बहुत बह चुका शोणित संतो का हिमालय पर, अरि की मज़्ज़ा से रंग दो हिम को नरेंद्र! अब तो वज्रप्रहार करो

सन 1994, स्थान जयपुर, 14 वर्ष की आयु में आज मेरे ननिहाल में गर्मियों की छुट्टियों के दौरान पिताजी ने जयपुर भ्रमण का कार्यक्रम रखा. टैक्सी आ पहुँची और हम तीनों भाई, पापा-मम्मी निकल पड़े जयपुर घूमने.

जयगढ़ पहुंचे, गाइड ने बताया – पानी से भरे बेसमेंट और उसके नीचे जयगढ़ का वह कथित अथाह खजाना जिसे 17 (ठीक से याद नहीं ) राजाओं ने “एकत्रित ” ( याद रखियेगा ये शब्द ) किया था और आपातकाल के दौरान इंदिरा जी ने इसे “राष्ट्र की संपत्ति ” (ध्यान से सोचिएगा उन दिनों स्वयं राष्ट्र भी किसकी निजी संपत्ति था??) बना दिया था.

अब आइये मुख्य लक्ष्य पर,
गाइड ने हमें एक विशालकाय तोप दिखाई और सगर्व कहने लगा कि सर यह विश्व की सबसे बड़ी तोप थी उस समय की, इससे छोड़ा गया गोला लगभग 24 कोस (किमी /कोस याद नहीं) दूर जाकर गिरता था और वहाँ प्रलय मच जाता.

हमारे मुँह से निकल पड़ा ,’ ओह्ह ,वाह क्या बात है.”

उसने कहना जारी रखा कि कैसे इससे गोला प्रदीप्त करते ही तोपची उस भयानक गर्जन से अपने कान एवं मानसिक संतुलन को बचाने के लिए श्वास रोक कर पास ही बनाये गए एक पानी के टैंक में कूद जाता था.

वाह ! क्या व्यवस्था थी, क्या तोप थी. गजब!

अब हमारे मुँह से निकल पड़ा कि तब तो कोई जयपुर (आमेर) से लड़ने की सोचता ही नहीं होगा? कितने युद्ध जीते इस तोप ने, कितने गोले फेंके? आखिर कितनी बार चली वह तोप?

गाइड की आंखों का नूर जो बर्फ सा था पिघलते हुए बह सा गया और वो हल्के से बोला जी बस एक बार और वह भी युद्धकाल में नहीं बल्कि शांतिकाल में परीक्षण के लिए कि गोला चलता भी है या नहीं और चलता है तो कितनी दूरी पे जाकर गिरता है मात्र यह जांचने के लिए.

” बेकार है तब तुम्हारा ये डिब्बा, इससे तो हमारा चेतक ही लाख बढ़िया था जो हाथी पर जा चढ़ा इशारा पाते ही और हमारे महाराणा प्रताप ने भाला फेंक मारा तुम्हारे मानसिंह पर,जो साला छुपता नहीं ओहदे में तो आरपार हो जाता. कायर साले! ”

गाइड की आंखे बेनूर तो थी आश्चर्य के साथ मुझे घूर के कुछ देर, अब नीची भी हो गई.

हां ! कुछ कह नही पाई ।

पिताजी ने डाँटा , “साला” बोलना कहाँ से सिखा रे! और कहाँ क्या बोलना है ध्यान रखना चाहिए बेटा, आप जयपुर में हो और मानसिंह इनके सम्माननीय राजा थे, ऐसे किसी के मुँह पर नहीं कहते सीधा.

हां ! हम ताड़ गए कि वे स्पष्ट मना भी नहीं कर रहे थे और ना ही यह कहे कि तुमने कुछ गलत कहा है. कहा तो सच ही जो था. रस्मी निंदा थी मात्र.

*********************
2017, अमरनाथ त्रासदी

हे नरेंद्र!
क्या कहेंगे हम अपनी संततियों से भविष्य में कि कितनी बार चली थी हमारी ब्रह्मोस, अग्नि, पृथ्वी, नाग, आकाश ……….???

सौ करोड़ हिन्दुओं के स्वतंत्र देश मे “अमरत्व” की प्राप्ति को विश्वास के साथ गाते -जाते तीर्थयात्री अकाल “मृत्यु ” / नृसंश हत्या के पश्चात इस “घोषित युद्ध” में हमने क्या पुरुषार्थ दिखाया था ??

“क्या हमारे दिव्यास्त्र भी जयगढ़ की उस तोप के समान मात्र नाप जोग और प्रदर्शन के लिए ही “शीतकाल” में 26 जनवरी को धूप दिखाने लाये जाते थे?”

कड़ी निंदा ! इंद्र के अमोघ सी, वज्र सी, पाशुपातेयआस्त्र सी, ब्रह्मास्त्र सी !

कड़ी ,और कड़ी, सभी और से होती कड़ी निंदा ! बस ??

*************
कल शाम 7:oo बजे

मेरी गुड़िया पूछ रही थी, स्कूल में ब्लॉग लिखना है टेररिज्म पर. मैंने उसे 40 मिनट में पूरी महाभारत सुनाई आजादी से कश्मीर कॉन्फ्लिक्ट और फिर वर्तमान तक सब कुछ.

कुछ अतिथियों से अनुग्रहित होकर 10 बजे जब अमरनाथ त्रासदी का पता चला तो मैंने गुड़िया से कहा कि आतंक की एक नई परिभाषा ज्ञात हुई है वह भी समझ लो अब.

“परमाणुशक्ति सम्पन्न, संप्रभु, सक्षम, सबल, स्वतंत्र देश में 100 करोड़ हिन्दुओं के होते अपनी ही भूमि पर, 13 लाख जांबाज सैनिकों के होते, 40000 सुरक्षाबलों के साए में अपने ही आराध्य के दर्शन को जाते निरपराध 56 तीर्थयात्रियों को जब अंधाधुंध गोलियों से भुन दिया जाता है कथित “अभीष्ट ” के लिए तो उसे ही “टेरररिज्म ” कहते हैं.”

*************************

2014 मार्च को कहा था मैंने आपके और दुसरों के बीच के फर्क को रेखांकित करने के लिए और आपको चुनने के लिए.

“गीदड़ हाथी ना मार सके, उनका तो काम हुजूरी है ।
शेर ए हिन्द ही है एक नाम, जिनसे आशा पूरी हैं ।।
शौक नही मजबूरी है नरेंद्र मोदी जरूरी है ।।

क्या अब आपके लिए भी यही कहना पड़ेगा मुझे कि

“यस्य कुल त्वं उत्पन्नो गज: तत्र : ना हन्यते ।”- पंचतंत्र
(जिस कुल में तुम उत्पन्न हुए हो वहाँ हाथी नहीं मारे जाते )

“बहुत हो गई लुक्का छिप्पी अब सीधे सीने पर वार करो,
मोह त्याग दो केसर का कुछ दिन, हल्दीघाटी से श्रृंगार करो ।।

बहुत बह चुका शोणित संतो का हिमालय पर, अब और नहीं,
अरि की मज्जा से रंग दो हिम को नरेंद्र! अब तो वज्रप्रहार करो ।।

आहत हैं आज आस्था हमारी, छिन्न छिन्न संप्रभुता है,
चढ़ बैठे हैं जो विषधर छाती पर, अब तो उनका संहार करो ।।

उगलो ब्रह्मोस, प्रकटों अग्नि, ब्रह्मास्त्र भी ना निषिद्ध करो,
शठे शाठ्यम समाचरेत ही सत्य है और ना अब कोई विचार करो ।।

“बहुत हो गई लुक्का छिप्पी अब सीधे सीने पर वार करो,
मोह त्याग दो केसर का कुछ दिन, हल्दीघाटी से श्रृंगार करो ।।

#भय_बिन_होत_ना_प्रीत

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY