मुझे विश्वास है कि किसी भूतपूर्व मुख्यमंत्री के सफ़ेद कुर्ते पर नहीं हैं खून के छींटे

पुराने फिल्मों की कहानी में अक्सर एक “बड़े आदमी” की बेटी से किसी गरीब नौजवान को प्यार हो जाता था. फिर अमीर बाप के विरोध से जूझते हीरो-हीरोइन फिल्म के अंत में जैसे-तैसे लड़कर अपने प्यार को पाने में कामयाब होते थे. फिल्मों में आम तौर पर ऐसी कहानियां इसलिए होती हैं, क्योंकि रोजमर्रा की जिन्दगी में ऐसा नहीं होगा. ऐसा सिर्फ कल्पना की दुनियां में, फिल्मों के पर्दे पर होता है.

यकीन ना हो तो आप नितीश कटारा से पूछ सकते हैं. ऐसे ही एक प्रेम प्रसंग में उनकी हत्या काफी पहले हुई थी. फिर जैसा कि बड़े लोगों के अपराधों में शामिल होने पर होता है वैसा ही हुआ. जैसे दो-तीन नौकरियां करके पैसे जुटाती एक लड़की के मारे जाने पर सबने “नो वन किल्ड जेसिका” बना डाली थी वैसे ही नितीश कटारा को भी किसी ने नहीं मारा. पता नहीं पहले अपने परिवार के एक सदस्य की असमय मृत्यु, फिर उसकी पुलिस जांच में पीड़ित पक्ष के पूरे परिवार पर बनाया जाने वाला चौतरफा दबाव लोग झेलते कैसे होंगे.

किसी गाँव-देहात में हुई ऐसी प्रेमी युगल में से एक या दोनों की हत्याओं पर छाती कूट कुहर्रम मचने वाले अखबार भी पता नहीं कैसे “बड़े लोगों” के किये ऑनर किलिंग पर चुप्पी साध लेते हैं. हमारे पैर टांग, और उनके पांव शायद चरण होते होंगे. किस्मत से बिहार में ऐसी ऑनर किलिंग की घटनाएँ कम होती हैं. इसका एक बड़ा कारण ये भी है कि जातिवाद प्रबल होने पर भी, अमीर-बड़े लोग उतने हैं ही नहीं कि वो ऐसी हत्याएं करके पचा लें. मगर फिर भी कुछ बड़े लोग तो हमारे इलाके में भी होते ही हैं. जातीय अस्मिता के नाम पर वो क़त्ल भी करते हैं.

ये कहानी तब की है जब ‘झारखण्ड राज्य मेरी लाश पर बनेगा’ कहने वाले लालू यादव ने चुप्पी साध ली थी और बिहार को तोड़कर एक नया राज्य हाल में ही बना था. सन 2000 के आखरी महीनों में बने झारखण्ड को नक़्शे की वजह से बिहार के लगभग सभी अच्छे कॉलेज मिल गए. मशहूर इंजीनियरिंग कॉलेज बी.आई.टी. (मेसरा) भी उन्हीं में से एक था.

बिहार-झारखण्ड को अलग-अलग समझने में आज भी लोगों को दिक्कत होती है, उस दौर में भी होती थी. आस-पड़ोस में बड़े-नामी कॉलेज भी कितने थे तो छात्र बिहार से भी वहां पढ़ने जाते ही थे. मुश्किल से कम्पटीशन को पास कर के डॉ सुभाष चन्द्र मिश्रा के सुपुत्र अभिषेक भी उसी कॉलेज में पहुंचे.

जवान लोगों को किसी प्यार हो जाना भी कोई अनोखी बात नहीं हुई. बस दिक्कत ये थी कि अभिषेक को जिस से प्यार हुआ वो लड़की विजातीय थी. वो लोग घंटों फोन पर बात करते थे. एक ही कॉलेज में थे तो मिलने-जुलने पर तो खैर कोई पाबन्दी मुश्किल ही थी.

विजातीय से प्यार होना एक बड़ा अपराध था. नतीजा वही हुआ जो आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं. एक पिकनिक पर “दोस्तों” के साथ घूमने गए अभिषेक मिश्रा की रांची के पास के डासना फाल्स पर “फिसल कर गिरने और डूब जाने” से मौत हो गई. दिसम्बर 2006 में हुई इस “दुर्घटना” से बिहार-झारखण्ड के सियासी हलकों में तूफ़ान आ गया. तूफ़ान क्यों ?

वो इसलिए क्योंकि अभिषेक मिश्रा के साथ पिकनिक पर गए बाकी लोगों में से एक तो विशाल पाण्डेय था. दूसरा झारखण्ड के पूर्व खनन मंत्री रविन्द्र लाल का रिश्तेदार भरत आनंद था. जो लड़की थी वो कोई और नहीं, उस वक्त के रेल मंत्री और सामाजिक न्याय के तथाकथित मसीहा लालू प्रसाद यादव की सुपुत्री थी.

डॉ. सुभाष मिश्रा को उनके बेटे की असमय मृत्यु की खबर और किसी ने नहीं, बल्कि लालू यादव की बेटी ने ही दी थी. जब वो अपने पुत्र का शव लेने पहुंचे तो रांची एअरपोर्ट से ही राजद के छह बड़े नाम लगातार उनके साथ थे. इन छह राजद नेताओं में गिरिनाथ सिंह भी शामिल थे. यू.पी.ए. के ही घटक दलों में से एक के नेता उस वक्त झारखण्ड के मुख्यमंत्री थे. मुख्यमंत्री मधु कोडा (झारखण्ड खनन घोटाले में 2013 तक जेल में) ने कहा कि मौत का खेद है मगर इस पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए.

मृतक के पिता खुद डॉक्टर थे. उनका आरोप था कि अभिषेक के चेहरे पर कटे का निशान था, सर के पीछे चोट थी, एक दांत टूटा था और पैर पर भी कटे का निशान था. ऐसी चोटें फिसल कर गिरने पर नहीं लगती. आश्चर्यजनक रूप से अभिषेक मिश्रा के साथ गए सभी लोग दो-तीन दिन के लिए गायब हो गए. पोस्टमॉर्टेम के पंद्रह मिनट में पुलिस ने बयान दिया कि ये मौत डूबने से हुई है.

मुकदमा कुछ दिन चला, फिर शायद थक-हार कर डॉ. मिश्रा ने भी बेटे की मौत पर चुप्पी साध ली. मेरा विश्वास है उनके साथ “सामाजिक न्याय” ही हुआ है. मेरा विश्वास है “भूरा बाल साफ़ करो” का कोई नारा जो किसी सामाजिक न्याय के मसीहा ने नहीं दिया था उसका ऐसा मतलब भी नहीं होता. मेरा विश्वास है कि अभिषेक मिश्रा का किसी विजातीय युवती से प्रेम प्रसंग नहीं चल रहा था.

मेरा यह भी विश्वास है कि भारतीय न्याय व्यवस्था ने किसी सत्य का गला नहीं घोंटा. चौबीस साल का अभिषेक सचमुच डूब कर ही मरा था. मुझे किसी भूतपूर्व मुख्यमंत्री, किसी उपमुख्यमंत्री, किसी बड़े नेता के सफ़ेद कुर्ते पर खून के छींटे भी नजर नहीं आते. बिहार में बहार है. एक आध मौतों से क्या? बहारें फिर भी आती हैं. बहारें फिर भी आएँगी.

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