बंगलादेशी मुसलमानों की बस्तियों को रातोंरात बंगाल की खाड़ी तक पहुँचाया जाए

बंगलादेशी दिल्ली तक पहुँच गए हैं. नोएडा में क्या हुआ आपको पता ही होगा. एक मेड, यानि साफ-सफ़ाई आदि करने वाली महिला, ज़ोहरा बीबी के साथ फ़्लैट मालिक ने मारपीट की, और बंधक बनाकर रखा. इल्ज़ाम चोरी का था. हालाँकि पुलिस खोजने गई तो तथाकथित बंधक इस बिल्डिंग को छोड़िए, एक अलग टावर में मिली.

फ़्लैट मालिक का कहना है कि उसने रूपए चुराए, और जब उन्होंने कहा कि वीडियो है उनके पास तो वो कहने लगी कि पगार से काट लेना. उसके बाद वो वहाँ से गई, और फोन वहीं छोड़ दिया. बाद में उसका पति आया और कहने लगा कि उसकी बीबी घर नहीं पहुँची, उसे गायब कर दिया आदि.

फिर वो पुलिस लेकर आया नयी कहानी के साथ. वो ये भी जानता था कि फोन इसी फ़्लैट में है, कैसे ये पता नहीं क्योंकि ज़ोहरा तो कई घरों में काम करती थी. फिर वो कहानी बनाने लगा कि मारपीट हुई, बंधक बना लिया, और अगले दिन सोसायटी को 300 लोग घेर लेते हैं!

इस बीच जो हुआ वो बहुत ज्यादा चौंकाने वाला नहीं है. 300 लोगों की भीड़ बग़ल से आ गई, और पत्थर, सरिया, कंक्रीट के टुकड़े आदि से पूरी सोसायटी पर हमला कर दिया. ज़ोहरा बीबी ने चोरी नहीं की होगी, उसके साथ सच में मारपीट हुई, उसको सच में बंधक बनाकर रखा, सब मानने लायक बातें हैं.

लेकिन जब वो बंधक थी तो ये भीड़ कैसे आई? जब वो बंधक ही थी, तो पुलिस को फोन क्यों नहीं किया? उसको पुलिस की जगह वैसे लोगों की ज़रूरत कैसे पड़ी जो दस मिनट में पूरी व्यवस्था के साथ एक सोसायटी को घेर लेते हैं? उसके समर्थन में इतने लोग कैसे जुटे?

मैं ये इसलिए पूछ रहा हूँ क्योंकि इस तरह की घटनाएँ आम हैं, लेकिन 300 की भीड़ आम नहीं होती. इसमें ट्विस्ट ये है कि ज़ोहरा बीबी बांग्लादेशी हैं, ऐसा इल्ज़ाम है. इस पर वो सीधा कहती है कि उसके पास काग़ज़ात हैं. काग़ज़ात होने का मतलब ही है कि ‘मैं जो थी, उससे मतलब नहीं है, मैं जो हूँ वो क्या हूँ, ये समझो.’

मेरे एक मित्र के यहाँ जो काम करती है वो भी ऐसी ही बंगलादेशी है. आप ज़ोहरा बीबी के समर्थन में उठे 300 लोगों की भीड़ को देखिए और याद कीजिए कि किस कामवाली के साथ हुए दुर्व्यवहार पर ये भीड़ उठी थी. याद नहीं आएगा. ये वही भीड़ है जो संख्या होने पर दूसरी बिरादरी, जमात और धर्म को कुचल कर आगे बढ़ जाती है.

इस भीड़ को बसने किसने दिया? उन्हीं पार्टियों ने जिनका परम्परागत वोट बैंक मुसलमानों का है. इनको ना सिर्फ लाया गया, बल्कि उन हिस्सों में बसाया गया जहाँ ये दंगे और चुनावों में बार-बार इस्तेमाल किए जा सकें.

ये भीड़ बंग्लादेशी होने से ज्यादा बंग्लादेशी मुसलमानों की है. ये अपने संगठित होने का प्रदर्शन करते हैं क्योंकि इन्हें लगता है कि इनके पक्ष में बोलने वाले अभी भी बचे हुए हैं. योगी की पुलिस को यहाँ पहुँचने में दो घंटे लग जाते हैं. पुलिस को दो घंटा कैसे लग जाता है ये सोचने की बात है! और आने पर भी तमाशा देखती रहती है. क्या इस भीड़ को कुचलने के संसाधन पुलिस के पास नहीं हैं?

आपके सामने इतनी बड़ी भीड़ एक सोसायटी पर हमला बोलती है, किसी के घर में घुसकर तोड़फोड़ मचाती है, और आपकी पुलिस खड़ी रह जाती है! यही कैराना में हुआ होगा, यही कश्मीर में हुआ होगा.

इन बंग्लादेशी परजीवियों की बस्तियों को पहचान कर, उन्हें यहाँ से निकाल फेंकना ज़रूरी है. नहीं तो ये तीन सौ से तीन हज़ार होते हुए बाकी लोगों का जीना हराम कर देंगे. इनके पास हारने को कुछ नहीं है, इनके पास वैसे भी कुछ नहीं है. ये आ गए हैं, और आपने इनका आधार कार्ड तक बना दिया है.

इस भीड़ की बस्ती साफ कर दी जानी चाहिए अगर वो इस देश की नहीं है. मेरी मानवता और संवेदना इन दरिंदों के लिए नहीं है जो ना तो इस देश के हैं, ना ही पुलिस के पास जाते हैं. मैं पत्थर लेकर चलती भीड़ पर ज़हरीली गैस छोड़ने के पक्ष में हूँ. इनके लिए मैं कभी भी संवेदनशील नहीं होना चाहता.

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