पैसों के जादूगरों से सिर्फ एक सवाल, कैसे आती है मात्र दस-बीस साल में करोड़ों की संपत्ति

लालू भ्रष्टाचार में डूबे होने के बाद भी भारत की राजनीति में क्यों और कैसे फलते-फूलते रहते हैं? सच पूछें तो हारवर्ड-केम्ब्रिज में इस पर पीएचडी होनी चाहिए. जहां एक्सपर्ट के रूप में लालू-मुलायम जैसे राजनीतिक खानदान के किसी भी सदस्य को बुलाया जा सकता है. जयललिता नहीं रहीं वरना वो भी बुलाई जा सकती थीं. वैसे तो माया मैडम भी कम अनुभवी नहीं.

अंत में भारत में गांधी परिवार तो फिर है ही. इनके पास तो चार पीढ़ियों का खानदानी अनुभव है. इस परिवार का अगर कोई भी गाइड कर दे तो डिग्री स्वर्णाक्षरों से लिखी मिलेगी.

इन सब के पास इतिहास रचने का एक मौका है, अगर इनमें से कोई भी अपने सत्य और तथ्य को खोल कर रख दे तो इनके अनुभव का वो ज्ञान (?) बरसेगा जो वेद और गीता भी नहीं दे सकते.

यह सच में आश्चर्य है कि आखिरकार कैसे एक झोपड़ी में रहने वाला इनका समर्थक भी इनके महलों को देख कर कोई सवाल नहीं करता? घनघोर आश्चर्य तब होता है जब एक पढ़ा लिखा युवक भी किसी राजनेता के अनपढ़ गंवार बेटे के पीछे हो लेता है.

इस सवाल का कोई जवाब नहीं मिलता कि मैले कुचले कपड़े में लिपटे समर्थक की आँखे हेलीकॉप्टर में उड़ने वाले अपने खानदानी नेता के सफ़ेद कुर्ता की चमक से क्यों नहीं चुंधियाती?

उपरोक्त सवालों से मैं जूझता ही रहता हूँ कि आज एक मित्र की टिप्पणी ने मुझे हैरान किया था. वे लिखते हैं कि लालू प्रसाद का सामाजिक न्याय आन्दोलन में जो योगदान है, उसे भुलाया जाना असम्भव है.

मैं तब से अब तक लालू के योगदान को ढूंढ रहा हूँ. अपने बाद राबड़ी, फिर तेजस्वी को आगे करने में कौन सा सामाजिक न्याय है, मैं अब तक समझने की कोशिश कर रहा हूँ. यह तो उलटे अन्याय का प्रतीक है.

हैरान इसलिए हुआ था कि मित्र कोई सामान्य व्यक्ति नहीं, बल्कि एक बुद्धिजीवी हैं. शायद एक अंगूठा छाप भी इस अन्याय को समझ जाये मगर भारत के अनेक बुद्धिजीवी इसके लिए तैयार नहीं. यह दुनिया के आठवें आश्चर्य से कम नहीं.

बहरहाल मेरे बुद्धिजीवी मित्र अगर यदुवंशी होते तो एक बार उनकी बात समझी भी जा सकती थी. क्योंकि जातिवाद के रोगाणु हिन्दुस्तान में विशेष रूप से पाए जाते हैं. इसका कोई टीका अब तक नहीं बना, ना ही कोई एंटीबायोटिक खोजा गया है. यह बीमारी इतनी गंभीर है कि जन्म लेते के साथ हरेक में कम या ज्यादा पायी जाती है.

इस बीमारी का पहला लक्षण है की किसी को भी कोई भी अपनी जाति का मिल जाए या बिना मिले उसका नाम सुन कर भी एक विशेष किस्म का हार्मोन फूटने लगता है, और व्यक्ति अपने जातभाई का अंधभक्त हो जाता है.

हो सकता है मित्र को एक दूसरी बीमारी ने जकड़ रखा हो. आजकल बुद्धिजीवियों में यह बीमारी तेजी से फ़ैल रही है. उस बीमारी का नाम है मोदी अंध विरोध. इसमें आदमी अंधे के साथ बहरा और साथ ही बुद्धिहीन भी हो जाता है.

ऐसा आदमी हर काम करने के लिए तैयार हो जाता है, किसी को भी पसंद कर सकता है, एकमात्र शर्त है कि वो मोदी विरोधी हो. फिर चाहे वो विरोधी अपराधी हो, भ्रष्टाचारी हो, मंद बुद्धि हो, देशद्रोही हो, असामाजिक हो.

वैसे इन सब के बीच मैंने मित्र से एक सवाल पूछ ही लिया कि क्या किसी अपराधी को इसलिए छोड़ देना चाहिए कि उसने सामाजिक काम किया है?

मेरे सवाल का सीधा-सीधा जवाब तो नहीं दिया गया मगर किन्तु-परन्तु में बहुत कुछ कहा गया. साथ ही मित्र सवाल करता है कि भारतीय राजनीति में लालू अकेले व्यक्ति नहीं हैं जिनके पास आय से अधिक सम्पत्ति है. फिर हमला सिर्फ लालू पर क्यों?

कितना हास्यास्पद है यह तर्क. क्या किसी अपराधी पर तब तक कार्यवाही नहीं करनी चाहिए जब तक सब अपराधी एक साथ ना पकडे जाएँ? वैसे यही तर्क शायद राजा, चौटाला और जयललिता आदि के समर्थको ने भी दिया होगा. अब मित्र को कौन समझाये कि समर्थकों के इसी किन्तु-परन्तु और कुतर्क से नेताओं को राजनीतिक जीवनदान मिलता है.

लालू संस के द्वारा मूंछ पर ताव देकर कहा जा रहा है कि जब का यह भ्रष्टाचार दिखाया जा रहा है तब तो उनकी मूंछ भी नहीं आयी थी. उनके इस बेहूदे कुतर्क को सुन कर भी उनके समर्थक ताली पीट रहे हैं. पता नहीं किस सिब्बल ने बिहार के युवराज से कह दिया है कि 18 वर्ष से कम आयु में भ्रष्टाचार करने पर बाल अपराध की तरह से छूट मिलती है.

अंत में, मैं पैसे के इन महान जादूगरों से सीधे-सीधे सिर्फ एक सवाल पूछने की इजाजत चाहता हूँ कि मात्र दस-बीस साल में करोड़ों-करोड़ों की संपत्ति इनके पास आयी कैसे? कृपया बताये, जिससे मैं किसी विश्वविद्यालय में इस पर शोध पत्र लिख कर नोबल प्राइज़ जीत सकूं.

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