गोरखों यानी गो-रक्षकों के राज्य के बारे में चुप क्यों मोदी?

‘गोरखा’ शब्द का तत्सम रूप होता है ‘गो-रक्षा’… और गोरखालैंड का मतलब होता है गोरखों की धरती… यानी गो-रक्षकों की धरती.

पश्चिम बंगाल राज्य के सुदूर उत्तर के पर्वतीय इलाकों में रहने वाले गोरखा हिन्दुओं की बदकिस्मती ये है कि ये मुसलमान नहीं हैं… और यही वजह है कि आज गोरखालैंड जल रहा है और ममता बनर्जी आग में घी डाल रही है. बंगला भाषा को जबरन गोरखों पर थोपने से उठे विवाद ने अब अलग राज्य बनाने की पुरानी मांग के घाव को ताजा कर दिया है.

गोरखा समाज के लोग निडर, पराक्रमी, देशभक्त और धर्मनिष्ठ होते हैं… दार्जिलिंग के आसपास के इलाकों में रहने वाले गोरखे सौ वर्षों से अधिक समय से अपने लिए एक अलग राज्य की माँग कर रहे हैं… लेकिन ना तो राज्य की किसी सरकार ने और ना ही केंद्र की किसी सरकार ने उनकी बात सुनी.

जब गोरखा लोग कलकत्ते या देश के किसी अन्य शहरों में जाकर वेटर या दरबानी का काम करते हैं तो लोग उन्हें ‘नेपाली’ कहकर बुलाते हैं. ऐसे में इनका हृदय व्यथित हो उठता है, और तब ये कहते हैं कि – “ओ स्साब जी हम नेपाल के नहीं हैं, हम तो खाँटी भारतीय हैं बिलकुल आपकी तरह.”

अब अगला इन्हें हैरान होकर देखता है और यकीन नहीं कर पाता है कि ये हमारे ही देश के नागरिक हैं. देश की राजनीति में इनका महत्व ज्यादा नहीं है इसलिए ये उपेक्षित हैं, इनकी माँग अनसुनी की जा रही है.

कहते हैं कि रोम जल रहा था और नीरो बांसुरी बजा रहा था… पर यहाँ एक नहीं बल्कि दो नीरो हैं… पहली पश्चिम बंगाल सरकार और दूसरी केंद्र सरकार.

अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान के लिए लड़ने वाले… बंगाल में स्वयं को उपेक्षित महसूस करने वाले गोरखों के बारे में कोई चर्चा नहीं करना चाहता है… उनकी आवाज़ उठाने वाले कितने लोग हैं सोशल मीडिया या मेन स्ट्रीम मीडिया में?

बंगाल सरकार में इन्हें ना तो नौकरी मिलती है, ना ही शिक्षा की उचित सुविधा है. यदि आप बंगाल के एकमात्र हिल स्टेशन दार्जिलिंग जाएँगे जो कि इन्हीं की धरती है, तो इन्हें या तो सेवक के रूप में या छोटे मोटे कामों में संलिप्त पाएँगे… चाय बागानों में पत्तियाँ तोड़ते पाएँगे, फुटपाथ पर दुकान लगाए हुए पाएँगे.

इनके नाम पर भारत सरकार ने गोरखा रेजिमेंट और गोरखा रायफल्स बनायी ज़रूर है पर यह हैसियत इनकी बहादुरी और ईमानदारी की वजह से मिली है. देश की रक्षा करने में सबसे आगे रहने वाले और मौत से ना डरने वाले सैनिक के रूप में इन्हें कौन नहीं जानता है?

अँगरेजों ने हिटलर के खिलाफ लड़ने के लिए गोरखा रायफल्स के सैनिकों का ही चुनाव किया था… हिटलर के सैनिकों के दाँत खट्टे करने वाले गोरखा जवानों को अँगरेजों ने भी कई पुरस्कारों से नवाज़ा था.

गोरखालैंड की माँग करते-करते GNLF (गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट) के नेता सुभाष घीसिंग की एड़ियाँ घिस गई, मर गए बेचारे. आज उनकी पार्टी को कमजोर करके ममता बनर्जी ने अपना सहयोगी बना रखा है.

अब अलग राज्य की माँग करने वाली GJM (गोरखा जनमुक्ति मोर्चा) है, जिसके नेता बिमल गुरूंग हैं जो अलग राज्य की माँग के लिए आंदोलन चला रहे हैं.. आज उसी आंदोलन की धमक सुनी जा रही है, वहाँ के लोगों ने इसे करो या मरो की स्थिति बना दिया है.

दार्जीलिंग के सांसद एस एस अहुलवालिया हैं, जो भाजपा से हैं. GJM पार्टी के समर्थन से वो सांसद बने हैं. अपने क्षेत्र के लोगों की भावनाओं को सरकार तक क्यों नहीं पहुँचा रहे हैं, ये बात भलीभाँति समझ में आ रही है.

पश्चिम बंगाल को विभाजित करने का जोखिम कोई पार्टी नहीं लेना चाहती है क्योंकि इस विभाजन को बंगालियों की मंजूरी नहीं मिलेगी. राज्य और केन्द्र, दोनों सरकारों को पता है कि यह माँग जायज है परंतु राजनैतिक हानि कौन सहे?

बंगाल के लोग विभाजन के खिलाफ हैं, वैसे भी अपने राज्य का बँटवारा कौन चाहता है? बंगाल के चुनाव सिर पर हैं… भाजपा और ममता दोनों मैदान में हैं इसलिए दोनों ही गोरखालैंड की माँग को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल रहे हैं.

और कितना जलेगा गोरखालैंड? हजारों लोगों ने अपनी आहुति दी है अलग राज्य के लिए. झारखंड, तेलंगाना, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ जब राज्य बन गये तो गोरखालैंड क्यों नहीं?

मोदी जी आप कुछ क्यों नहीं कहते गोरखालैंड के बारे में… गो-रक्षकों के राज्य के बारे में?

प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ में बूढ़ी खाला अंत में जुम्मन मियाँ से कहती है – बेटा, बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात न कहोगे?

तो आप भी कुछ कहिए मोदी जी.

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