माल-असबाब से नहीं, शस्त्र से ही होगी परिवार और खुद की रक्षा

कुछ प्रश्न आप सब से, कृपया इस पर गहन विचार कीजिये. परिवार के लोगों, सम्बन्धियों, मित्रों, परिचितों से बात कीजिये. आप आरामदायक घर बनते हैं. फ़र्नीचर ख़रीदते हैं, मोटरसाइकिल-कार ख़रीदते हैं. डिनर-सैट, बर्तन, क़ालीन, आभूषण ख़रीदते हैं. प्लाट लेते हैं. फैक्ट्री लगते हैं. विवाह करते हैं. परिवार बढ़ाते हैं. यदि बुरा समय आया तो आपके पास परिवार, घर, फ़र्नीचर, मोटरसाइकिल-कार, डिनर-सैट, बर्तन, क़ालीन, आभूषण, फैक्ट्री की सुरक्षा की क्या व्यवस्था है?

ऐसा नहीं है कि राष्ट्र पर बुरा समय नहीं आया. पाकिस्तान, बांग्लादेश और अभी हाल ही में हम कश्मीर से मार कर निकाले गए हैं. ऐसा अवसर फिर आया तो आप अपनी व अपने परिवार की रक्षा घर, फ़र्नीचर, मोटरसाइकिल-कार, डिनर-सैट, बर्तन, क़ालीन, आभूषण, फैक्ट्री से करेंगे?

यह पंक्तियाँ मेरे एक पुराने लेख, डॉ नारंग, जो दिल्ली की एक कॉलोनी विकासपुरी में पिछले वर्ष बांग्लादेशी घुसपैठियों के हाथों मारे गए थे पर है, की हैं. स्वाभाविक है कि आपके मन में प्रश्न कौंधेगा कि पुराने लेख को दुबारा पोस्ट करने का कारण क्या है?

आज के दैनिक जागरण के नॉएडा संस्करण का कई कॉलम में छपा अच्छा बड़ा यह समाचार है. नॉएडा संस्करण अर्थात केवल नॉएडा में बाँटे जाने वाले पन्नों में यह समाचार ‘ऐसा लगा जैसे सोसायटी को ही बंधक बना लिया गया हो’ शीर्षक से छपा है.

यहाँ यह भी ध्यान देने की बात है कि इस समाचार को कथित रूप से हिंदूवादी समझे जाने वाले राष्ट्रीय जागरण, जिसके सम्पादक स्वर्गीय नरेंद्र मोहन भाजपा से सांसद रहे हैं, ने मुख्य समाचारपत्र में छापने योग्य समाचार नहीं माना. समाचारपत्र में छपे शब्द संक्षेप में इस प्रकार हैं :-

महागुण सोसायटी में काम करने वाली बांग्लादेशी लड़की पर मालकिन ने आरोप लगाया कि उसने घर से 17 हज़ार रुपये चुरा लिये हैं. डराने-धमकाने पर उसने 10 की चोरी स्वीकार भी कर ली. पहले वह वेतन से कटवाने के लिये कहने लगी और बाद में मौक़ा पा कर भाग गयी. सुबह 6 बजे सोसायटी को चार सौ से अधिक लोगों ने घेर लिया. देखते ही देखते भीड़ हज़ार से अधिक की हो गयी. भीड़ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी. मालकिन के मकान में जम कर तोड़फोड़ की गयी.

बुधवार की सुबह ज़िन्दगी भर ज़हन में रहेगी. सोसायटी के गेट पर हो रहे तांडव ने जो डर और दहशत लोगों के दिलों में भर दिया, उसे भुलाया नहीं जा सकता. बच्चों के चेहरों पर ख़ौफ़ देख ख़ुद की हिम्मत भी जवाब दे रही थी. ऐसा लग रहा था कि पूरी सोसायटी को हाइजैक (बंधक) कर लिया गया हो. न कोई अंदर जा सकता था न ही कोई बाहर. बच्चे स्कूल नहीं जा सके और न बड़े ऑफ़िस.

निवासियों का कहना है कि जो आतंक देखने को मिला उससे साफ़ है कि इन लोगों ने किस तरह अपना नैटवर्क फैला रखा है. इनमें से ज़्यादातर बांग्लादेश के निवासी हैं जो अवैध तरीक़े से यहाँ रह रहे हैं. इनकी मनमर्ज़ी और बदतमीज़ी की शिकायत पहले भी कई सैक्टरों और सोसायटी से आ चुकी है. इसे ले कर एसएसपी और ज़िलाधिकारी से मुलाक़ात की जायेगी.

देशवासियों! आपने अपनी सुरक्षा पुलिस के भरोसे छोड़ दी है. हमारे राज्य के पास राष्ट्र की आतंरिक सुरक्षा के लिये पर्याप्त बल नहीं है. किसी भी राज्य के पास राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा के लिये पर्याप्त बल कभी भी नहीं होता. आख़िर कोई राज्य अपने सौ करोड़ लोगों की रक्षा के लिये दस करोड़ का सैन्य बल नहीं बना सकता.

यदि कोई आंतरिक विप्लव हो तो समाज अर्थात राष्ट्र को ही उससे निबटना पड़ता है. राष्ट्र की रक्षा समाज के पौरुष पर ही निर्भर करती है. पता नहीं नॉएडा के सैक्टर 78 स्थित महागुण सोसायटी में रहने वाले परिवारों और उनके पड़ौसियों को ये पता है या नहीं कि संविधान हमें आत्मरक्षा में हमलावर के प्राण लेने की भी छूट देता है.

देशवासियों! इसके लिये घर में अस्त्र-शस्त्र चाहिए होते हैं. आपके पास तो नाख़ून भी नहीं हैं जिनसे नृसिंह अवतार की तरह राक्षस का पेट फाड़ा जा सके. क्या यह ठीक होगा कि हम सब नाख़ून बढ़ायें या फिर ऐसा किया जाये कि इस बार विजयदशमी पर व्यक्तिशः शस्त्र पूजन किया जाये. प्रत्येक हिन्दू अपने निजी शस्त्र का पूजन करे. 8 लोगों का परिवार है तो हर सदस्य अपने शस्त्र यानी अलग अलग आठ शस्त्रों का पूजन करे.

एक सार्वजनिक जानकारी देना उपयुक्त होगा. गुरुद्वारों में कृपाण की दुकानें होती हैं. वहां सर्वलौह नाम से खड्ग के बारे में पूछिए. यह ख़ालिस लोहे की लगभग 12 सौ से ले कर जितने में सौदा पट जाये, तक में बिना धार लगी मिलती है. अब एक प्रसिद्ध वाक्य और दुहराता चलूँ, ‘तुम वीर हो तो स्वाभाविक है कि वीरता दिखाओगे अगर नहीं हो तो उसका दिखावा करो’. बिल्कुल एक सा प्रभाव पड़ता है.

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