व्यक्ति भले मर जाये, कभी नहीं मरती उसकी विचारधारा और DNA

व्यक्ति भले ही मर जाये पर उसकी विचारधारा और DNA कभी नहीं मरता. वह हमेशा जिंदा रहता है और समय-समय पर नये रूप और दूसरे रंग मे सामने आता है.

औरगंजेब आलमगीर 21 जुलाई 1658 को मुगल साम्राज्य का शासक बना था. शासन संभालते ही उसने काशी का विश्वनाथ मंदिर, मथुरा का केशवराय मंदिर और पाटन का सोमनाथ मंदिर ध्वस्त करवा दिये थे. 1669 में उसने सभी हिंदू मंदिरों और पाठशालाओं को तोड़ने का आदेश जारी किया. 1679 में उसने हिन्दुओं पर दोबारा जजिया कर लागू कर दिया … 1661से 1681 तक उसने बर्बरता पूर्वक जाट, सतनामियों, बुंदेलों, राजपूतों, सिखों और मराठों का दमन किया.

औरगंजेब ने हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिये एक अलग विभाग, जो शाहजहां ने आरंभ किया था, को और अधिक अधिकार सम्पन्न बनाया.

यही कारण है कि अकबर से भी अधिक विशाल साम्राज्य होने के बाद भी उसे इतिहास में अकबर जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं है और औरगंजेब का शासनकाल भारत में बर्बरता और धर्मान्धता का माना जाता है.

इतना सब होने के बाद औरगंजेब के शासन काल का सबसे हैरान करने वाला एक तथ्य यह है कि भारत में जितने भी मुगल शासक हुए उनके मुकाबले सबसे अधिक हिंदू मनसबदार और दरबारी औरगंजेब के दरबार में मे थे, अकबर से भी अधिक!

इतिहास पढ़ते हुए आश्चर्य होता है कि ये कैसे संभव है? और ये सच है तो वो हिंदू मनसबदार और दरबारी किस तरह की मिट्टी के बने हुए थे? उनका DNA कैसा रहा होगा? जो अपने ही देशवासियों और धर्मावलंबियों के विरोध में एक बर्बर और विदेशी शासक वंश का साथ दे रहे थे!
इतिहास को पढ़ते हुए इस यक्ष प्रश्न का सामना हर विद्यार्थी को करना पड़ता है.

पर पिछले तीन साल से हमारे देश में जिस तरह कभी असहिष्णुता, कभी पुरस्कार वापसी, कभी सर्जीकल स्ट्राईक कभी कश्मीर में पैलेट गन के उपयोग या आतंकी को जीप के आगे बांधने पर पर भारत के सेकुलर दल, मानवाधिकार आयोग और राजनेता जैसा शोर शराबा मचा रहे है, आतंकी की फांसी रुकवाने के लिये आधी रात को सुप्रीम कोर्ट खुलवा रहे हैं. और देश के बजाय वोटबैंक, तुष्टिकरण, पाकपरस्ती और आंतकियों की मौत पर विधवाविलाप कर रहे हैं.

उससे इतिहास की वह गुत्थी सुलझती दिख रही है कि औरगंजेब के दरबार मे वे हिंदू मनसबदार और दरबारी किस मिट्टी के बने थे और उनका चरित्र कैसा रहा होगा.

आज भी हमारे देश की राजनीति में औरगंजेब के हिंदू मनसबदारों और दरबारियों के वंशज मौजूद हैं पर आज वे किस नाम और संगठन के रूप में कायम हैं इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं.

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