शल्य, युयुत्सु, भारत के मुसलमान और हम

महाभारत की दो चरित्र हैं या कहें व्यक्तिरेखाएँ हैं, शल्य और युयुत्सु. आज की तारीख में भी इनकी प्रासंगिकता है, देखते हैं कैसे.

शल्य मद्रदेश के राजा थे, नकुल सहदेव के मामा. युद्ध का न्योता मिला तो पांडवों का साथ देने ससैन्य निकल पड़े. दुर्योधन के गुप्तचरों ने यह समाचार उस तक पहुंचाया. उसने अपनी योजना बनाई और शल्य के मार्ग में सुविधाएं खड़ी कर दीं. सेना तथा शल्य का यथोचित आतिथ्य करवाया लेकिन खुद छुपा रहा, उसे विश्वास था कि शल्य को पता चले कि यह दुर्योधन ने करवाया है तो वे आतिथ्य को स्वीकार नहीं करेंगे.

शल्य आगे चलने निकले तो उन्होंने अपने यजमान को वर देना चाहा. राजा थे आखिर, आतिथ्य के बदले धन देने की बात करना यजमान का अपमान होता, लेकिन ऐसे ही बिना कुछ दिये किए आतिथ्य का ऋण कैसे लें. तब दुर्योधन सामने आया और वर मांगा कि आप मेरी तरफ से लड़ोगे. शल्य वर देने की बात कर चुके थे, अपने वचन से बंधे थे. दुर्योधन की ओर से ही लड़े.

युधिष्ठिर को पता चला जब शल्य ने खुद ही आकर उन्हें बता दिया. लेकिन कहने की बात यह भी है कि जब शल्य युधिष्ठिर को बताने गए तो दुर्योधन ने उन पर कोई शक नहीं किया. उसे पता था कि शल्य उसके पक्ष से ही लड़ेंगे और कोई भीतरघात भी नहीं करेंगे. वही हुआ.

वैसे आगे एक उपकथानक यह भी है कि शल्य ने छलावे में आने के पछतावे में पांडवों को कुछ मांगने से कहा तब उनसे यह मांगा गया कि आप को कर्ण का सारथी बनाया जाएगा तो स्वीकार करें लेकिन जब अर्जुन से उसका सामना हो तो उसका तेजोभंग करें. शल्य ने यह किया.

आगे के दिनों में शल्य युधिष्ठिर के हाथों से युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए.

युयुत्सु की बात करें तो वे धृतराष्ट्र के दासीपुत्र थे. द्रौपदी चीरहरण के समय वे अकेले थे जिन्होने इस कृत्य की निंदा की. फिर युद्ध के समय सेनाएँ पहली बार आमने-सामने हुई तो युद्ध के पहले युधिष्ठिर रथ से उतरे, दोनों सेनाओं के बीच खड़े हुए और कौरव सेनाओं को संबोधित किए कि जो धर्म का साथ देना चाहता हो, अभी हमारे साथ आ जाएँ.

इस आह्वान पर युयुत्सु चले आये. कौरवों ने उन्हें गालियां हजार दी, लेकिन किसी ने शस्त्र नहीं चलाया. चाहते तो हजारों बाणों से उनकी छलनी हो जाती तत्क्षण, लेकिन नहीं. और देखेंगे तो युयुत्सु कोई खास उपयोगी साबित नहीं हुए, कोई भेद नहीं खोले विभीषण की तरह. फिर भी उनका सम्मान रहा और युद्ध के बाद धृतराष्ट्र के वे एकमेव पुत्र जीवित रहे. कौरवों के श्राद्ध उन्होंने ही किए.

अब इन दो पात्रों की आज प्रासंगिकता मुझे भारत की भारतीय वंश के मुसलमानों में दिखती है. हूबहू तो लागू नहीं हो सकती, थोड़ा सुधार कर ही देखना होगा, लेकिन है तो सही.

जिनको तलवार-सलवार से भ्रष्ट किया गया उन्होंने वापस आने की कोशिश की लेकिन हमारे पूर्वजों ने उनके चेहरे पर दरवाज़े बंद कर दिये और अपने ही शत्रु की सेना में बढ़ोत्तरी कर दी. ऐसे ही और शल्य, मुसलमानों की ओर से लड़ते हिन्दू भी थे.

जैसे दुर्योधन आश्वस्त था कि शल्य युधिष्ठिर से जा नहीं मिलेगा, ठीक मुसलमान सत्ताधीश भी आश्वस्त थे कि इन्होंने अपना ईमान हमें समर्पित किया है, अब ये अपने वचन से बंधे हैं, अपने वतन से नहीं. वही हुआ.

छत्रपति शिवाजी महाराज ने मिर्जा राजा जय सिंह को, जो वैसे तो कट्टर कर्मकांडी हिन्दू थे, हिन्दू विनाशक म्लेच्छों के विरोध में अपना साथ देने को विनती की, लेकिन वे औरंगज़ेब को ही समर्पित रहे. मुग़लों की तरफ से उन्होंने ही अपमान कारक शर्तें लादीं.

शिवाजी महाराज को साथ ले गए, वहाँ अगर शिवाजी महाराज ने अपनी जान की रक्षा का वचन ना लिया होता तो उनकी वहीं दरबार में ही मौत तय थी. मिर्ज़ा राजा जय सिंह के कौल का औरंगज़ेब भी अनादर न कर सका लेकिन इसके बाद उसने उन्हें अपमानित करना शुरू किया. बाद में अफगान मुहिम पर भेज दिया वहाँ उनकी मृत्यु हुई.

कहा जाता है कि औरंगजेब ने ही विषप्रयोग करवाया था. फिर भी उनका खानदान मुगलों के लिए लड़ता रहा, बेटा राम सिंह असम में लछित बड़फुकन से लड़ा. कोंढाणा (सिंहगढ़) की लड़ाई में नरवीर तानाजी मालुसरे से लड़ने वाले उदयभानु और उनके आधिपत्य में मुग़लों के लिए लड़ने वाली सेना में भी ऐसे ही शल्य रहे. गोकुल जाट को जो मुगल सेना बांध कर लायी उसके सहसेनापति थे ब्रह्मदेव सिसोदिया थे. शिवाजी महाराज को महाराष्ट्र में भी ऐसे कई शल्यों से निपटना पड़ा, फेहरिस्त वो भी लंबी है.

शल्य को लेकर युधिष्ठिर की यह विफलता ही कहनी चाहिए कि उसने अपने से जुड़ने वाले राजाओं के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं रखी, व्यवस्था नहीं की, यहाँ दुर्योधन ने उसे मात दे दी.

भले युद्ध युधिष्ठिर जीता लेकिन बेहतर स्ट्रेटजी दुर्योधन ने दिखाई है. कलियुग होता तो दुर्योधन ही जीतता, जैसे इस्लाम और अंग्रेज़ जीते. दूरंदेशी के इस अभाव में पांडवों का शल्य अपने साथ न रहने से नुकसान तो हुआ ही, शत्रु सेना से लड़कर शल्य और उसकी सेना ने जो नुकसान किया वो अलग से.

वैसे शल्य द्वारा कर्ण के तेजोभंग की बात पर समझदार लोगों को विचार करना चाहिए. उस समय का उनका संवाद पढ़ लेना चाहिए, सही होगा.

आज और शल्य बनने से रोकना चाहिए, बाकी बन चुके शल्यों की नियति का निर्णय उन शल्यों को खुद ही लेना होगा.

युयुत्सु के बारे में आज क्या कहें? कितना स्कोप है युयुत्सु बनने का? वो युग कलयुग नहीं था, ना ही शत्रु इस्लाम था. लेफ्टिनेंट उमर फयाज़ याद है, क्या किया गया उसके साथ? युयुत्सु ही तो था.

महाभारत वाकई पढ़ते रहना चाहिए, पात्र मिलते हैं, प्रसंग मिलते हैं और परिणाम भी. मेरे लिए तो ये और रामायण आदि हिन्दू हदीस है, अगर आप मेरी भावना समझ रहे हैं तो. बाकी मैंने इन्हें हिन्दू हदीस क्यों कहा इस पर कोई उल्टे-सीधे सवाल न करें, समझ में न आए तो छोड़कर आगे बढ़ें.

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