आओ सीखें हिन्दी : भाषा को तोड़-मरोड़कर मत बनाओ कैज़ुअल के नाम की कैज़ुआलिटी

save hindi
हिंदी बचाओ

मैंने कुछ लोगों के ‘पूर्णविराम’ की जगह तीन लगातार डॉट लिखने को लेकर एक स्टेटस लिखा था. मैंने इस पर अपनी आपत्ति ज़ाहिर की थी. मैंने ये नहीं कहा कि यूएन से कहकर इस पर बैन लगवा देना चाहिए. ये मुझे पसंद नहीं है. मुझे ईमोजी का इस्तेमाल भी पसंद नहीं है. मुझे घर जाते वक़्त स्टेटस में हवाई जहाज लगाना भी पसंद नहीं है.

बात ये नहीं है कि इस पर मानक पुस्तक है कि नहीं. मानक पुस्तक लिख भी दी जाए तो क्या उसे लोग मानने लगेंगे?

दूसरी बात, फ़ेसबुक पर जब आप एक ‘कहानी’ या ‘कविता’ लिखते हैं तो इन दोनों के लिए मानकीकरण हो चुका है कि इसका व्याकरण, संगठन और शैली कैसी होनी चाहिए. मैं जिसकी बात कर रहा हूँ, उसमें व्याकरण की अशुद्धियाँ हैं.

मुझे एसएमएस वाली अंग्रेज़ी भी पसंद नहीं, ना ही मैंने आजतक लिखी होगी क्योंकि फ़ेसबुक पर कैरेक्टर बचाने की कोई वजह नहीं है. हाँ जिन्हें लगता है कि भाषा को तोड़ मरोड़कर वो कैजुअल के नाम की कैजुआलिटी बना दें, तो मैं बिल्कुल भी सहमत नहीं हूँ.

फ़ेसबुक पर स्टेटस हो, चार लाइन का, उसमें कोई डॉट डॉट डॉट कर दे, तो ठीक है. उतनी समझ हम में-आप में है. मैं भी कभी नहीं कहता कि मैं जो भी लिख रहा हूँ भाषा के मानदंडों पर एकदम सही और शुद्ध है. ये हो ही नहीं सकता, मैं अभी भी सीख रहा हूँ.

आप कहेंगे कि ‘अजीत जी, वहाँ आपने उच्चारण गलत लिखा है’, तो मैं आपको फ़ौरन धन्यवाद देकर सही कर लूँगा. मुझे बहुत अच्छा लगता है जब कोई सही मायने में सही करता है. मैं वहाँ ख़ुद को डिफ़ेंड नहीं करूँगा कि अरे फ़ेसबुक है, आप तो सीरियस हो गए.

बात ये है कि इसी कैजुअल तरीक़े की वजह से हम में से बहुतों का उच्चारण, चाहे हिंदी हो या अंग्रेज़ी, बिगड़ गया है. आप एक बार नज़र दौड़ाएँगे तो कूल दिखते, या कूल बनने की कोशिश में युवक या युवतियाँ, व्याकरण तो छोड़िए, सही स्पेलिंग नहीं लिखते.

और इनमें से अधिकाँश स्पेलिंग भूल चुके हैं. उनको पता ही नहीं है कि सही स्पेलिंग है क्या.

अगर हम फ़ेसबुक आदि को अलग प्लेटफ़ार्म मानकर कैजुअल बना लें तो फिर बाद में कवियों, कहानीकारों को तो ये छूट मिलनी चाहिए थी कि वो पाणिनि या फिर हिन्दी के वैयाकरणों वाले व्याकरण से अलग लिखते क्योंकि ताम्रपत्र, तारपत्र और काग़ज़ बिल्कुल अलग-अलग प्लेटफ़ॉर्म हैं.

ये कैजुअल प्लेटफ़ार्म की कैजुअल भाषा जब आपके सीरियस प्लेटफॉर्म में उतरकर घुस जाएगी तब आपको पता चलेगा कि अंग्रेज़ी के ‘यू’ में तीन अक्षर होते हैं, एक नहीं. और कहानी लिखकर जब आप एक प्रकाशक के पास जाएँगे तो उसके संपादक आपको बताएँगे कि हिन्दी में बहुत पुराने समय से वाक्य का अंत करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कई चिन्हों में एक पूर्णविराम होता है, तीन डॉट नहीं. तीन डॉट कब इस्तेमाल होते हैं, उन पर चर्चा फिर कभी.

भाषा प्लेटफ़ार्म के हिसाब से नहीं बदलती. भाषा में संवर्धन की गुँजाइश है, लेकिन कैजुअल के नाम की कैजुआलिटी बनने की नहीं. कम से कम मैं जब तक हूँ, जहाँ तक मेरी छोटी पहुँच है, मैं इन्हें सही करता रहूँगा. चाहे तो वो बुरा मान कर हट जाएँ, या मेरा शुक्रिया करें.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY