दोस्तों! अब मुख्य धारा में रहना, जीना सीख लेना चाहिए

हमारे कुछ मुस्लिम दोस्त हैं जो कुतर्क के ढेर सारे अमरुद बेहिसाब खाते जा रहे हैं. उन को गुमान बहुत है कि मुसलमानों ने इस देश को बहुत कुछ दिया है. और इस अंदाज़ में कह रहे हैं गोया वह अभी भी अरब में रह रहे हों, भारत में नहीं. जैसे मुगलों ने भारत को भाई चारा नहीं, कोई बख्शीश दी हो. आदि-आदि. गोया मुगल न आए होते तो भारत यतीम ही बना रहता. मुगलों ने भारत आ कर भारत को सोने की चिड़िया बना दिया, वगैरह कुतर्क और तथ्यों से विपरीत बातें उन की जुबान में भरी पड़ी हैं.

उन से कहना चाहता हूं कि पहले तो अपने को भारतीय समझ लीजिए. फिर इतिहास को ज़रा पलट लीजिए. पलटेंगे तो जानेंगे कि भारत सोने की चिड़िया मुगलों के आने के पहले था. ब्रिटिशर्स यहां व्यापारी बन कर आए थे लेकिन मुगल तो सीधे-सीधे आक्रमणकारी बन कर आए थे. सोने की चिड़िया को लूट लिया. जाने कितने मंदिर लूटे और तोड़े बारंबार. समृद्धि, सुख-चैन लूट लिया. उन का आक्रमणकारी और लुटेरा रुप अभी भी उन से विदा नहीं हुआ है.

मुसलमान अभी भी अपने को यहां का नागरिक नहीं समझते. भले किसी गैराज में कार धोते हों, मैकेनिक हों, किसी ट्रक पर खलासी हों, कहीं चाय बेचते हों. कहीं अफसर हों, इंजीनियर हों, अध्यापक हों या कुछ और सही, पर समझते हैं अपने को रूलर ही. राहत इंदौरी जैसे शायर इसी गुमान में लिखते हैं, ‘कब्रों की जमीनें दे कर हमें मत बहलाइये / राजधानी दी थी राजधानी चाहिए.’

हां रहन सहन भी, खान पान में भी योगदान ज़रूर है. रोटियां कई तरह की ले आए. मसाला आदि लाए, साथ में गाय का मांस खाने की ज़िद भी लाए. औरतों को खेती समझने की समझ, तीन तलाक का कुतर्क आदि ले आए. मज़हबी झगड़ा ले आए. जबरिया धर्म परिवर्तन का फसाद ले आए. भाई को मार कर, पिता को कैद कर राज करने की तरकीब ले आए.

अभी भी पूरी दुनिया को जहन्नुम के एटम बम पर बिठा दिया है, मनुष्यता को सलीब पर टांग दिया है. फिर भी कुतर्क भरा गुमान है कि भारत को बहुत कुछ दिया है तो आप की इस खुशफहमी का, मैं तो क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता. यह गुमान आप को मुबारक. लेकिन आप यह तय ज़रूर कर लीजिए कि आप की यह चिढ़ सिर्फ़ संघियों, भाजपाईयों और गांधी के हत्यारों से ही है या समूची मनुष्यता से है?

आप के रोल माडल आखिर बिन लादेन, बगदादी, बुरहान वानी या ज़ाकिर नाईक जैसे हरामखोर आतंकवादी ही क्यों हो गए हैं? उन के लिए आप छाती क्यों पीट रहे हैं भला? सीमांत गांधी, ज़ाकिर हुसैन, ए पी जे अब्दुल कलाम या वीर हामिद जैसे नायक लोग कहां बिला गए आप की जिंदगी से. क्यों बिला गए?

और कि आप के भीतर से कोई बड़ा राजनीतिक क्यों नहीं निकल पाया? आख़िर कभी कांग्रेस, कभी मुलायम, कभी लालू आदि के अर्दली और मिरासी बन कर ही मुस्लिम राजनीति संभव क्यों बन पा रही है?

अभी भी चेत जाईए, इंसान बन लीजिए, पहले फिर मुसलमान भी बन लीजिएगा. शांति कायम रहेगी तभी हम-आप इस तरह विमर्श कर सकेंगे. सहमति या असहमति जता सकेंगे एक-दूसरे से. बम फोड़ कर, पत्थर फोड़ कर, किसी का गला रेत कर नहीं, किसी मासूम पर ट्रक चढ़ा कर नहीं.

अगर मैं यह कहता हूं कि देश के मुसलमान सिर्फ़ मुसलमान नहीं, देश के समझदार नागरिक बन कर रहना सीखें तो इस में नासमझी कहां से आ गई भला? ग़लत क्या है भाई? आख़िर देश में और भी अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हैं. सिख हैं, ईसाई हैं, बौद्ध हैं, जैन हैं, पारसी हैं. आख़िर इन लोगों को कोई मुश्किल क्यों नहीं होती? इस लिए कि यह लोग देश में समझदार नागरिक की तरह मुख्य धारा में रहते हैं. न इन को किसी से तकलीफ होती है, न इन से किसी को तकलीफ होती है. हमारे मुस्लिम दोस्तों को भी मुख्य धारा में रहना, जीना सीख लेना चाहिए.

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