कोई लालू को कैसे डिफ़ेंड कर सकता है!

हम सच में समय के विचित्र मोड़ पर खड़े हैं जहाँ लालू प्रसाद यादव जैसे लोगों के भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने के बजाय उसके परिवार पर पड़े छापों को राजनैतिक विद्वेष आदि बताया जा रहा है! कुछ खबरिया वेबसाइट्स तो इसे लोकतंत्र पर हमला तक बता रहे हैं!

सीरियसली? चोट्टे कहीं के, सीरियसली?

लालू वो नेता है जिसके कारण बिहार से एक पूरी पीढ़ी का पलायन हो गया कि या तो वो बच्चे मार दिए जाएँगे, किडनेप कर लिए जाएँगे, या फिर बेहतर भविष्य तो मिल ही नहीं पाएगा. ये वो नेता है जिसने समाज के किसी तबके के लिए काम नहीं किया, और हमेशा वोटबैंक के चक्कर में जातिवाद को हवा देता रहा.

जिसे सामाजिक न्याय का मसीहा बनाकर प्रस्तुत किया जाता रहा है उसके, और परिवार के, संसदीय क्षेत्रों का दौरा करके देख लीजिए कि वहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, घर आदि की सुविधा कैसी है. सवर्णों को छोड़िए, निचली जाति के लोगों को क्या मिल गया है, ये बताईए? मेरे सामने उनकी स्थिति में सुधार आना शुरू हुआ है, वो भी नितीश के आने के बाद.

लालू ने बिहार को लूटा है. और लूटा भी है तो नये तरीक़ों से. बेहतर शिक्षा ना मिले इसका सारा यत्न किया लालू ने. स्कूलों में शिक्षकों को वेतन साल में एक बार मिलता था. स्कूल की छत टूट गई, कोई बात नहीं. यही कारण है कि नब्बे के दशक के शुरुआत में आपको बिहार के हर जिले में प्राइवेट स्कूलों की बाढ़ आ गई थी. लोगों के नाम सिर्फ सरकारी स्कूल में होते थे, और बच्चे पढ़ते प्राइवेट में थे जहाँ बीस रुपया महीना फीस हुआ करती थी.

इस पर और इसके परिवार पर पड़े छापे को आप डिफ़ेंड कर रहे हैं? ये वो इन्सान है जिसने एक पीढ़ी को बर्बाद किया, बिहारियों को गाली बनाकर रख दिया. ये उसी धरती पर पैदा हुआ जहाँ के लोगों के नाम में बुद्ध से लेकर चाणक्य, पतंजलि, दिनकर और राजेन्द्र बाबू आते हैं.

इसको अपने परिवार के साथ सामूहिक आत्महत्या कर लेनी चाहिए. आप इसको डिफ़ेंड कर रहे हैं! मतलब इस को जो स्कूटर पर भैंस ढुलवाता है? जो अपने बेटे-बेटियों का भाग्य सुनिश्चित करने के लिए उसे राजनीति में ढकेल देता है और उसे अपने ‘हुनर’ के दांव सिखाता है? जो खुद तो भ्रष्ट था ही, अपने बच्चों को भी बनाने में लगा रहा?

ये राजनैतिक विद्वेष है? इससे लोकतंत्र की हत्या हो रही है? क्यों? क्योंकि सरकार में मोदी है? मतलब मोदी है सरकार में तो राज्य बर्बाद कर लो, लेकिन उसकी जाँच ना हो? मोदी है सरकार में तो प्रणय रॉय हजारों करोड़ की हेराफेरी करें लेकिन उस पर छापे पड़ना प्रेस की स्वतंत्रता का हनन है?

कितने गिरे हुए लोग हो तुम? कितने गिरे हुए हो बे? मर जाओ डूब के! और ये साले पत्रकार जो इसे प्रजातंत्र पर हमला बता रहे हैं, हरामखोरों! थोड़ा पढ़ लो इतिहास, और जान लो कि लालू कौन है, और प्रजातंत्र क्या होता है.

ये जो मोदी को घेरने के चक्कर में उछल-उछल कर लोकतंत्र की हत्या की साज़िशें देखते हो ना, ये तुम्हारे अल्पज्ञान और अपने एडिटर के तलुवों को जीभ से चाटकर छील लेने की प्रक्रिया है. ये सबको दिखता है.

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