सिनेमा के बहाने : यथार्थ और स्वप्न की यात्रा करता वोंग कार वाई का सिनेमा

वोंग कार वाई का सिनेमा आँख की कोर में अटके और ज़ेहन में भीतर तक दबे यथार्थ और स्वप्न का सिनेमा है. यूं किसी भी कलाकार को कोई भी विशेषण और बयानों में परिभाषित नहीं किया जा सकता और एक तरह से यह कला जैसे ‘इंटरप्रिटेटिव’ माध्यम के लिए और भी सही नहीं है.

फिर भी एक सामान्य और मोटे अर्थ के आसपास पहुँचने पर हम बहुत आसानी से उस असर तक पहुँच सकते हैं, जहां से एक गूढ़ रचना का रस लिया जा सकता है. वोंग कार वाई उसी श्रेणी के निर्देशक हैं जिनकी फ़िल्मों में किस्सागोई की बहुत गुंजाइश न होने के बाद भी ‘इमोशन’ की कई सतहें और स्तर हैं और जहां बहुत आसानी से पहुंचा नहीं जा सकता.

मैं ये बात यूं ही नहीं लिख रहा. इसके लिए भी कई रातें और बहुत से पल ख़राब हुए हैं जब वोंग कार वाई के सिनेमा ने परेशान किया है. फिर भी सिनेमा के प्रेम और उसके संसार में डूबने के मज़े ने थोड़ा बहुत यहाँ तक पहुंचाया जहां से वोंग कार वाई का सिनेमा कुछ-कुछ समझ आता है. वोंग कार वाई की फ़िल्में देखने के बाद यह असर और अनुभव हर उस दर्शक का होगा कि वे नाटकीयता को दर्शाने के मास्टर हैं.

उनका नायक प्रेम में डूबा हुआ है और मानव मन की फ़ितरत की ही तरह उस किरदार का अगला क़दम अनिश्चित है. अभिनेता के किरदार में प्रवेश करने की कई तकनीकों में ‘मैथड’ एक स्वीकार्य प्रैक्टिस है. और उसके कई प्रैक्टिशनर भी यही मानते हैं कि जब इंसान की ही फ़ितरत का अंदाजा लगाना मुश्किल है तो किरदार में उसे कैसे ढूंढा जा सकता है या प्रयुक्त किया जा सकता है. बस यही ‘इंपल्सिव नेचर’ या व्यवहार की आवेगात्मकता वोंग कार वाई के सिनेमा का प्रवेश द्वार है.

किरदार की ही तरह कहानी का बहाव है जो कहीं गल्प (विवरण) से विमुख है तो कहीं उसके आसपास तो कहीं अवचेतन का हिस्सा और कहीं दूर तक लक्षित. पर वोंग कार वाई का सिनेमा एक बड़े फ़लक पर फैला है और समय की अवधि में लगभग तीस साल की यात्रा कर चुका है. ज़ाहिर है, वोंग का नाम और काम किसी परिचय का मोहताज नहीं. दो दिन बाद इसी महीने की सत्रह तारीख को पड़ने वाले जन्मदिन की तारीख़ का संयोग उनके काम पर कुछ चर्चा का बहाना है.

चीन के शंघाई में 1958 में जन्मे और हाँगकाँग में पले-बढ़े वोंग कार वाई सिनेमा विधा के महत्त्वपूर्ण निर्देशकों में से एक हैं. वोंग के सिनेमा को पसंद करने वालों के लिए उनके बचपन और शुरुआती दिनों को जानना ज़रूरी है, जहां उनकी फ़िल्मों के रहस्य मौजूद हैं.

राजनीतिक रूप से यह समय माओ त्से तुंग की माओ विचारधारा को लागू करने वाली सांस्कृतिक क्रांति का समय था जिसने चीन की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक हालत को बुरी तरह अस्थिर किया था. ऐसे में अपने माता-पिता के साथ वोंग कार वाई ने हाँगकाँग में जो अकेलापन जिया उसने उन्हें किताबों और सिनेमा का मुरीद बना दिया. बचपन की यही स्मृतियाँ वोंग कार वाई के अवचेतन में आगे तक साथ आई और उनकी कई फ़िल्मों में वही साठ का दशक और हाँगकाँग मुख्य किरदार की तरह रहे.

किताबों का ज़िक्र एक और तरह से भी ज़रूरी है और वो है साहित्य का वह बहाव जिसकी कहानियां, कल्पनाशक्ति, भाषा, विस्तार और अर्थपूर्ण संयोजन साहित्य को वो दर्जा दिलाते हैं जहां उसका रचा जाना काल का अतिक्रमण कर जाना है. स्मृतियों का यही कोना और कल्पना का फैलाव वोंग कार वाई के सिनेमा को अलग तरह से खड़ा करता है जिसकी बुनियाद में कई लेखक और उनके विचार शामिल हैं.

यहाँ से हम वोंग कार वाई की फ़िल्मों को अब थोड़ा-बहुत समझ सकते हैं. मन के भीतर दबे संवेदनाओं के इन्हीं कारकों ने उनकी फ़िल्मों को देश-दुनिया तक पहुंचाया पर वोंग कार वाई का कमाल केवल यही नहीं. आकल्पन की एक बेहद अलग आँख ने सिनेमाई शैली में दृश्य को क़ैद करने की जो परिभाषा गढ़ी वो अनोखी है. दृश्यांकन से लेकर एडिटिंग और बैकग्राउंड का प्रभाव क्या होगा, इसका अनुमान कर पाना उनके लिए भी आसान नहीं.

यहीं तात्कालिकता काम करती है जब असल ज़िंदगी की तरह उनके अभिनेता भी केवल लिखे हुए दृश्य के विवरण के आसपास अपनी तरह से किरदार में उतरते हैं. यही ‘स्टाइल’ वोंग कार वाई की पहचान है. न तो दृश्यबंध और न ही पेशेवर तरीके से लिखी हुई स्क्रिप्ट. अभिनेता के लिए किरदार को अपनी तरह से पेश करने की आज़ादी और प्रयोग के लिए फिल्मांकन में भी कोई ‘शॉट डिसक्रिप्शन’ नहीं. इसलिए भी वोंग कार वाई कई बार ख़र्चीले फ़िल्मकार की तरह पुकारे जाते हैं.

एक कलाकार की मनमौजी और स्वच्छंदता को अपनी तरह से जीने और अपने ‘मीडियम’ से खेलने की यही आज़ादी उनकी फ़िल्मों की ताक़त है. यहाँ पर उनके संबंध और रिश्तों की गरमाहट भी काम करती है जब टोनी लुंग (अभिनेता), क्रिस्टोफर डॉयल (छायाकार), विलियम चैंग (प्रोडक्शन डिज़ाइनर) और जैफरी लाउ (लेखक) उनकी अधिकतर फ़िल्मों का हिस्सा रहते हैं. वहीं मैगी चुँग, चांग चैन, लेज़ली चुँग, जैकी चुँग जैसे अभिनेता उनकी कई फ़िल्मों का स्वप्न रचते हैं. भावनाओं के ठोस धरातल वाले इन्हीं संबंधों ने वोंग कार वाई की कहने की आज़ादी को परदे पर अद्भुत रूप से साकार किया है.

अद्भुत नाटकीयता, अकेलापन, प्रेम, कहावतें, रहस्य, जीवन को बहुत दूर तक जानने की इच्छा, कल्पना और इन सबके प्रभाव का सम्मोहन वोंग कार वाई का सिनेमा है. अवचेतन की रहस्यात्मकता और समय के सांस्कृतिक बोध के साथ यह जिस शक्ल में आता है उसके सुरूर से बहुत जल्दी निकल पाना भी संभव नहीं.

पर जब तक वोंग कार वाई की कुछ फ़िल्मों का नाम हम न लें यह यात्रा पूरी नहीं होती. शुरुआत कहीं से भी की जा सकती है और उसके नशे में कहीं से भी गिरफ़्त हुआ जा सकता है. ‘एज़ टीयर्स गो बाय’, ‘डेज़ ऑफ बीइंग वाइल्ड’, ‘चुंकिंग एक्स्प्रेस’, ‘एशेज ऑफ टाइम’, ‘इन द मूड फॉर लव’, ‘2046’ आदि फ़िल्मों के रूप में वोंग कार वाई सिनेमा इतिहास के बड़े निर्देशक और फ़िल्मकार बतौर उपस्थित होते हैं.

‘इन द मूड फॉर लव’ को इनमें से बहुत आसानी से उनकी सिग्नेचर फ़िल्म कहा जा सकता है. साठ का दशक, हाँगकाँग की गलियों में टिफिन हाथ में लेकर चलती मैगी चुँग, रेस्त्रां और ऑफिस की मेज़ पर सिगरेट के धुएँ में बैठे टोनी लुंग, नीली रोशनी और बैकग्राउंड में बजता अद्भुत संगीत ….. दो अजनबियों की यह मुलाक़ात देखने पर धमनियों में अतिरेक और बेचैनी की तरह बहती है. उस पर यह मुलाक़ातें प्रेम की छटपटाहट, स्वीकार्यता और कहन के दरवाजे टटोलती हुई रिहर्सल की नाटकीयता और बारिश की फुहारों में मन को भिगोती है.

फ़िल्म के एक दृश्य में आए कमरा नंबर 2046 की याद आगे चलकर फ़िल्म ‘2046’ तक का सफ़र तय करती है. इतने सारे कहन के बाद भी वोंग कार वाई चीन की उस कहावत की तरह लगते हैं जिसमें किसी इच्छा को किसी पेड़ की खोखल में कह कर उसे हमेशा के लिए ढँक दिया जाता है. कहानी कहने के लिए समय के साथ वोंग कार वाई हमेशा पीछे की ओर जाते हैं, फिर उन कहानियों में विस्तार भी भीतरी होता है और अचानक वो समय से बहुत आगे खड़े दिखाई देते हैं. छूट गए प्रेम और साथ आई यादों वाला सिनेमा देखे जाने की गुहार कर रहा है!

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