जीएसटी : यूं सरकार को चूना लगा रहे कुछ ‘चतुर’

सिर्फ दस दिन ही हुए हैं जीएसटी लागू हुए और हमारे चतुर व्यापारियों ने ‘तोड़’ निकालना शुरू कर दिया है. सरकार बहुत अध्ययन करके बहुत विचार-विमर्श के बाद कोई नियम बनाती है. वहीं, हम उस नियम को पढ़कर उसकी कमी ढूँढते हैं और बचने का रास्ता निकाल लेते हैं.

उर्वर दिमाग की कमी नहीं है हमारे देश में, पर वो काम सिर्फ डिस्ट्रेक्टिव काम के लिए करता है. देश को टैक्स का नुकसान होता है तो हो, अपना लाभ होना चाहिए.

अपने लाभ वाली मानसिकता के कारण ही मुगलों और अंग्रेजों को देश में पाँव पसारने और राज करने का अवसर मिला… पर सबक लेना हमें नहीं आता है.

जीएसटी में 500 रुपए से ज्यादा के जूते पर 18% टैक्स है और उससे कम दाम के जूते पर सिर्फ 5% टैक्स का प्रावधान है.

इसके चलते कुछ जूता व्यापारी, 900 रुपए या 1000 रुपए के जूते की जोड़ी को 450-450 के दो बिल बना कर बेच रहे हैं, जिससे उनको 10% ही टैक्स देना पड़ेगा… 8% का लाभ हो गया.

इसी तरह कुछ कपड़ा व्यापारी 1000 रुपए से कम कीमत पर कपड़ा बेचने के लिए जोड़ी को दो हिस्सों में बेच रहे हैं, जैसे सलवार सूट से दुपट्टा को अलग करके दो बिल बना दिया.

कारण? 1000 से ऊपर के मूल्य वाले पर 12% जीएसटी लग रहा है… उससे कम पर 5%

बासमती चावल का ब्रांड बनाने वाली कंपनी ने अपना ट्रेडमार्क रजिस्ट्रेशन वापस लेने का आवेदन कर दिया है क्योंकि ब्रांडेड चावल ज्यादा जीएसटी के दायरे में है.

कुछ व्यापारी जून के स्टॉक के उन वस्तुओं को जुलाई के स्टॉक बता कर बेच रहे हैं जो जीएसटी लगने से महँगी हो गयीं हैं और जुलाई स्टॉक की सस्ती हुई वस्तुओं को जून स्टॉक का बता कर बेच रहे हैं.

सरकार ने जीएसटी को सही तरह से लागू कराने और उसका लाभ जनता तक पहुँचाने के लिए अपने अधिकारियों को छोटे से बड़े शहर तक में काम पर लगा दिया है.

लगभग 200 आईएएस, आईआरएस अधिकारी अपने क्षेत्र के थोक और खुदरा कारोबारियों के चक्कर लगा कर आवश्यक वस्तुओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने में जुटे हैं. इसके लिए वे स्टॉक की जाँच भी कर रहे हैं.

इन उदाहरणों को देख कर यदि जनमानस के मन में व्यापारियों की छवि बेईमान की ही बनेगी न… पर कोई स्वयं को तो बेईमानी में हिस्सेदार बनने के लिए दोषी मानेगा नहीं.

जब तक हम दो बिल ले कर जूते या कपड़े खरीदने के लिए तैयार नहीं होंगे तब तक दुकानदार बेचेगा कैसे?

देश के राजस्व को नुकसान पहुंचाने के जिम्मेदार हम भी हैं, सिर्फ व्यापारी ही नहीं. सिर्फ अपना लाभ ही नहीं देश के लाभ पर भी विचार करिए… देश भी अपना है और सरकार भी.

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