अनवर सादात : असमय खामोश कर दी गई इस्लाम के अंदर से उठी सुधारवादी आवाज़

अरब देशों तथा इज़रायल के बीच एक जमाने से चला आ रहा संघर्ष, राजनैतिक कम मजहबी ज्यादा है. इसकी शुरुआत 19 वीं शताब्दी के शुरू में भले ही माना जाता हो पर इसकी जड़े कहीं अधिक गहरी हैं. शुरुआत पैगंबरे-इस्लाम के मदीना हिजरत से शुरू होती है. अरब के शहर मदीने का प्राचीन नाम यश्रिब था, ये शहर एक तरह से यहूदियों का ही था जहाँ के व्यापार, राजनीति और समाज पर यहूदियों का वर्चस्व था.

जब पैगंबरे-इस्लाम वहां पहुंचे तो वहां के गैर-यहूदियों की हिम्मत बढ़ी और यहूदी धीरे-धीरे मदीने की सीमा से खदेड़ दिये गये. इसके बाद मजहबी विवाद बैतूल-मुकद्दस पर कब्ज़े को लेकर भी बढ़ा. इन्हीं कटुतापूर्ण माहौल में जब अब्बासी खिलाफत आई तो यहूदियों के खिलाफ़ नफरत और घृणा और भी फ़ैल गई. ऐसी-ऐसी हदीसें सामने आई जो यहूदियों को सबसे बड़ा खलनायक बनाकर प्रस्तुत करती थी, कुरान ने कहा ही था कि मुसलमान दुश्मनी में सबसे अधिक बढ़कर यहूदियों को पायेंगे.

फिर 19वीं शताब्दी के आरंभ में यहूदीवाद का उदय हुआ तो यहूदी विरोध का संगठित स्वरुप भी सामने आ गया. 22 मार्च 1945 को छह अरब राज्यों के साथ अरब-लीग का गठन किया गया. अरब लीग की स्थापना के कई उद्देश्य थे जिसमें एक बड़ा कॉमन कारण यहूदी विरोध भी था.

इज़रायल का गठन हुआ तो इसके गठन के साथ ही 1948 में अरब लीग के देशों ने फिलीस्तीन का नाम लेकर इज़रायल पर हमला कर दिया पर इस युद्ध में नव-जन्में इज़रायल ने अरब देशों की संयुक्त सेना को रौंद डाला.

इज़रायल को 11 मई 1949 को संयुक्त राष्ट्र ने मान्यता प्रदान कर दी पर अरब देश इसे बर्दाश्त न कर सके और फिर 1967 में मिस्र, जॉर्डन तथा सीरिया ने मिल कर फिर से इज़रायल पर हमला कर दिया. फिर एक युद्ध 1973 में भी लड़ा गया. इन युद्धों में भी पुनः 1948 दुहराया गया और अरब देशों की अक्ल ठिकाने आ गई.

वो मिस्र जो अरब लीग का अगुआ था और इज़रायल विरोध में सबसे अधिक आगे था, इस हार से सबसे अधिक सदमा उसे ही पहुंचा. इसके बाद उसने इस बात को मान लिया कि अकेले उसकी तो क्या पूरे अरब लीग के देशों की सम्मिलित हैसियत भी इज़रायल का सामना करने की नहीं है.

कई सालों के आत्ममंथन के बाद मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद अनवर अल सादात ने अमरीका में मैरीलैंड के कैंप डेविड स्थित जगह पर सितंबर 1978 में इज़राइल के प्रधानमंत्री मेनाख़ेम बेगिन के साथ समझौता कर दिया. इस समझौते के तहत मिस्र ने इज़रायल को एक राज्य के रूप में मान्यता दे दी.

मिस्र के इस कदम ने उसे अरब और इस्लामिक राष्ट्रों के बीच विलेन बना दिया, मिस्र को फौरन अरब लीग से निकाल दिया गया. अरब लीग की राजधानी जो काहिरा में हुआ करती थी उसे वहां से हटाकर ट्यूनिस ले आया गया.

ये समझौता मोहम्मद अनवर अल सादात के बुलंद हौसले और सुधारवादी रुझान का भी प्रतीक है क्योंकि अनवर ने इस समझौते के बाद कई ऐसे कदम उठाये जो उस समझौते के अंदर नहीं थे.

समझौते के बाद अनवर सादात के व्यतिगत रिश्ते बेगिन के साथ बहुत गहरे हो गये थे. बेगिन ने उन्हें बहुत अच्छे से समझा दिया कि कट्टरपंथ और यहूदियों के लिये घृणा तथा दुष्प्रचार इज़रायल से अधिक मिस्र के लिये घातक हैं.

बेगिन ने अनवर सादात से कहा कि कैम्प डेविड का समझौता हमारे और आपके राजनैतिक संबंधों को तो सुधार देगा पर मन के मैल तब तक न धुलेंगें जब तक आप अपने यहाँ यहूदी विरोधी शिक्षा, घृणा और दुष्प्रचार को न रोकेंगें. जब तक आप अपने हर स्कूल में पढ़ाये जाने वाले यहूदी विरोधी किताबों को प्रतिबंधित नहीं करेंगे तब तक वहां से निकलने वाला हर बच्चा अपने मन में यहूदी विरोध को पाले हुए बाहर निकलेगा और सच्चे अर्थों में एकता कायम नहीं हो सकेगी.

अनवर सादात जब वहां से लौटे तो उन्होंने इज़रायली प्रधानमंत्री बेगिन को इजिप्त यात्रा पर बुलाया और उनके सामने अपने शिक्षा मंत्री को बुलाकर उनसे कहा कि आप हमारे देश के सारे पाठ्यक्रमों की समीक्षा करिये और जो भी यहूदी विरोधी सामग्री या किताबें हैं उसे फ़ौरन बाहर करिये.

मिस से यहूदी विरोधी घृणा अभियान को हटाने के अभियान में मुस्तफा खलील भी उनके साथ खड़े थे (जो बाद में वहां के प्रधानमंत्री भी बने) यहाँ तक की अल-अजहर जैसे बड़े इस्लामिक यूनिवर्सिटी की स्वायत्ता ख़त्म कर उसे सरकार के अधीन कर दिया गया और चुन-चुन कर यहूदी तथा मूर्ति-पूजक विरोधी बातों को पाठ्यक्रम से निकाल दिया गया.

अनवर ने ये काम उस दौर में किये जब मिस्र में यहूद विरोधी भावनाएं अपने चरम पर थीं, वहां के मस्जिदों से हर शुक्रवार को यहूदी विरोधी तकरीरें होतीं थी.

पर कट्टरपंथी जमातों को अनवर सादात का ये सुधारवादी कानून इतना नागवार गुजरा कि उन्होंने उनके हत्या की साज़िश रच डाली. हज़ारों लोगों के सामने उस समय उनकी हत्या कर दी गई जब वो सालाना फ़ौजी परेड के दौरान आसमान पर टकटकी लगाये जंगी जहाज़ों का प्रदर्शन देख रहे थे.

सादात पर ज़मीन से उनके ही सैनिकों ने हथगोले फेंके. हथगोलों के फटने के फ़ौरन बाद सामने से एक फ़ौजी ट्रक से सैनिक बाहर कूदे और उन्होंने गोलियां बरसाना शुरू कर दिया और सादात की नृशंस हत्या कर दी गई.

इस्लाम के कट्टरपंथी संसार में एक दारा शिकोह, अनवर सादात के रूप में मिस्र की धरती पर भी जन्मा था जिसने कट्टरपंथ और वहशत से लड़ते हुये बलिदान दिया. इधर अनवर की हत्या हुई और लगभग उसी समय मिस्र के जाहिल कट्टरपंथियों ने कैम्प-डेविड समझौता तोड़ दिया.

अनवर सादात 1948 में पश्चिम एशिया में इज़रायल को मान्यता देने वाले पहले राष्ट्राध्यक्ष थे जिनसे पूरा मुस्लिम जगत घृणा करता था. इस्लाम का दुर्भाग्य यही रहा है कि उसके अंदर जो चंद लोग कट्टरपंथ के खिलाफ खड़े भी होते हैं उन्हें मौत के हवाले कर दिया जाता है पर मानवता के लिये संकट बने जिहादी, उन्मादी और वहशत की मानसिकता से जंग लड़ना है तो हमें अनवर सादात जैसों का अभिनंदन करना ही होगा वर्ना हक़ और मानवता के लिये उठने वाली दो-चार आवाजें भी उठनी बंद हो जायेगी.

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