बजने दो अब रणभेरी, तुम रणचंडी का आह्वान करो

आज एक बार फिर से दोहराना चाहूंगा अपने ही शब्द. स्मरण रहे कि इस बार स्वयं जनता “जनार्दन” पर प्रहार किया गया है. आस्था पर प्रहार किया गया है, अस्तित्व एवं धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रहार किया गया है.

आपके अपने शब्दो में भी प्रधान सेवक जी! यदि संविधान मूल मंत्र है, धर्मग्रंथ है, तो लोकतंत्र में जनता ही ” आराध्य परमेश्वर ” है. अपने आराध्य पर हुए इस अपमानजनक प्रहार का प्रतिशोध नही लेंगे आप?? दोषियों को दंडित नही करेंगे आप??

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बजने दो अब रणभेरी
तुम रणचंडी का आह्वान करो

दुष्टदलन को सज्जित होकर
काल भैरव का स्तुतगान करो

मत गिनो मृत्यु के कौरों को अब
समर प्रासंगिक गीता का सम्मान करो

गांडीव उठाओ पार्थ प्रथम अब
स्थगित विकास के सौपान करो

बुद्ध महावीर को भूलो कुछ दिन
बन महाकाल खलप्राण हरो

करो चिताभस्म से श्रृंगार अरि की
समर भयंकर धनु पिनाक शरसंधान करो

खोलो त्रिनेत्र अब तांडव करो हर
चंडीके अब हो प्रसन्न यथेष्ट रक्तपान करो

हिन्दू हृदय की सहज सौम्यता त्यागो
शोकरहित हो रक्षकों में अभिमान भरो

जा डटो वीर भूमि में कुछ दिन
सकल सैन्य संस्थानों में जान भरो

व्याकुल पांचजन्य अब वायु मांगे
शक्ति साधना अपरिहार्य अब ध्यान धरो

वाणी से नहीं फलता पौरुष
भव रणधीर अब रिपुदमन के अभियान करो

पुष्प नहीं होते अभीष्ट उत्सर्गियों को
अथाह अरि शोणित से उनका पिंडदान करो

हर वस्तु अवलंबित है कालगति पर
सृजन, विकास तज रणभूमि को प्रस्थान करो

धरो कवच! आभूषण तजकर नयनो में अब क्रोध भरो
किस उलझन में पड़े हो राजन! तत्काल कटी कृपाण धरो।।

बजने दो अब रणभेरी
तुम रणचंडी का आह्वान करो।।

“जब धर्म और अधर्म के बीच युद्ध हो रहा हो तब कुरुक्षेत्र ही सर्वोच्च तीर्थ होता है भ्राता बलभद्र।”

(योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दुर्योधन वध के समय बलराम जी से कहे गए अमर शब्द )

अमरनाथ के अमर प्राणोत्सर्गियों को भावपूरित श्रद्धांजलि. इस आशा के साथ कि “नरेंद्र” उनका पिंडदान शत्रुओं के धारोष्ण लहू से करेंगे.

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