श्रापित नहीं तुम शक्ति हो, संजीवन की अभिव्यक्ति हो

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Painting - Nisha Tripathi

श्रापित नहीं तुम शक्ति हो
संजीवन की अभिव्यक्ति हो।।

माना कई षड्यंत्र सहे हैं
जीवन पूर्व मृत्युयंत्र सहे हैं
जन्म पर तेरे मिष्ठान्न नहीं बंटते,
जननी को देखा पारितोष में पिटते,
शोक मनाते लोग भी देखे
असाध्य सोच के रोग भी देखे,
फिर भी तुम “कृष्ण” को बचाने की युक्ति हो
श्रापित नहीं तुम शक्ति हो
संजीवन की अभिव्यक्ति हो ।।

माना बचपन भय से गुजरा
कुत्सित कामसर्पो का खतरा
श्रम का तुम्हारे नापन दोगला
गुणों-अवगुणों का मापन दोगला
अपने ही करते व्यापक भेदभाव
गुणों से नहीं चर्म से मोलभाव
फिर भी जनक के शिव धनुष को वरति हो
श्रापित नहीं तुम शक्ति हो,
संजीवन की अभिव्यक्ति हो ।।

यौवन काल सर्वाधिक घातक
पग पग भेष बदल फिर रहे पातक
प्रेम के नाम पर काम से पोषित
श्रेष्ठ सृजन को करने शोषित
दोहरेपन के वस्त्रों से आवृत
केवल रसपान करने को उद्द्यत
फिर भी राधा बन कृष्ण हृदय वसति हो
श्रापित नहीं तुम शक्ति हो ,
संजीवन की अभिव्यक्ति हो ।।

श्रेष्ठ जनकगृह तजकर आती
प्रिय के घर को अपना बनाती
उनके वंश के सृजन को धरती
पालन पोषण स्वरूपण करती
अवांछित खल अनंगों से अड़ती
अनिष्ट अशुभ प्रसंगों से लड़ती
राजसुख छोड़ जानकी बन राम संग वन में रहती हो

श्रापित नहीं तुम शक्ति हो
संजीवन की अभिव्यक्ति हो ।।

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