काश सचमुच होता ‘भगवा आतंकवाद’ जैसा कुछ!

भारत का ही एक हिस्सा होता है असम. वहां का पिछला चुनाव तक बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरोध में लड़ा गया था. उस असम तक में मुहर्रम की छुट्टी होती है. दूसरी तरफ कश्मीर तो बाकी इस्लामिक मुल्कों जैसा ही है जहाँ शिया समुदाय को मुहर्रम मनाने की इजाज़त नहीं है. ये अगर आपकी कश्मीरियत है तो जनाब मुझे माफ़ कीजिये. शेखुलरिज्म नाम का टिन का चश्मा हमने नहीं पहना.

अरुणांचल के उन सीमावर्ती क्षेत्रों में जहाँ जाने के लिए सेना से विशेष रूप से इजाज़त लेनी पड़ती है, अलग से पास बनवाना पड़ता है बिलकुल पासपोर्ट-वीजा बनवाने की तरह वहां भी हिन्दुस्तानी अखबार मिलेंगे. कश्मीर में हिन्दुस्तानी अख़बारों पर विशेष प्रतिबन्ध है. अभिव्यक्ति को ऐसे कुचलना ही “कश्मीरियत” है तो मुझे माफ़ कीजिये. ऐसी किसी “कश्मीरियत” में मेरी कोई आस्था नहीं है.

इस्लामिक आतंकियों के नारों में मुझे साफ़ सुनाई देता है “आजादी का मतलब क्या? ला इलाहा इलअल्लाह!”. आप मुझे ये सुनने से इनकार करने कह रहे हैं तो हमें माफ़ करें. हमसे ना हो पायेगा. सद्भाव उनका इतना ही होता तो अलग झंडा, अलग संविधान चलाये नहीं घूमते.

पूरे देश में जहाँ वाल्मीकि समुदाय को आरक्षण देकर आगे लाने की कोशिश होती है, वहां कश्मीर वो इलाका है जहाँ ये समुदाय कानून बना कर सिर्फ मैला ढोने-साफ़ करने के लिए मजबूर किया गया है.

सांप्रदायिक सद्भाव अगर “कश्मीरियत” में रत्ती भर भी होता तो इतने मंदिर वहां टूट कैसे रहे हैं? किसी टूटे हुए मार्तंड सूर्य मंदिर में शैतानी नृत्य करता जब कोई भांड पैर पटकता है तो वो मेरी अस्मिता भी कुचलता है.

कब तक हम ये एकतरफा हमला झेलते रहें? किसी समुदाय से इसे नहीं जोड़ना है सुनने में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन चुन के हिन्दुओं का ही शिकार क्यों होता है वो भी बताते जाते!

आपने बरसों ‘भगवा आतंकवाद’ नाम के जिस झूठ का लांछन लगाया है, हमें अक्सर लगता है कि काश वो होता. वो किसी ख़ास मज़हब, किसी ख़ास रिलिजन, किसी एक समुदाय विशेष को चुनकर दर्ज़न भर औरतों, दस बारह निहत्थे लोगों को मार गिराता. फिर हम “आतंक का कोई धर्म नहीं होता” जैसे रटे रटाये संवाद और आपके शांति बनाए रखने का आह्वान सुनते. अफ़सोस कि ऐसा होता नहीं है क्योंकि हिंदुत्व आतंकवादी धर्म नहीं इसलिए कोई “भगवा आतंकवाद” होता ही नहीं.

दूसरी तरफ आपकी अमरनाथ यात्रा में जो होटलों का बिल होगा, बस-टैक्सी का किराया होगा, वहां की गई ख़रीददारी होगी, उस हर रुपये से ज़कात जाएगा. अपने ही तीर्थयात्रियों पर चलने वाली हर गोली की कीमत आपने अपने खून पसीने की कमाई से भरी है. हिरणों के झुण्ड को भेड़ियों-लकड़बग्घों से बचाने कोई, कभी, क्यों आएगा ?

हमसे और आपसे खुद तो आर्थिक बहिष्कार भी नहीं हो पा रहा, हमारी ही बनाई हुई सरकार कोई पूर्ण प्रतिबन्ध कहाँ से लगा देगी? हमलावर फौजें जब मारेंगी तो आपके “धर्मयुद्ध” के नियम याद नहीं रखती. वो सैन्य-असैन्य सबको काटेंगी, इसलिए आपको भी ये दीवार पर बैठ कर ताली बजाना बंद करना होगा.

उनके सैनिकों के समर्थन में पत्थरबाज़ उतरते हैं, आप सोमनाथ के रक्षकों की तरह शिव का तीसरा नेत्र खुलने तक इन्तजार क्यों करना चाहते हैं? भारत की सीमाएं जहाँ तक थीं वहां तक मंदिर और मठों की स्थापना एक चौहद्दी की तरह की गई थी.

तीर्थयात्री हिन्दुओं के इलाके की सीमाओं तक गए बॉर्डर पेट्रोल जैसा होता है. वो नाप कर आता है कि हिन्दुओं की सीमा सचमुच वहां तक है या नहीं. तीर्थयात्री नहीं मारे गए, वहां आपका जाना बंद कर के वो बस आपकी सीमाएं छोटी कर रहे हैं. ये हिंदुत्व के सैनिकों पर हमला था, आपको प्रतिकार करना ही होगा.

कल मार्तंड सूर्य मंदिर तोड़ा था, आज अमरनाथ हड़पना चाहते हैं. सेना लड़े, हम कुछ नहीं करेंगे, सोमनाथ के रक्षकों की तरह शिव का इन्तजार कब तक? शत्रुओं को भगवा रंग से चिढ़ है. सोशल मीडिया की प्रोफाइल फोटो में भगवा डालिए. सड़कों पर भगवा पहने नजर आइये. आर्थिक बहिष्कार बढ़ाइए, आपकी कमाई की अठन्नी भी दुश्मन के गोली खरीदने के काम ना आये.

सिर्फ नाराजगी कब तक? छत पर टंगा झंडा भगवा हो सकता है, कुर्ता भगवा-केसरिया हो सकता है. सूट-शर्ट की जेब में रखा रुमाल भगवा हो सकता है, हेलमेट के नीचे सर पर बंधा बैंडाना भगवा हो सकता है. सफ़ेद कुर्ती पर दुपट्टा भगवा हो सकता है, चूड़ियाँ, नेल-पॉलिश भगवा-केसरिया हो सकता है. खरीददारी आपको और आपके परिवार के लोगों को कहाँ से करनी है वो आपके हाथ में है. दबाव बढ़ाइए. इन्हें पैसे देना बंद करना और भगवा पहनना तो आपके हाथ में है, हाथ हिलाइए.

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