अभिव्यक्ति डॉक्टर अव्यक्त की : अखबारवाला बच्चा

जब मैं रोज़ अपने बच्चों को बैडमिंटन कोर्ट या स्विमिंग पुल ले जाता हूँ शाम को, तब जबलपुर की हर रेड लाइट पर आजकल 10 से 14 वर्ष के बच्चे लाल टी शर्ट पहने एक अख़बार बेचते मिल जाते हैं.

इन अख़बारों में कभी बाल मजदूरी पर कोई रिपोर्ट भी मिल जायेगी. कार के कांच को खटखटा रहे लगभग 11 वर्ष के उम्र के एक बच्चे को मैंने देखा, उसकी उम्र मेरे बड़े बच्चे जितनी ही तो थी.

हाँ ये शाम वही जो मेरे बेटों के सीखने और खेलने के लिए थी, उसके लिए यही शाम, रोज़ रेडलाइट की कारों की भीड़ के बीच. जहाँ मैं उसी उम्र के मेरे बच्चे को, मेरा हाथ पकड़े बिना चलने नहीं देता. रोड पार नहीं करने देता. वहीं वो उस बेतरतीब ट्रैफिक वाली रेडलाइट में भागता यहाँ से वहां.

मैंने उससे पूछा “कितने पैसे मिलते हैं तुम्हें?”

उसने कहा “30 रु”.

मैंने कहा कितनी देर के, उसने कहा जब तक पूरे अख़बार न बिक जाएँ.

कितनी देर लगती है इसमें?

दोपहर 2 से 8 बज जाते हैं?

स्कूल जाते हो??

हाँ.

मैं 2 रूपये change ढूंढ…. एक अख़बार खरीद चला गया था हरी बत्ती होते ही.

मेरे बड़े बेटे ने कहा….

“पापा आपको ज़्यादा अख़बार खरीदने थे उसके ज़ल्दी ख़त्म हो जाते… वो पढाई भी कर पाता. यदि उसकी जगह मैं बेच रहा होता तो आप क्या करते?”

इस वाक्य कि मैं बेच रहा होता तो क्या करते?? में कुछ था…..
कभी कभी हम बड़े असंवेदनशील हो जाते हैं, रोज़ रोज़ के दुःख देख. लेकिन बच्चों के लिए ये नया होता है और वो अनजाने ही हमें कुछ दे जाते हैं.

अब मैं उस बच्चे को रोज़ उस रेडलाइट पर ढूंढता हूँ. लेकिन वो नहीं मिलता…

इस ट्रैफिक में उसे कुछ हो गया हो तो खबर थोड़े न बनेगी अखबार की, फिर कैसे मिलेगा वो मेरा एक और सही का हीरो.

मुझे दिखता है कारों के कांच खटखटाते, लाल टी शर्ट में मेरा बेटा अंश दो रूपये के अख़बार को खरीदने की मिन्नतें करते. इस कार से उस कार, इस बाइक से उस बाइक तक दौड़ते. झिड़की खाते. आँखों में हर अख़बार के बिकने न बिकने से जीत और हार महसूस करते. हाँ वो हमारे ही बच्चे हैं.

देख कर देखो आप सबको भी आपके बच्चे ऐसा करते दिखेंगे.. 30 रूपये रोज़ कमाते.

हमारे बच्चे यूँ क्यों भटकते हैं, क्या वो आज़ाद हैं सही मायनों में? क्या भारत इतना गरीब है अब भी कि अपने बच्चों का ख्याल न रख सके?

तब तक खरीदना ही होंगे ये अख़बार जिनमें छपती हैं बाल मज़दूरी की ख़बरें, जब तक हम इन हालातों को नहीं बदल लेते, खरीदते रहना होंगे अखबार. हाँ ये न तो समाधान है, न महानता लेकिन बस यही कर सकता है एक आम आदमी कि खरीद ले कुछ ज़्यादा अखबार, हाँ अपने ही बच्चों से.

सोचो क्यों थोड़े से अख़बार, 6 घंटे ले लेते हैं इन नन्हें हाथों से बिकने में.

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