बितायी रैना जैसे गानों से ये गीतकार-संगीतकार की जोड़ी खासी प्रसिद्ध भी हो चुकी थी.

सन 1975 में आंधी और खुशबू फिल्मों के लिए भी ये जोड़ी प्रसिद्ध हुई. भारतीय फिल्मों के गाने कई बार भारतीय शास्त्रीय संगीत से प्रेरित होते हैं, ‘रैना बीती जाए’ जैसे गानों में इस जोड़ी ने ‘शुद्ध स्वरों’ का इस्तेमाल किया था.

‘आंधी’ फिल्म के गाने ‘इस मोड़ से जाते हैं’ में इन्होंने ‘तीव्र मध्यम’ इस्तेमाल किया. ऐसा राग यमन में होता है, और ये तीव्र मध्यम का इस्तेमाल उसी से प्रेरित था. जो वाद्ययंत्र इस्तेमाल हुए वो भी स्वदेशी थे. बांसुरी पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ने बजाई थी, सरोद पर ज़रीन दारूवाला और सितार पर जयराम आचार्य थे.

अगर आप सोच रहे हैं कि सिर्फ संगीतकार ही भारतीय शास्त्रीय संगीत से प्रेरणा लेते हैं तो ये पूरा सच भी नहीं है.

इसी फिल्म ‘आंधी’ का एक दूसरा गाना है ‘तेरे बिना जिन्दगी से कोई, शिकवा तो नहीं…’. उसे भी गुलज़ार ने ही लिखा है. गुलज़ार ने इस गाने को लिखने के लिए एक बांग्ला गाना सुना. दुर्गा पूजा में गाया बजाया जाने वाला एक गीत होता है ‘जेते जेते पोथो होलो’. इसकी के बोल के आस पास का का गीत हिंदी में गुलज़ार ने लिखा और लता मंगेशकर, किशोर कुमार ने इसे फिल्म में गाया है.

तो जैसा कि पिछले लेख में लिखा था कि कैसेट के युग में भारतीय फ़िल्मी संगीत पर आधारित पैरोडी से भजन बनाए जाने लगे थे, उसका उल्टा भी भारत में होता है. भजन पर आधारित फ़िल्मी गाने भी बने हैं, जिनके बारे में जो सच है वो जरा कम कहा-सुना जाता है.

बाकी ‘आंधी’ फ़िल्म की याद इसलिए भी आई क्योंकि ये एक होटल मैनेजर और उसे छोड़ कर राजनीतिज्ञ बन गई उसकी पत्नी की कहानी थी जो अज्ञात कारणों से लोकतांत्रिक राजवंश को पसंद नहीं आई थी.

सुना है राजवंश को फिर से कोई फिल्म पसंद नहीं आई है, मगर विवाद से प्रचार ज्यादा मिल जाएगा. राजवंश फिल्म पर चुप है, हाँ उनके पाले श्वान दल के भौंकने की आवाजें रह रह कर आती हैं.

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