पढ़ना तो यही है : वृथा हठ ठानता है अभी तू धर्म को क्या जानता है?

महाभारत का युद्ध आपको शायद याद होगा. पढ़ते लिखते तो ख़ैर हम हिन्दू हैं नहीं. फिर भी बी.आर.चोपड़ा का धारावाहिक तो अधिकांश ने देखा ही होगा. अर्जुन मोटे तौर पर उसमें तीन बार फंसते हैं और फंसते इसलिए हैं क्योंकि वो “Secular” होते हैं. तीनों ही बार उनको “Communal” कृष्ण बचाते हैं.

पहली बार तब जब कुरुक्षेत्र में कौरव-पांडव की आमने सामने लगी सेना को देखकर अर्जुन के पाँव फूल जाते हैं. दूसरी बार तब जब पितामह भीष्म के ऊपर शिखंडी की ओट से पार्थ को बाण चलाने पड़े. और तीसरी बार तब जब कर्ण के रथ चक्र का अगला हिस्सा कींच में डूबा हुआ था. और उसे कर्ण के प्राण हरने थे. तीनों ही बार केशव ने अर्जुन को उसकी औक़ात बताई. उसकी इच्छा के विपरीत काम करवाया और कहा:-
“वृथा हठ ठानता है अभी तू धर्म को क्या जानता है?”……

अमरनाथ यात्रा के सात हिंदुओं को खोज कर जिहादी मोहमडन हलाक कर देते हैं. आपको कैसी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं:-

1. अनिल जनविजय (और उस जैसे सैकड़ों कौमी-वामी-कांग्रेसी आपको बताते हैं कि बस के यात्री शिवलिंग से मिलने जा रहे थे, सीधा शिव को मिल गए. वे यह भी बताते हैं कि आपको इस देश में सुरक्षा की आस नहीं करनी चाहिए अगर आप हिन्दू हैं तो, क्योंकि वे बस का नंबर, उसकी टाइमिंग, उसमें पड़े लोग और आगामी चुनाव तक पर बहस कर लेंगे. यह नहीं बताएंगे कि यह हत्या कांड मोहमडन्स ने किया है.

2. वे आपको बस का नाम खंगाल कर दे देंगे जो कि वास्तव का ड्राइवर है ही नहीं, वह हेल्पर यानी खलासी है. जो असल ड्राइवर है वह तीन गोलियाँ खाकर अस्पताल में बेसुध पड़ा है क्योंकि वह हिन्दू है.

3. आपको गंगा जमुनी तहजीब से लेकर अमरनाथ यात्रा के इन मोहमडन्स की कृपा पर निर्भर होने की कहानी बताई जाएगी. लेकिन सेक्युलर यह नहीं बताएंगे कि चालीस हजार सैनिक यात्रा की सुरक्षा में तैनात थे. कि जो मोहमडन इन जगहों पर मसीहा बन कर उभरते हैं उन्होंने दरअसल अपने गाँवों के सभी कश्मीरी हिंदुओं की हत्या कर दी. उन्हीं की जगह पर वो काबिज़ हैं. चार लाख कश्मीरी हिन्दू दुनिया के नक़्शे से मिटा दिए गए और आप सेक्युलरिज़्म का झुनझुना पकड़कर प्रसन्नचित्त बैठे हैं.

क्या करेंगे आप, केंद्र में 56 इंच की सरकार है. जम्मू कश्मीर में भी सरकार में साझेदारी है. फिर भी ये हो रहा है. जो प्रधानमंत्री एक झूठे दलित की आत्महत्या पर आँसू बहाता है. गौ रक्षकों पर तंज कसता है उसकी ज़बान को लकवा मार गया है. कहाँ जाएंगे आप, किससे अपनी शिकायत करेंगे, क्या कर्तव्य होगा आपका, शत्रु और मित्र की पहचान कैसे करेंगे?

एक किताब है जो आपको किसी भी पल, किसी भी सवाल का जवाब दे सकती है. यह किताब वह है जिसके इतने भाष्य, इतनी टीकाएँ हुई हैं कि मूल किताब को अब खोजना पड़ता है. आइंस्टाइन से लेकर गांधी तक इसके प्रेमी थे. मोरारजी से लेकर विनोबा तक, राहुल सांकृत्यायन से लेकर ओशो तक ने इस किताब को पढ़ा, फिर पढ़ा इसकी व्याख्या की और फिर इसे पढ़ा. हरेक का इस किताब के बारे में एक ही मत था.

मैं इस किताब के बारे में कुछ कहने का अधिकारी नहीं हूँ.”

इसके बाद पढ़ने को कुछ नहीं रह जाता. केवल गुनने को रह जाता है. मैं जब भी निराशा के गहन अंधकार में पड़ता हूँ तब इस किताब के किसी एक पन्ने पर हाथ रख देता हूँ, वहीं से मेरे सारे जवाब मिल जाते हैं. सात सौ के लगभग श्लोकों और अठारह अध्यायों में बंटी इस किताब का नाम है “श्रीमद्भगवद गीता”.

यह सम्पूर्ण है, अद्भुत है, अविश्वसनीय है और असंभव है. कोई किताब इतनी खूबसूरत कैसे हो सकती है? इसलिए कुछ पढ़ो या न पढ़ो…”गीता” जरूर पढ़ना.

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